इतनी पुरानी कहानी, फिर भी हमारी

by Arun Tiwari | Jul 23, 2026

1. युद्ध के बाद की यात्रा

मैंने इलियड (The Iliad) के बाद ओडिसी (The Odyssey) पढ़ी, और मुझे लगा कि ये दोनों यूनानी महाकाव्य मिलकर मानव जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष छोड़ते हैं जिसे उन्होंने छुआ न हो। इस अर्थ में उनमें महाभारत जैसी अद्भुत समग्रता दिखाई देती है। युद्ध और शांति, साहस और भय, सम्मान और छल, प्रेम और विश्वासघात, महत्वाकांक्षा और क्षति, देवता और मनुष्य, परिवार और राज्य, नियति और स्वतंत्र इच्छा—सब कुछ उनमें उपस्थित है।

इलियड का केंद्र ट्रॉय (Troy) के विरुद्ध यूनानियों का सामूहिक युद्ध है, जो मेनेलाउस (Menelaus) की पत्नी हेलेन (Helen) को ट्रॉय के राजकुमार पेरिस (Paris) द्वारा ले जाए जाने के बाद आरम्भ होता है। यह युद्ध, सम्मान, क्रोध और मृत्यु का महाकाव्य है। ओडिसी वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ यह सामूहिक अभियान समाप्त हो चुका है। सेनाएँ बिखरती हैं, योद्धा अपने-अपने घर लौटते हैं, और कथा एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है—इथाका (Ithaca) के राजा ओडीसियस (Odysseus) पर, जो अपनी पत्नी पेनेलोप (Penelope), पुत्र टेलीमेकस (Telemachus) और अपने छोटे-से द्वीपीय राज्य में लौटने का प्रयास कर रहा है।

ट्रोजन युद्ध दस वर्ष चला और ओडीसियस की घर-वापसी में लगभग दस वर्ष और लग गए। साइक्लोप्स (Cyclops) पॉलीफेमस (Polyphemus) को अंधा करने के बाद वह समुद्र-देव पोसाइडन (Poseidon) के कोप का शिकार बनता है। ट्रॉय और इथाका के बीच का समुद्र तब बाधाओं, प्रलोभनों, पीड़ा और हानि का विराट रंगमंच बन जाता है। उसके साथी एक-एक करके नष्ट होते जाते हैं। राजधानियाँ, राक्षस, देवियाँ, तूफान और मायावी आकर्षण उसे रोकते हैं। उधर इथाका में पेनेलोप और टेलीमेकस भी अपने संघर्ष से गुजर रहे हैं। लोग मान चुके हैं कि ओडीसियस मर चुका है। वर-प्रार्थी उसके घर पर अधिकार जमाए बैठे हैं, उसकी संपत्ति का उपभोग कर रहे हैं और पेनेलोप से विवाह करना चाहते हैं।

पर लगभग 2,800 वर्ष पुरानी यह कथा आज भी इतनी जीवित क्यों है? होमर (Homer) को पढ़ने के बाद मैंने इस पर विचार किया और महसूस किया कि इन रोमांचकारी घटनाओं के नीचे एक दूसरी कथा प्रवाहित होती है—मनुष्य के रूपांतरण की कथा। भारतीय दार्शनिक दृष्टि से देखें तो इसे माया के आवरणों के क्रमिक अनावरण के रूप में भी पढ़ा जा सकता है—वे आवरण जो आसक्ति, इच्छा, भय, अहंकार और आत्म-छल के रूप में हमें जीवन की वास्तविकता देखने से रोकते हैं।

ओडीसियस के सामने आने वाली बाधाएँ केवल संयोगवश घटने वाले रोमांच नहीं हैं। प्रतीकात्मक रूप में वे एक अद्भुत क्रम बनाती हैं। प्रत्येक बाधा उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है जो मनुष्य को भीतर से कैद कर सकती है—विस्मृति, क्रूरता, वासना, ज्ञान का प्रलोभन, असंभव विकल्प, मृत्यु का भय, सुख-सुविधा और अंततः अहंकार। इन सबको पार किए बिना ओडीसियस वास्तव में घर नहीं पहुँच सकता।

और शायद हम भी नहीं। हमारे राक्षस एक आँख वाले नहीं होते, हमारी साइरन्स (Sirens) चट्टानों पर बैठकर नहीं गातीं और कैलिप्सो (Calypso) हमें अमरता का प्रस्ताव नहीं देती। हमारे राक्षस करियर, संपत्ति, महत्वाकांक्षा, व्यसन, विचारधाराओं, भय, संबंधों और पहचानों का रूप धारण करते हैं। हममें से अधिकांश यात्रा शुरू करते हैं। त्रासदी यह है कि बहुत-से लोग रास्ते में ही कहीं रुक जाते हैं।

2. विस्मृति का विलास

ओडीसियस के सामने आने वाला पहला बड़ा खतरा आश्चर्यजनक रूप से कोमल है। न कोई राक्षस है, न युद्ध, न रक्तपात। केवल कमल का फल है। उसके साथी पद्मभोजियों द्वारा दिया गया फल खाते हैं और धीरे-धीरे घर लौटने की इच्छा खो देते हैं। वे मरते नहीं। उन्हें बलपूर्वक कैद भी नहीं किया जाता। वे केवल यह भूल जाते हैं कि यात्रा पर निकले ही क्यों थे। मानव स्वभाव के बारे में यह होमर की अत्यंत सूक्ष्म अंतर्दृष्टि है। अर्थपूर्ण जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा हमेशा दुःख नहीं होता। कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा होता है—आरामदायक विस्मृति।

इसी सम्मोहक विस्मृति ने सदियों बाद महाकवि अल्फ्रेड लॉर्ड टेनिसन (Alfred Lord Tennyson) को भी अपनी प्रसिद्ध कविता “द लोटस-ईटर्स” (The Lotos-Eaters) लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें विश्राम और विस्मरण का यही आकर्षण एक मोहक स्वप्नलोक की तरह उभरता है।

हर मनुष्य के भीतर कोई न कोई इथाका होता है—यह हल्का-सा बोध कि जीवन में वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है। हम कुछ रचना चाहते हैं, किसी की सेवा करना चाहते हैं, संसार को समझना चाहते हैं, परिवार बनाना चाहते हैं, सत्य की खोज करना चाहते हैं या समाज में कुछ सार्थक जोड़ना चाहते हैं। विशेष रूप से युवावस्था में जीवन दिशा और संभावना से भरा लगता है। लेकिन कहीं रास्ते में कमल आ जाता है।

वह नाटकीय रूप से नहीं आता। वह आराम, दिनचर्या, सुविधा और मनोरंजन के रूप में आता है। धीरे-धीरे आराम ही पर्याप्त लगने लगता है। उद्देश्य का स्थान दिनचर्या ले लेती है। चिंतन की जगह मनोरंजन। सृजन की जगह उपभोग। हम व्यस्त रहते हैं, कई बार सफल भी, पर जीवन की गहरी दिशा धुंधली पड़ने लगती है। वर्षों बाद वह मूल प्रश्न लगभग खो जाता है—मैं जा कहाँ रहा था?

यह माया का अत्यंत कोमल और इसी कारण खतरनाक रूप है। कुछ भी स्पष्ट रूप से गलत नहीं दिखाई देता। कोई बड़ी दुर्घटना हमें जगाने नहीं आती। जीवन आरामदायक, सम्मानजनक और सामाजिक रूप से सफल हो सकता है। घर, करियर, प्रतिष्ठा और सुरक्षा सब हो सकते हैं—और फिर भी हम भूल चुके हो सकते हैं कि यात्रा आरम्भ किसलिए की थी।

कमल हमें नष्ट नहीं करता। वह केवल कहीं जाने की इच्छा समाप्त कर देता है। ओडीसियस अपने साथियों को जबरन जहाज तक घसीटकर लाता है और बाँध देता है, क्योंकि वे लौटना ही नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि उन्हें सुख मिल गया है। यह एक गहरा सत्य है—जागरण उस व्यक्ति को हमेशा सुखद नहीं लगता जिसे जगाया जा रहा हो। कभी-कभी अनुशासन हमें उन इच्छाओं से बचाता है जिन्हें हम स्वयं सुख समझ बैठे हैं।

आज का जीवन भी लोटस-ईटर्स की भूमि के अनेक रूप प्रस्तुत करता है। अंतहीन मनोरंजन, डिजिटल विचलन, उपभोक्तावादी आराम और छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं की निरंतर उपलब्धता धीरे-धीरे हमारा ध्यान और उद्देश्य दोनों क्षीण कर सकती है।

समस्या सुख में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सुख जीवन का स्थान ले लेता है। लोटस-ईटर्स इसलिए केवल भूलने का प्रतीक नहीं हैं। वे उद्देश्य को सुख-सुविधा के बदले छोड़ देने के प्रलोभन का प्रतीक हैं। जीवन खोने के लिए कोई बड़ी त्रासदी आवश्यक नहीं। कभी-कभी हम बस धीरे-धीरे उससे दूर बह जाते हैं। इसलिए समय-समय पर हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए— मेरा इथाका क्या है? और क्या मैं भूल गया हूँ कि मुझे वहाँ पहुँचना क्यों था?

3. असभ्य शक्ति

अगली बड़ी बाधा पॉलीफेमस (Polyphemus) नामक साइक्लोप्स (Cyclops) है। वह विशालकाय, अत्यंत शक्तिशाली और भयावह है, पर भीतर से आदिम। वह न आतिथ्य जानता है, न कानून, न पारस्परिकता, न संयम। जो उसकी शक्ति की सीमा में आता है, वह उसे निगल जाता है—ओडीसियस के साथियों तक को।

साइक्लोप्स केवल एक पौराणिक राक्षस नहीं है। वह चेतना-विहीन शक्ति का प्रतीक है। सभ्यता तब शुरू नहीं होती जब मनुष्य शक्तिशाली बनता है। सभ्यता तब शुरू होती है जब शक्ति स्वयं पर सीमा स्वीकार करना सीखती है।

किसी व्यक्ति के पास धन, सत्ता, ज्ञान, तकनीक, सैन्य शक्ति या शारीरिक सामर्थ्य हो सकता है, फिर भी वह भीतर से असभ्य रह सकता है। इतिहास बार-बार दिखाता है कि अधिक शक्ति, यदि अधिक विवेक से न जुड़ी हो, तो केवल विनाश की क्षमता बढ़ाती है।

इसलिए सभ्यता का वास्तविक माप यह नहीं कि हमारे पास कितनी शक्ति है, बल्कि यह है कि हम उसे कितनी जिम्मेदारी से नियंत्रित और निर्देशित करते हैं। ओडीसियस पॉलीफेमस को बल से नहीं हरा सकता। वह उसके सामने शारीरिक रूप से नगण्य है। इसलिए वह मेटिस (Metis)—बुद्धि, रणनीति, अनुकूलन और चतुराई—का उपयोग करता है।

वह अपना नाम “कोई नहीं” बताता है। उसे मदिरा पिलाता है। उसे अंधा करता है। और अंततः भेड़ों के नीचे छिपकर गुफा से निकल भागता है। कुछ समय के लिए बुद्धि, पशुबल पर विजय पा लेती है। लेकिन होमर विजय को इतना सरल नहीं रहने देते। जब ओडीसियस सुरक्षित होकर जहाज पर पहुँच जाता है, तब वह स्वयं को रोक नहीं पाता। वह पॉलीफेमस को अपना वास्तविक नाम बता देता है।

वह चाहता है कि पराजित राक्षस जाने कि उसे किसने हराया। अब जीवित बच जाना पर्याप्त नहीं। जीत पर्याप्त नहीं। उसे पहचान चाहिए। और इसी क्षण विजय संकट में बदल जाती है। पॉलीफेमस अपने पिता पोसाइडन (Poseidon) को ओडीसियस का नाम बताकर उससे प्रतिशोध की प्रार्थना करता है। समुद्र-देव का क्रोध ओडीसियस की यात्रा को और लंबा और पीड़ादायक बना देता है।

यहाँ होमर बाहरी क्रूरता से भी सूक्ष्म खतरे को उजागर करते हैं। हम बाहरी साइक्लोप्स को हरा सकते हैं, पर भीतर एक और साइक्लोप्स बचा रहता है—अहं, जिसे मान्यता चाहिए। जीवन की कितनी जीतें इसलिए छोटी हो जाती हैं क्योंकि जीतने के बाद हम चुप नहीं रह सकते?

कितने संबंध इसलिए टूटते हैं क्योंकि केवल सही होना पर्याप्त नहीं होता; सामने वाले से यह मनवाना भी आवश्यक लगता है कि हम सही थे? ओडीसियस तब बचा जब वह “कोई नहीं” था। उसकी कठिनाई तब बढ़ी जब उसने फिर जोर देकर कहा—“मैं ओडीसियस हूँ।” यही गहरा विरोधाभास है।

पहचान आवश्यक है, पर पहचान से आसक्ति माया बन सकती है। हम नाम, पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियाँ बनाते हैं, फिर उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठते हैं। साइक्लोप्स हमें दो शिक्षाएँ देता है—पशुबल को बुद्धि नियंत्रित करे। और उससे भी कठिन—बुद्धि को विनम्रता नियंत्रित करे। ओडीसियस बाहर के राक्षस को पराजित कर देता है। अब उसे भीतर के राक्षस को पहचानना सीखना है।

4. कामना और भूख में अवरोह

सर्सी (Circe) ओडीसियस के साथियों को सूअर में बदल देती है। ओडिसी में इससे अधिक सीधा प्रतीक शायद ही कोई हो। मानव रूप के भीतर पशु हमेशा उपस्थित है। हम अपनी बुद्धि, संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करते हैं, पर इस नाजुक संरचना के नीचे भोजन, काम, स्वामित्व, प्रभुत्व, नशा, आराम और सुख की प्राचीन इच्छाएँ काम करती रहती हैं। ये इच्छाएँ अपने-आप में बुरी नहीं हैं। वे शरीरधारी जीवन का हिस्सा हैं। खतरा तब शुरू होता है जब इच्छा सेवक न रहकर स्वामी बन जाती है।

सर्सी बिना किसी उच्च दिशा के इंद्रिय-सुख में डूबे जीवन का आकर्षण है। उसका संसार सुंदर है, सुखद है और वहाँ रुक जाना बहुत आसान है। होमर सुख-विरोधी नैतिकता नहीं सिखाते। स्वयं ओडीसियस काफी समय तक सर्सी के साथ सुखपूर्वक रहता है। इसलिए शिक्षा अधिक सूक्ष्म है। खतरा सर्सी की दुनिया में प्रवेश करने में नहीं है। खतरा है—वहाँ से निकलना भूल जाना।

जीवन हमें अनेक सर्सियाँ देता है। सफलता। धन। विलासिता। प्रशंसा। कामुकता। पद। शक्ति। यहाँ तक कि पेशेवर उपलब्धि भी। इनमें से किसी को केवल इसलिए छोड़ देना आवश्यक नहीं कि वह सुख देता है। वास्तविक प्रश्न यह है— क्या ये चीजें हमारे पास हैं, या धीरे-धीरे हम इनके पास हो गए हैं?

कोई व्यक्ति दशकों तक धन कमाता है और एक दिन पाता है कि अब हर निर्णय का एकमात्र पैमाना धन है। कोई प्रशंसा के पीछे इतना दौड़ता है कि तालियाँ उसके आत्म-मूल्य के लिए आवश्यक हो जाती हैं। किसी को शारीरिक सुख बाँध लेता है। किसी को उपभोग। किसी को सामाजिक मान्यता। यहाँ तक कि काम भी व्यसन बन सकता है।

उपलब्धि की भूख भी भूख ही है। सूअर में बदलना अचानक नहीं होता। यही इस प्रतीक की शक्ति है। मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है—हर बार जब किसी उच्च संभावना को किसी निम्न, दोहराती हुई इच्छा के लिए छोड़ देता है। एक और सुख। एक और समझौता। एक और स्थगन। धीरे-धीरे इच्छा पहचान बन जाती है।

भारतीय दृष्टि से यह माया का एक और रूप है—सुख को पूर्णता समझ लेना। सुख तत्काल मिलता है और बार-बार चाहिए। पूर्णता गहरी होती है और अक्सर कठिन। इच्छा कहती है—“और।” अर्थ पूछता है—“किसलिए?”

ओडीसियस सर्सी को नष्ट नहीं करता। उसे सुख को अस्वीकार भी नहीं करना है। उसका वास्तविक कार्य है— उस संसार से गुजरना, बिना इथाका को भूले। यही कठिन साधना है— आनंद लेना, पर दास न बनना; वस्तुओं का स्वामी होना, वस्तुओं को अपना स्वामी न बनने देना; सुख का अनुभव करना, पर उसे जीवन का उद्देश्य न समझ लेना। यात्रा तभी आगे बढ़ती है जब हमें याद रहता है—हर सुंदर द्वीप इथाका नहीं होता।

5. ज्ञान का सम्मोहन

फिर साइरन्स (Sirens) आती हैं। उनका प्रलोभन पहले की सभी बाधाओं से अधिक परिष्कृत है। वे भोजन, धन, शक्ति या शरीर का सुख नहीं देतीं। वे देती हैं—ज्ञान। उनका गीत ओडीसियस से कहता है—पास आओ, सुनो, और वह जानो जो साधारण लोग नहीं जानते। वे शरीर को नहीं, बुद्धि के अहं को लुभाती हैं।

यही कारण है कि साइरन्स हमारे युग में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं। मनुष्य को कभी इतनी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। एक स्मार्टफोन पर हम कुछ क्षणों में इतना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जितना कभी विशाल पुस्तकालयों में संचित होता था। समाचार, इतिहास, विज्ञान, बाजार, दर्शन, चिकित्सा, राजनीति और असंख्य मत निरंतर हमारी स्क्रीन पर बहते रहते हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इसे और आगे बढ़ा दिया है। फिर भी प्राचीन चेतावनी जस की तस है—जानकारी बुद्धिमत्ता नहीं है। ज्ञान भी नशा बन सकता है। हम लगातार सब कुछ जानने वाले बन सकते हैं और साथ ही जीना भूल सकते हैं। हर राजनीतिक विवाद हमें पता हो सकता है। हर बाजार-परिवर्तन। हर वैज्ञानिक अटकल। हर सार्वजनिक मत। और फिर भी हम स्वयं अपने भीतर से अपरिचित रह सकते हैं।

साइरन्स अज्ञान का प्रतीक नहीं हैं। वे उस खतरे का प्रतीक हैं जो ज्ञान के भीतर छिपा है—यह भ्रम कि अधिक जानना अपने-आप हमें अधिक बुद्धिमान बना देगा। ऐसा नहीं होता। ज्ञान संभावनाएँ बढ़ाता है। बुद्धिमत्ता दिशा देती है। ज्ञान बताता है कि क्या किया जा सकता है। बुद्धिमत्ता पूछती है कि क्या किया जाना चाहिए। ज्ञान उत्तर इकट्ठे करता है। बुद्धिमत्ता पहचानती है कि कौन-से प्रश्न वास्तव में महत्वपूर्ण हैं।

ओडीसियस का उपाय अद्भुत है। वह साइरन्स का गीत सुनने से इंकार नहीं करता। वह सुनना चाहता है। पर उसे यह भी पता है कि केवल जिज्ञासा पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वह अपने नाविकों के कान मोम से बंद करवा देता है और स्वयं को जहाज के मस्तूल से कसकर बँधवा लेता है। उन्हें आदेश देता है—चाहे मैं कितना भी कहूँ, मुझे मत खोलना। यह आत्म-ज्ञान का असाधारण प्रतीक है।

ओडीसियस जानता है कि भविष्य की इच्छा वर्तमान के निर्णय को पराजित कर सकती है। इसलिए वह पहले ही ऐसी व्यवस्था बना देता है जो भविष्य के प्रलोभन से अधिक मजबूत हो। यही बुद्धिमत्ता है—पहले से जान लेना कि आपकी स्वतंत्रता को कहाँ अनुशासन की आवश्यकता है।

हम स्वतंत्रता को प्रायः बंधन की अनुपस्थिति समझते हैं। होमर इसके विपरीत एक अधिक परिपक्व बात कहते हैं। कभी-कभी सही बंधन ही हमें मुक्त रखते हैं। संगीतकार अभ्यास के अनुशासन को स्वीकार करता है। वैज्ञानिक अंतर्ज्ञान को प्रमाण के अधीन रखता है। साधक अपनी इच्छाओं पर संयम रखता है। मस्तूल इसलिए एक महान प्रतीक बन जाता है। वह सिद्धांत, अनुशासन, प्रतिबद्धता और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक है।

आज की साइरन्स स्क्रीन, फीड, नोटिफिकेशन और एल्गोरिदम में गाती हैं। वे कहती हैं—बस यह एक और सूचना, एक और रहस्य, एक और उत्तर। पर अगला गीत हमेशा तैयार है। ज्ञान को त्यागना समाधान नहीं। हमें ओडीसियस की तरह उसे सुनना है—बिना स्वयं को उसके हवाले किए। अनुशासन ही मस्तूल है। उसके बिना ज्ञान भी हमें डुबो सकता है।

6. अपूर्ण विकल्प

आधुनिक सोच प्रायः मानती है कि हर समस्या का कोई सर्वोत्तम समाधान अवश्य होगा। पर्याप्त बुद्धि, डेटा, तकनीक और विश्लेषण हो तो सही उत्तर मिल ही जाएगा। जीवन ऐसा नहीं है। कुछ परिस्थितियाँ अच्छे और बुरे के बीच विकल्प नहीं देतीं। वे एक हानि और दूसरी हानि के बीच चुनाव कराती हैं।

ओडीसियस को एक संकरे समुद्री मार्ग से गुजरना है। एक ओर बहु-मस्तक वाली स्किला (Scylla) है, जो जहाज से नाविकों को उठा सकती है। दूसरी ओर कैरिब्डिस (Charybdis) का भयावह भँवर है, जो पूरे जहाज को निगल सकता है। कोई सुरक्षित मार्ग नहीं है। वह दोनों को पराजित नहीं कर सकता। वह दोनों से बच भी नहीं सकता। उसे तय करना है कि वह कितना नुकसान स्वीकार करेगा। यहीं ओडिसी रोमांचक कथा से आगे बढ़कर वयस्क जीवन की वास्तविकता बन जाती है।

बचपन में हम मानते हैं कि अच्छे निर्णय अच्छे परिणाम देंगे और गलत निर्णय गलत परिणाम देंगे। बड़े होकर हमें पता चलता है कि कुछ निर्णय दुखद होते हैं—जहाँ सबसे बुद्धिमान विकल्प भी पीड़ा से मुक्त नहीं होता। डॉक्टर कोई उपचार सुझा सकता है जो जीवन बचाए, पर गंभीर पीड़ा भी दे। नेता बहुसंख्यक की रक्षा का निर्णय ले सकता है, पर कुछ लोगों को उसकी कीमत चुकानी पड़े। माता-पिता बच्चे के हित में उसे निराश कर सकते हैं। परिवार को तय करना पड़ सकता है कि पीड़ित व्यक्ति को कितने समय तक जीवन-रक्षक प्रणाली पर रखा जाए।

राष्ट्र भी बार-बार ऐसे विकल्पों का सामना करते हैं जहाँ एक संकट से बचना दूसरे संकट को जन्म दे सकता है। ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता का अर्थ दर्द-विहीन रास्ता खोज लेना नहीं है। हो सकता है ऐसा रास्ता हो ही नहीं। बुद्धिमत्ता का अर्थ है—वास्तविकता को इतनी स्पष्टता से देखना कि कार्रवाई की अपरिहार्य कीमत स्वीकार की जा सके।

ओडीसियस स्किला के निकट से गुजरने का निर्णय करता है। वह कुछ साथियों को खो देता है, पर जहाज बच जाता है। कैरिब्डिस की ओर जाने पर सब नष्ट हो सकते थे। यह विजय नहीं है। कोई उत्सव नहीं होता। कुछ निर्णयों में कोई विजेता नहीं होता।

यह माया का एक क्रूर अनावरण है—यह विश्वास कि यदि हम पर्याप्त बुद्धिमान, अच्छे, शक्तिशाली या आध्यात्मिक हैं तो जीवन हमेशा स्वच्छ और निर्दोष समाधान देगा।

ऐसा नहीं होगा। कभी-कभी हर रास्ते में दुःख होता है। परिपक्वता हमें एक कठिन भेद सिखाती है—टाले जा सकने वाले दुःख और अनिवार्य कीमत के बीच अंतर। कई बार निर्णय न लेना भी निर्णय होता है—और सबसे खतरनाक।

नेतृत्व इसलिए केवल बुद्धि नहीं माँगता। वह अनिश्चितता में निर्णय लेने और परिणाम की जिम्मेदारी उठाने का साहस माँगता है। जीवन स्किला और कैरिब्डिस जैसे संकरे रास्तों से भरा है—सुरक्षा और स्वतंत्रता। महत्वाकांक्षा और परिवार। न्याय और करुणा। विकास और स्थिरता। हस्तक्षेप और संयम।

परिपक्व मनुष्य धीरे-धीरे पूर्ण विकल्प की कल्पना छोड़ देता है। वह स्पष्ट देखता है। जिम्मेदारी से चुनता है। अनावश्यक हानि कम करने का प्रयास करता है। और यह दिखावा किए बिना आगे बढ़ता है कि कुछ खोया ही नहीं।

ओडीसियस बच जाता है। पर बिना घाव के नहीं। यही बुद्धिमत्ता का हिस्सा है। परिपक्वता तब शुरू होती है जब हम उस स्थिति में भी जिम्मेदारी से निर्णय ले सकें जहाँ हर विकल्प में कुछ दुःख हो।

7. मृत्यु का साक्षात्कार

इसके बाद ओडीसियस को मृतकों के लोक हेडीज (Hades) में उतरना पड़ता है। यह केवल एक और रोमांच नहीं है। यह उसके रूपांतरण के लिए आवश्यक है। जीवन की यात्रा पूरी करने से पहले उसे मृत्यु का सामना करना होगा।

हेडीज में वह उन लोगों की छायाओं से मिलता है जिनकी महत्वाकांक्षाएँ, विजय, दुःख और प्रतिष्ठा अब केवल स्मृति बन चुकी हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है अकिलीस (Achilles)—इलियड का महानतम योद्धा, जिसने एक लंबे लेकिन साधारण जीवन की जगह छोटे और गौरवपूर्ण जीवन को चुना था।

पर मृतकों के बीच गौरव बहुत अलग दिखाई देता है। इलियड का वीर आदर्श यहाँ शांत रूप से उलट जाता है। पृथ्वी पर कीर्ति किसी व्यक्ति का नाम बचा सकती है। जीवन वापस नहीं दे सकती। इस छाया-जगत में साधारण जीवित रहना भी अमूल्य लगता है।

जीवन—भले ही अधूरा, कठिन, साधारण और सीमित हो—ऐसा मूल्य प्राप्त करता है जिसे वीर महत्वाकांक्षा पूरी तरह नहीं समझ पाती। यहीं शायद ओडिसी, इलियड को उत्तर देना शुरू करती है।

इलियड पूछती है—तुम किसके लिए मरने को तैयार हो?
ओडिसी पूछती है—तुम किसके लिए जीना चाहते हो?

हर मनुष्य को किसी न किसी समय हेडीज में उतरना पड़ता है—शरीर से नहीं, मन से। माता-पिता चले जाते हैं। मित्र बिछुड़ते हैं। शिक्षक और मार्गदर्शक, जो स्थायी लगते थे, अचानक अनुपस्थित हो जाते हैं। शरीर बदलता है। शक्ति घटती है। महत्वाकांक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं। जो लोग कभी अत्यंत शक्तिशाली थे, वे भुला दिए जाते हैं। संस्थाएँ उन लोगों के बिना भी चलती रहती हैं जो स्वयं को अपरिहार्य समझते थे।

एक दिन हम दर्पण में देखते हैं और समझते हैं—समय पूरे रास्ते हमारे साथ चल रहा था। युवावस्था में मृत्यु एक अमूर्त विचार लगती है। लगता है हमेशा एक और वर्ष होगा। एक और अवसर। एक और बातचीत। एक और मौका। फिर धीरे-धीरे जीवन यह भ्रम हटा देता है।

मृत्यु का बोध निराशा दे सकता है। लेकिन असाधारण स्पष्टता भी। जब हम वास्तव में समझते हैं कि समय सीमित है, तो बहुत-सी चीजें अचानक छोटी लगने लगती हैं। वह झगड़ा जिसने हमें वर्षों परेशान किया। वह पदोन्नति जो नहीं मिली। वह व्यक्ति जिसने हमारी प्रशंसा नहीं की। वह अपमान जिसे हमने ढोया। वह वस्तु जो दूसरे के पास थी।

मृत्यु के सामने ये छायाएँ हल्की पड़ जाती हैं। यह जीवन से विरक्ति की शिक्षा नहीं है। इसके विपरीत, मृत्यु की चेतना जीवन को अधिक तीव्र और अर्थपूर्ण बना सकती है। जब समय सीमित समझ में आता है—ध्यान मूल्यवान हो जाता है। संबंध आवश्यक हो जाते हैं। काम को उस जीवन के योग्य होना पड़ता है जो हम उसमें खर्च कर रहे हैं।

अनकहे शब्द महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्षमा सरल हो जाती है। कृतज्ञता स्वाभाविक। भारतीय दृष्टि से हेडीज माया के एक गहरे आवरण को हटाता है—यह भ्रम कि हमारे पास असीमित समय है। ओडीसियस को जीवितों के बीच लौटने से पहले मृतकों से मिलना आवश्यक था। शायद हमें भी किसी समय भीतर से यह यात्रा करनी पड़ती है।

मृत्यु जीवन को छोटा नहीं करती। वह उसे आकार देती है। और शायद बुद्धिमत्ता तब शुरू होती है जब हम यह पूछना छोड़ दें कि—मैं कितने दिन जीवित रहूँगा? और पूछना शुरू करें—जो समय शेष है, वह किस योग्य है?

8. स्वर्णिम कैद

कैलिप्सो (Calypso) शायद ओडीसियस की पूरी यात्रा का सबसे सूक्ष्म प्रलोभन है। वह उसे धमकाती नहीं। धोखा नहीं देती। मारना नहीं चाहती। वह उससे प्रेम करती है। वह उसे सौंदर्य, सुरक्षा, आराम और यहाँ तक कि अमरता भी देती है। उसके द्वीप पर वह हमेशा रह सकता है। न तूफान। न युद्ध। न वृद्धावस्था। न राज्य की कठिनाइयाँ। न परिवार का संघर्ष। न भविष्य की अनिश्चितता। न मृत्यु। मानवीय इच्छा की दृष्टि से देखें तो कैलिप्सो वह सब देती है जिसकी मनुष्य ने सदियों से कामना की है—दुःख के बिना सुरक्षा। अंत के बिना जीवन।

लेकिन ओडीसियस इंकार कर देता है। क्यों? क्योंकि वह घर जाना चाहता है। इस एक निर्णय में होमर का अत्यंत गहरा दर्शन निहित है। ओडीसियस पूर्ण अमर पलायन के बजाय अपूर्ण नश्वर जीवन चुनता है। वह चिरयुवा देवी के स्थान पर वृद्ध होती पेनेलोप को चुनता है। स्वर्ग जैसे द्वीप के बदले छोटा, पथरीला इथाका। अनंत सुख के बदले जिम्मेदारी। आराम के बदले कर्तव्य। अनंत संभावनाओं के बदले संबंध। कालातीतता के बदले समय।

क्यों? क्योंकि अर्थ के लिए सीमा आवश्यक हो सकती है। जीवन का मूल्य आंशिक रूप से इसलिए है क्योंकि वह समाप्त होता है। एक संबंध महत्वपूर्ण है क्योंकि दूसरा व्यक्ति बदलने योग्य नहीं। घर महत्वपूर्ण है क्योंकि वह यही जगह है, हर जगह नहीं। प्रेम गहरा इसलिए होता है क्योंकि हम अनंत विकल्प खुले रखने के बजाय कुछ विशिष्ट लोगों से स्वयं को बाँधते हैं।

कैलिप्सो इसलिए माया का एक सूक्ष्म रूप है—सीमाओं के बिना जीवन की कल्पना।

हम सोचते हैं कि जब पर्याप्त धन होगा, पर्याप्त सुरक्षा, पर्याप्त तकनीक, पर्याप्त अवकाश और पर्याप्त नियंत्रण होगा—तब जीवन पूर्ण होगा। आधुनिक सभ्यता ने कैलिप्सो के अनेक द्वीप बना दिए हैं। स्थायी यौवन। अंतहीन उपभोग। आर्थिक जोखिम से पूर्ण सुरक्षा। डिजिटल पलायन। हम जीवन से हर असुविधा हटाना चाहते हैं। भोजन तुरंत मिले। मनोरंजन कभी रुके नहीं। संचार में प्रयास न लगे। वृद्धावस्था देर से आए। दर्द हट जाए। अनिश्चितता नियंत्रित हो जाए।

इनमें बहुत कुछ उपयोगी भी है। पर आराम तब कैद बन जाता है जब वह हमें उन जिम्मेदारियों से दूर कर दे जो जीवन को आकार देती हैं। सबसे खतरनाक जेलें हमेशा लोहे से नहीं बनतीं। कुछ सुख से बनती हैं। स्वर्णिम जेल भी जेल है, यदि वह हमें उस जीवन से दूर कर दे जिसे हमें वास्तव में जीना था।

ओडीसियस अनंत अस्तित्व नहीं चाहता। वह अपना जीवन चाहता है। अपनी पत्नी। अपना पुत्र। अपना घर। अपनी जिम्मेदारियाँ। अपनी स्मृतियाँ। यहाँ तक कि अपने अपूर्ण संसार की कठिनाइयाँ भी।

नश्वर जीवन स्वीकार करना वृद्धावस्था, हानि, निराशा और मृत्यु स्वीकार करना है। पर उसी के साथ प्रेम, संबंध, जिम्मेदारी और अर्थ भी आते हैं।

कैलिप्सो उसे अनंतता देती है। ओडीसियस इथाका चुनता है।

शायद गहरी बुद्धिमत्ता यही है—अर्थपूर्ण जीवन वह नहीं जिसमें सारी सीमाएँ हटा दी गई हों, बल्कि वह जिसमें हमने पहचान लिया हो कि किन सीमाओं को प्रेमपूर्वक स्वीकार करना सार्थक है।

9. अहं की अंतिम बाधा

अब तक हमें समझ में आने लगता है कि ओडिसी (The Odyssey) का सबसे बड़ा राक्षस पद्मभोजी (Lotus-Eaters), साइक्लोप्स (Cyclops), सर्सी (Circe), साइरन्स (Sirens), स्किला (Scylla), कैरिब्डिस (Charybdis), हेडीज (Hades) या कैलिप्सो (Calypso) नहीं था।

सबसे बड़ी बाधा स्वयं ओडीसियस (Odysseus) था।

उसकी असाधारण बुद्धि बार-बार उसे बचाती है। उसका अहंकार बार-बार उसे संकट में डालता है। यही उसे गहराई से मानवीय बनाता है।

यदि होमर (Homer) ने एक पूर्णतः निर्दोष नायक बनाया होता तो ओडिसी महान साहित्य के बजाय केवल नैतिक शिक्षा बन जाती। ओडीसियस का आकर्षण इसी में है कि उसकी शक्ति और उसकी कमजोरी कई बार एक ही स्रोत से निकलती हैं। वह बुद्धिमान है—पर बुद्धि चतुर चालाकी बन सकती है। वह साहसी है—पर साहस दुस्साहस बन सकता है।

वह अपना मूल्य जानता है—पर आत्मज्ञान आत्ममुग्धता बन सकता है। वह पहचान चाहता है—और पहचान अहं बन सकती है। साइक्लोप्स वाला प्रसंग इसे पूरी तरह उजागर करता है। ओडीसियस सुरक्षित निकल चुका है। अब अपना नाम बताने से उसे कुछ मिलने वाला नहीं। फिर भी वह स्वयं को रोक नहीं सकता। अहं गुमनाम विजय सहन नहीं कर सकता। वह चाहता है कि संसार जाने—“यह मैंने किया।”

यही छोटा-सा आग्रह पूरी यात्रा का मार्ग बदल देता है। शायद यह माया का सबसे स्थायी आवरण है—हम उस कहानी से स्वयं को जोड़ लेते हैं जो हमने अपने बारे में बना रखी है। मैं वैज्ञानिक हूँ। मैं नेता हूँ। मैं धनी हूँ। मैं सम्मानित हूँ। मैं सफल हूँ। मैं अपरिहार्य हूँ। मैं पीड़ित हूँ। मैं सही हूँ।

ये पहचानें झूठी होना आवश्यक नहीं। समाज में जीने के लिए भूमिकाएँ आवश्यक हैं। हम माता-पिता हैं, पेशेवर हैं, नागरिक हैं, शिक्षक हैं, अधिकारी हैं, कलाकार हैं, उद्यमी हैं। समस्या तब शुरू होती है जब हम भूमिका को स्वयं का वास्तविक स्वरूप समझ लेते हैं। तब आलोचना हमला बन जाती है। असहमति खतरा। पद का खोना अस्तित्व का खोना। भूमिका जेल बन जाती है।

दिलचस्प बात यह है कि ओडीसियस अपनी यात्रा में बार-बार पहचान छोड़कर ही बचता है। साइक्लोप्स के सामने वह “कोई नहीं” बनता है। जहाज टूटने पर एक अजनबी बन जाता है। दूसरों की दया पर निर्भर होता है। जहाज, साथी, संपत्ति, पद और निश्चितता सब खोता है। और जब अंततः इथाका (Ithaca) पहुँचता है, तो विजयी राजा के रूप में नहीं। भिखारी के वेश में अपने घर प्रवेश करता है।

राजा को फिर राजा बनने से पहले “कोई नहीं” बनना पड़ता है।

यहाँ एक गहरी उपनिषदिक प्रतिध्वनि सुनाई देती है—इसलिए नहीं कि होमर वेदांत सिखा रहे थे, बल्कि इसलिए कि महान सभ्यताएँ मानव स्वभाव के कुछ सत्य स्वतंत्र रूप से खोज लेती हैं। जब नाम, पद, धन, रूप, सत्ता और प्रतिष्ठा हट जाएँ तो क्या बचता है? जब कोई ताली न बजाए तो हम कौन हैं? जब उपलब्धियाँ भुला दी जाएँ तो हम कौन हैं? जब संसार को हमारी भूमिका की आवश्यकता न रहे, तब हम कौन हैं?

बाहरी राक्षसों से बचा जा सकता है। अहं हमारे साथ यात्रा करता है।

इसलिए ओडीसियस की सबसे गहरी यात्रा ट्रॉय (Troy) से इथाका की नहीं है। वह यात्रा है—अपने अस्तित्व को सिद्ध करने की आवश्यकता से, केवल स्वयं होने की स्वतंत्रता तक।

शायद घर-वापसी तब शुरू होती है जब हमें संसार से बार-बार अपना नाम सुनने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

10. हैसियत और औकात

और अंततः ओडीसियस इथाका पहुँच जाता है। हम सोच सकते हैं कि अब कथा समाप्त हो जानी चाहिए। पर ऐसा नहीं होता। शायद यही होमर की सबसे बड़ी अंतर्दृष्टि है—घर पहुँच जाना और घर में लौट आना एक ही बात नहीं।

ओडीसियस के सामने अभी बहुत काम है। उसका महल वर-प्रार्थियों से भरा है, जो उसकी संपत्ति का उपभोग कर रहे हैं और पेनेलोप पर पुनर्विवाह का दबाव डाल रहे हैं। टेलीमेकस लगभग बिना पिता के बड़ा हुआ है। पेनेलोप ने बीस वर्ष अनिश्चितता में जीना सीख लिया है। जिस राज्य को ओडीसियस छोड़कर गया था, वह समय में जड़ होकर उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा। और स्वयं ओडीसियस भी वह व्यक्ति नहीं रहा जो कभी ट्रॉय के लिए निकला था।

यहीं मुझे हैसियत और औकात का अंतर दिखाई देता है। जीवन भर हम अपनी हैसियत बनाते हैं। शिक्षा, पद, धन, उपलब्धि, सत्ता, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि—ये सब हमारी हैसियत बढ़ाते हैं। संसार हमें इन्हीं से पहचानता है। ओडीसियस की हैसियत असाधारण थी। वह इथाका का राजा था, ट्रोजन युद्ध का महान योद्धा, अद्भुत रणनीतिकार, असंभव संकटों से निकल आने वाला नायक। उसने राक्षसों को पराजित किया, समुद्रों को पार किया, देवताओं के कोप को सहा और मृत्यु के लोक तक जाकर लौटा।

पर इथाका पहुँचकर जीवन उससे कुछ और माँगता है। अब उसकी वीरता से अधिक महत्वपूर्ण है कि वह पति बन सके, पिता बन सके, घर का सदस्य बन सके, अपनी जगह फिर से ग्रहण कर सके।

महाकाव्य का नायक अब साधारण मनुष्य बनने की परीक्षा देता है।

यही शायद औकात है—अपमान के अर्थ में नहीं, बल्कि अस्तित्वगत सत्य के अर्थ में। हैसियत बताती है कि संसार में हमने क्या अर्जित किया; औकात याद दिलाती है कि अंततः हम हैं क्या।

राजा भी मृत्युशील है। विजेता भी घर का एक सदस्य है। ज्ञानी भी भूल सकता है। शक्तिशाली भी किसी के प्रेम, प्रतीक्षा और क्षमा पर निर्भर हो सकता है।

हम सबकी हैसियत अलग-अलग हो सकती है, पर हमारी औकात एक गहरे स्तर पर समान है—हम सीमित हैं, नश्वर हैं, संबंधों में बँधे हैं और अंततः जीवन के स्रोत से ही अर्थ पाते हैं।

पेनेलोप इस सत्य को सबसे अच्छी तरह समझती है। वह सामने आए व्यक्ति को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करती कि वह स्वयं को ओडीसियस कहता है। उसकी पहचान उस विवाह-शय्या के रहस्य से होती है जो भूमि में जड़ें जमाए एक जीवित जैतून के वृक्ष के चारों ओर बनाई गई है।

क्या अद्भुत प्रतीक है! बीस वर्ष की निरंतर गति के बाद सब कुछ उस चीज पर आकर ठहरता है जो हिल नहीं सकती। वृक्ष जड़ित है। शय्या जड़ित है। विवाह जड़ित है। घर जड़ित है।

ओडीसियस ने पूरे संसार को पार किया ताकि वह उस चीज का मूल्य समझ सके जो कहीं गई ही नहीं।

यहीं मुझे कबीर याद आते हैं—“काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरे नाल सरोवर पानी।” कमलिनी उसी जल में रहते हुए क्यों मुरझाए जो उसके भीतर है? जीवन अपने स्रोत से अलग कब है? और फिर कबीर का दूसरा अद्भुत बिंब—“कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढत बन माहिं।” कस्तूरी हिरण के भीतर है, पर वह उसकी सुगंध को पूरे वन में खोजता फिरता है। मनुष्य की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है।

हम संसार में अपनी हैसियत बनाने निकलते हैं। हम सीखते हैं, कमाते हैं, जीतते हैं, हारते हैं, पद पाते हैं, प्रतिष्ठा बनाते हैं, नाम अर्जित करते हैं। फिर एक समय आता है जब जीवन धीरे-धीरे पूछता है—इन सबके नीचे तुम कौन हो? यही औकात का प्रश्न है।

हम सोचते हैं कि पूर्णता अगली उपलब्धि में है। अगली पदोन्नति में। अगली संपत्ति में। किसी बड़ी पहचान में। किसी अंतिम विजय में। लेकिन हर इथाका पर पहुँचकर एक ही सत्य खुलता है—जीवन कहीं आगे हमारा इंतजार नहीं कर रहा था; यात्रा ही जीवन थी।

इसका अर्थ यह नहीं कि यात्रा व्यर्थ थी। बिना यात्रा के ओडीसियस घर का मूल्य नहीं समझ सकता था। शायद मनुष्य को भी दूर जाना पड़ता है ताकि वह निकट को पहचान सके; बहुत कुछ अर्जित करना पड़ता है ताकि एक दिन वह समझ सके कि क्या अनिवार्य था और क्या केवल सजावट।

इलियड मनुष्य की हैसियत का महाकाव्य है—यश, वीरता, युद्ध और स्मृति का।

ओडिसी धीरे-धीरे उसकी औकात का महाकाव्य बन जाती है—घर, संबंध, सीमा, मृत्यु और लौटने का।

शायद महान जीवन वह नहीं जिसमें हैसियत न हो। प्रश्न यह है कि क्या हैसियत बढ़ते-बढ़ते हमें अपनी औकात भुला देती है।

ओडीसियस की अंतिम विजय यही है कि वह राजा होकर भी फिर मनुष्य बन सकता है। ट्रॉय से निकला योद्धा संसार में अपनी हैसियत सिद्ध कर चुका था। इथाका लौटा मनुष्य अपनी औकात समझ चुका था।

हैसियत वह है जो संसार हमारे नाम के साथ जोड़ता है।
औकात वह है जो नाम हट जाने पर भी बची रहती है।

और शायद घर वही जगह है जहाँ हमें अपनी हैसियत सिद्ध नहीं करनी पड़ती—क्योंकि वहाँ हमारी औकात पहले से जानी जाती है।

—अरुण तिवारी