1. महापुरुष के द्वार पर
गेटे पर लिखना मेरे लिए सदैव संकोच का विषय रहा है। उनकी विराटता के सामने अपने शब्द अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। इसलिए इस निबन्ध का आरम्भ मैं किसी आलोचनात्मक विवेचन से नहीं, बल्कि अपनी एक निजी स्मृति से करना चाहता हूँ। अन्ततः मनुष्य का अपना अनुभव ही सबसे प्रामाणिक साक्ष्य होता है।
वर्षों पहले मुझे पहली बार फ्रैंकफर्ट के हिर्शग्राबेन (Hirschgraben) स्थित गेटे के जन्म-गृह को देखने का अवसर मिला। उस घर में प्रवेश करते ही एक विचित्र अनुभूति ने मुझे घेर लिया। उसके कमरे, सीढ़ियाँ, उसकी सादगी और गरिमा—सब कुछ जैसे पहले से परिचित था। लगा मानो मैं किसी संग्रहालय में नहीं, अपनी ही सांस्कृतिक स्मृतियों के घर लौट आया हूँ। उसी क्षण यह अनुभव भी हुआ कि इसी साधारण-से घर से एक ऐसे जीवन की यात्रा आरम्भ हुई थी जिसने आगे चलकर सम्पूर्ण मानवता की चेतना को आलोकित किया।
मेरे भीतर दो भाव एक साथ जाग उठे—अपनापन और विस्मय। ऐसा लगा मानो मैं अपने ही घर में हूँ, फिर भी किसी महान प्रतिभा के लोक में एक संकोची अतिथि की तरह प्रवेश कर रहा हूँ। वहाँ घरेलूपन और महत्ता विरोधी नहीं थे; वे एक-दूसरे को पूर्ण कर रहे थे।
वह सुसंस्कृत नागरिक-गृह केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं कि वहाँ एक महान कवि ने जन्म लिया। उसकी गरिमा इस तथ्य में है कि वहीं से वह बालक निकला जिसने अपने घर, अपने नगर और अपने समय की सीमाओं का अतिक्रमण कर विश्वमानव का रूप धारण किया। उस क्षण मेरे भीतर आत्मीयता और श्रद्धा का द्वन्द्व धीरे-धीरे मुस्कराते हुए प्रेम में रूपान्तरित हो गया।
मैं गेटे के विषय में प्रेम के अतिरिक्त किसी अन्य भाव से बोल ही नहीं सकता। यदि इस आत्मीयता में किसी को धृष्टता दिखाई दे, तो उसका उत्तर यही है कि यही उनकी अनुपम महानता की सबसे गहरी स्वीकृति भी है। उनके विचारों और कृतियों का विश्लेषण विद्वान् अधिक प्रामाणिक ढंग से कर सकते हैं; मेरा उद्देश्य उस मनुष्य को समझना है जिसकी प्रतिभा स्वयं को समूची मानवता के लिए समर्पित कर सकी।
यह आत्मीयता केवल व्यक्तिगत नहीं है; इसमें सांस्कृतिक उत्तराधिकार (Ahnen) भी निहित है। आज समूचा विश्व गेटे का सम्मान करता है, किन्तु जर्मनों के लिए वे उस महान पूर्वज की तरह हैं जिसकी स्मृति इतिहास से आगे बढ़कर जीवन का हिस्सा बन जाती है। वे केवल विश्वकवि नहीं, उस सांस्कृतिक परम्परा की सजीव अभिव्यक्ति हैं जिसने साधारण नागरिक जीवन (Bürgertum) से उठकर सार्वभौमिक मानवता की ऊँचाइयों को स्पर्श किया।
फ्रैंकफर्ट का वह घर इसी सत्य का प्रतीक है। वह हमें सिखाता है कि विश्वव्यापी महानता का जन्म प्रायः अनुशासित, सुसंस्कृत और साधारण जीवन की भूमि पर ही होता है। गेटे जितने विश्व के थे, उतने ही अपने घर, अपने नगर और अपनी परम्परा के भी थे। उनकी यही दोहरी पहचान उन्हें अद्वितीय बनाती है।
गेटे को अनेक दृष्टियों से देखा जा सकता है। वे जर्मनी के शास्त्रीय सांस्कृतिक युग (klassische Epoche) के प्रतिनिधि हैं। उनके जीवन में आत्म-विकास (Selbstentwicklung) और शिक्षा अथवा संस्कार (Bildung) इस प्रकार एकाकार हो जाते हैं कि व्यक्ति और समाज के बीच एक जीवन्त सेतु बन जाता है। किन्तु उनकी महत्ता किसी एक युग में सीमित नहीं है। वे उन विरल व्यक्तित्वों में हैं जिनकी उपस्थिति समय की सीमाओं को पार कर आने वाली पीढ़ियों तक मानव-सभ्यता का मार्ग आलोकित करती रहती है।
जब मैं उस जन्म-गृह से बाहर निकला, तो मुझे लगा कि मैंने केवल एक ऐतिहासिक भवन नहीं देखा, बल्कि उस स्रोत का दर्शन किया है जहाँ से एक विराट सांस्कृतिक धारा प्रवाहित हुई। कुछ व्यक्तित्व अपने जीवनकाल से कहीं बड़े हो जाते हैं। गेटे उन्हीं में से एक हैं—अपने युग की उपलब्धि अवश्य, किन्तु उससे कहीं अधिक सम्पूर्ण मानवता की साझा विरासत।
2. कालजयी
गेटे को अनेक दृष्टियों से देखा जा सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि हम इतिहास के किस बिन्दु पर खड़े होकर उनकी ओर देखते हैं।
पहली दृष्टि उन्हें जर्मनी के उस शास्त्रीय युग का प्रतिनिधि मानती है जिसे जर्मन संस्कृति का स्वर्णकाल कहा जाता है। वह आदर्शवाद, आत्म-विकास और शिक्षा का युग था। उस समय यह विश्वास था कि मनुष्य अपनी अन्तर्निहित शक्तियों का विकास कर स्वयं को और समाज दोनों को ऊँचा उठा सकता है। गेटे के लिए यह केवल एक दार्शनिक विचार नहीं था, बल्कि आत्म-विकास और सांस्कृतिक परिष्कार (Bildung) का जीवन-दर्शन था। उनके व्यक्तित्व में व्यक्ति का विकास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक थे।
किन्तु केवल इसी दृष्टि से गेटे की सम्पूर्ण महत्ता नहीं समझी जा सकती। इंग्लैण्ड के महान चिन्तक थॉमस कार्लाइल ने गेटे को उन विरल व्यक्तित्वों में गिना जिनकी प्रेरणा शताब्दियों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहती है। इस कसौटी पर वे केवल अठारहवीं या उन्नीसवीं शताब्दी के लेखक नहीं, बल्कि कालातीत विश्वमानव बन जाते हैं।
उनके समकालीन भी उन्हें असाधारण श्रद्धा से देखते थे। अनेक लोग उन्हें “दैवीय मनुष्य” कहते थे। यह केवल प्रशंसा नहीं थी, बल्कि उस अनुभूति की अभिव्यक्ति थी कि उनके व्यक्तित्व में साधारण मानवीय सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक कुछ विद्यमान है। ऐसे व्यक्तित्व समय के साथ छोटे नहीं होते; प्रत्येक नई पीढ़ी उन्हें नए अर्थों में खोजती है।
किन्तु इन दोनों दृष्टियों—जर्मन संस्कृति के प्रतिनिधि और कालातीत विश्वमानव—के बीच एक तीसरी दृष्टि भी है, जिसे मैं सबसे महत्त्वपूर्ण मानता हूँ।
हम ऐसे संक्रमणकाल में जी रहे हैं जहाँ पुरानी सामाजिक व्यवस्था अपनी शक्ति खो रही है और नई व्यवस्था अभी पूर्ण रूप से आकार नहीं ले सकी है। ऐसे समय गेटे केवल एक महान कवि नहीं, बल्कि उस पाँच सौ वर्ष पुरानी यूरोपीय सांस्कृतिक परम्परा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति बनकर सामने आते हैं, जिसने पुनर्जागरण से लेकर आधुनिक युग तक बुद्धि, शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
गेटे का जन्म किसी राजपरिवार में नहीं, बल्कि फ्रैंकफर्ट के एक समृद्ध मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनका विश्वास था कि प्रतिभा के विकास के लिए यही सामाजिक धरातल सबसे अनुकूल है। वे कहते थे कि अत्यधिक कुलीनता और अपार सम्पत्ति भी कभी-कभी प्रतिभा के विकास में बाधा बन जाती है, जबकि मध्यवर्ग मनुष्य को संतुलन, अनुशासन और उत्तरदायित्व प्रदान करता है।
उन्होंने बार-बार नागरिक जीवन की गरिमा की प्रशंसा की। उनका प्रिय काव्य हर्मान उण्ड डोरोथिया (Hermann und Dorothea) इसी जीवन का उत्सव है। एक बार किसी ने उन्हें “संयमी कवि” कहा। उन्होंने इस विशेषण का न समर्थन किया, न विरोध; केवल इतना कहा कि यदि उनका स्वभाव ऐसा है, तो उसका निर्णय दूसरे लोग करें। यहीं गेटे के व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पक्ष सामने आता है। उनमें असाधारण प्रतिभा और साधारण नागरिक जीवन का अद्भुत समन्वय था। वे जितने महान कलाकार थे, उतने ही अनुशासित गृहस्थ; जितने विश्वमानव, उतने ही अपने समय के उत्तरदायी नागरिक।
शायद इसी कारण उनकी महानता हमें भयभीत नहीं करती। वह हमें अपने से दूर नहीं ले जाती, बल्कि यह विश्वास दिलाती है कि असाधारण ऊँचाइयाँ भी साधारण जीवन की मिट्टी से ही जन्म लेती हैं। यही गेटे की सबसे बड़ी मानवीय शक्ति है और उनके व्यक्तित्व का सबसे स्थायी आकर्षण।
3. साधारण जीवन की असाधारण गरिमा
गेटे के समकालीनों को उनका व्यक्तित्व जितना विलक्षण प्रतीत होता था, उतना ही सहज भी। वे उन प्रतिभाशाली व्यक्तियों में नहीं थे जिनकी प्रतिभा विचित्रता का पर्याय बन जाती है। एक समकालीन ने लिखा—“उनमें प्रतिभाशाली लोगों में प्रायः दिखाई देने वाली विलक्षणता का कोई चिह्न नहीं था। वे अत्यन्त सरल, विनम्र और शिष्ट थे।”
उनके व्यवहार में न कृत्रिम गंभीरता थी, न महापुरुष होने का प्रदर्शन। वे अपने ऊपर हँस सकते थे। चिन्तामुक्त क्षणों में उनमें बालसुलभ सहजता और पितृतुल्य स्नेह एक साथ दिखाई देते थे। लोगों की छोटी-छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रखना उन्हें सच्चा आनन्द देता था। वे जीवन को अधिक सरल और अधिक सुखद बनाने में विश्वास रखते थे। विशेषतः वे उन लोगों के प्रति संवेदनशील थे जिन्हें जीवन के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होती थी। ऐसे अवसरों पर वे बार-बार एक ही विचार पर लौटते—“सुखपूर्वक जीना।” देखने में यह साधारण, यहाँ तक कि मध्यवर्गीय आदर्श लगता है, किन्तु गेटे के लिए इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा था।
अपनी आत्मकथा काव्य और सत्य (Dichtung und Wahrheit) में वे लिखते हैं कि मनुष्य का आन्तरिक संतुलन प्रकृति की नियमित लय से जुड़ा है। दिन-रात का क्रम, ऋतुओं का परिवर्तन, फूलों का खिलना और फलों का पकना—प्रकृति की यह निरन्तरता मनुष्य के भीतर भी स्थिरता और प्रसन्नता का संचार करती है। जहाँ यह लय टूटती है, वहाँ जीवन असन्तुलित होने लगता है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि आत्महत्या जैसी चरम निराशा के पीछे भी इसी स्वाभाविक लय का विच्छेद कार्य करता है।
यही गेटे के जीवन-दर्शन की कुंजी है। उनके लिए जीवन का सौन्दर्य किसी असाधारण नाटकीयता में नहीं, बल्कि उसकी लय, संतुलन और स्वाभाविक प्रवाह में निहित है।
इसी कारण वे जीवन के छोटे-छोटे सुखों की भी उतनी ही कद्र करते थे जितनी उसके महान आदर्शों की। उन्हें उत्तम भोजन और पेय से लगाव था। उनके मित्र ज़ेल्टर द्वारा भेजी जाने वाली टेल्टो की कोमल गाजरों का वे स्नेहपूर्वक उल्लेख करते थे। यह प्रसंग तुच्छ प्रतीत हो सकता है, किन्तु वह बताता है कि गेटे के लिए जीवन की पूर्णता छोटी-छोटी प्रसन्नताओं से भी बनती है।
गृहस्थ के रूप में भी वे अत्यन्त व्यावहारिक थे। आर्थिक मामलों में सावधान रहते और अपने प्रकाशकों से व्यवहार करते समय भावुक नहीं होते। अपनी पुस्तकों का उचित मूल्य प्राप्त करना वे अपना अधिकार मानते थे। उनके लिए कला के प्रति समर्पण का अर्थ आर्थिक असावधानी कभी नहीं था।
व्यवस्था और अनुशासन के प्रति उनका अनुराग उन्हें अपने पिता से मिला था। पिता का एक अटल सिद्धान्त था—“जिस कार्य को आरम्भ करो, उसे पूरा किए बिना मत छोड़ो।” यदि परिवार में किसी पुस्तक का सामूहिक वाचन आरम्भ होता, तो वह चाहे कितनी ही नीरस क्यों न हो, अन्तिम पृष्ठ तक पढ़ी जाती। अधूरा छोड़ना स्वीकार्य नहीं था।
इस संस्कार ने बालक गेटे के व्यक्तित्व को गहराई से गढ़ा। स्वभाव से वे अत्यन्त जिज्ञासु थे और उनका मन निरन्तर नए विषयों की ओर आकर्षित होता था। यदि यह अनुशासन उन्हें न मिला होता, तो सम्भव है उनकी प्रतिभा अनेक दिशाओं में बिखर जाती।
यही अनुशासन आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी शक्ति बना। प्रतिभा उन्हें प्रकृति से मिली थी, किन्तु उसे महानता में रूपान्तरित करने का धैर्य उन्होंने संस्कार से अर्जित किया। वे केवल कल्पनाशील लेखक नहीं थे; अपनी कल्पना को पूर्ण कृति का रूप देने का संयम भी रखते थे।
गेटे का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि कला केवल प्रेरणा से नहीं बनती। प्रेरणा क्षणिक हो सकती है, पर महान कृतियाँ श्रम, धैर्य और निरन्तर साधना से जन्म लेती हैं। उनकी असाधारण उपलब्धियों के पीछे कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि अनुशासन, क्रमबद्ध परिश्रम और आत्मसंयम का दीर्घ इतिहास था।
इसीलिए उनकी महानता किसी अलौकिक वरदान का परिणाम नहीं लगती। वह मनुष्य की अर्जित क्षमता का प्रमाण बन जाती है। गेटे हमें सिखाते हैं कि प्रतिभा जन्मजात हो सकती है, किन्तु महानता का निर्माण अनुशासन, धैर्य और जीवन के प्रति गहरे उत्तरदायित्व से ही होता है।
4. महानता की साधना
गेटे का विश्वास था कि सच्ची प्रतिभा कभी उतावली नहीं होती। जो कलाकार केवल किसी रचना को शीघ्र पूरा कर लेने की चिन्ता करता है, वह प्रायः उसकी आत्मा तक नहीं पहुँच पाता। उसके लिए रचना एक लक्ष्य होती है; जबकि महान कलाकार के लिए सृजन स्वयं एक जीवनानुभव है।
एकरमान से बातचीत में उन्होंने कहा था—“अधूरा कलाकार किसी प्रकार काम समाप्त कर लेने की जल्दी में रहता है; किन्तु वास्तविक प्रतिभा को सबसे अधिक आनन्द उसी प्रक्रिया में मिलता है जिसमें विचार धीरे-धीरे अपने पूर्ण रूप को प्राप्त करता है।” दूसरे अवसर पर उन्होंने कहा—“यात्रा का आनन्द केवल गन्तव्य में नहीं, स्वयं यात्रा में है।” यह केवल साहित्य के बारे में नहीं, उनके सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का सार था।
गेटे का मानना था कि कुछ व्यक्तियों को किसी विषय पर निर्णय देने से पहले समय चाहिए। उन्हें उस विचार के साथ जीना पड़ता है। ऐसे लोग दूसरों को धीमे लग सकते हैं, किन्तु मानवता की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ प्रायः इसी धैर्य से जन्म लेती हैं। वे स्वयं भी ऐसे ही व्यक्ति थे।
उनकी सृजन-प्रक्रिया क्षणिक ज्वाला की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ते वृक्ष की थी। बीज वर्षों तक अदृश्य रहता है, किन्तु जब वह वृक्ष बनता है तो उसकी जड़ें भी उतनी ही गहरी होती हैं। गेटे की अधिकांश महान कृतियाँ इसी धैर्य की उपज थीं।
नोवेले (Novelle) लगभग तीस वर्षों तक उनके भीतर परिपक्व होती रही। एग्मॉन्ट (Egmont) को बारह वर्ष, इफिजेनिया (Iphigenie auf Tauris) को आठ, तास्सो (Torquato Tasso) को नौ और विल्हेल्म माइस्टर की शिक्षायात्रा (Wilhelm Meisters Lehrjahre) को लगभग सोलह वर्ष लगे। फ़ाउस्ट (Faust) तो लगभग चार दशकों तक उनके जीवन का सहयात्री बना रहा।
यह केवल परिश्रम का प्रमाण नहीं, उनके सृजन के स्वभाव का परिचायक है। वे नई योजनाओं के आकर्षण में पुरानी रचनाओं को छोड़ देने वाले लेखक नहीं थे। युवावस्था में जिन विषयों ने उन्हें स्पर्श किया, वे जीवन भर उनके भीतर विकसित होते रहे। अनुभव बढ़ता गया, दृष्टि विस्तृत होती गई और वही प्रारम्भिक बीज कालान्तर में विराट वृक्ष बन गए।
फ़ाउस्ट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। आरम्भ में वह विश्वविद्यालयों और विद्वानों पर व्यंग्य करती हुई एक नाटकीय रचना थी, जिसके केन्द्र में एक साधारण युवती की करुण प्रेमकथा थी। किन्तु गेटे ने उसे कभी छोड़ा नहीं। जीवन के प्रत्येक अनुभव ने उसे नया अर्थ दिया और अन्ततः वही कृति ज्ञान, इच्छा, पाप, मुक्ति और मानव-नियति का विश्व-साहित्यिक महाकाव्य बन गई।
विल्हेल्म माइस्टर का विकास भी इसी प्रकार हुआ। जो कथा आरम्भ में रंगमंच-प्रेमी एक युवक की कहानी थी, वही समय के साथ शिक्षा, संस्कृति, आत्म-विकास और समाज में मनुष्य के स्थान पर एक गहन दार्शनिक चिन्तन बन गई। एक जर्मन रोमानी चिन्तक ने तो यहाँ तक कहा कि आधुनिक युग को समझने के लिए तीन घटनाएँ पर्याप्त हैं—फ़्रांसीसी क्रान्ति, फिश्टे का दर्शन और विल्हेल्म माइस्टर।
यह रूपान्तरण किसी योजनाबद्ध महत्त्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। गेटे अपनी रचनाओं को महान बनाने का प्रयत्न नहीं करते थे; वे उन्हें केवल समय देते थे। समय के साथ वे स्वयं विकसित होती जाती थीं।
शायद उनकी सृजनशीलता का सबसे आकर्षक पक्ष यही है। उनमें न प्रदर्शन था, न अधीर महत्त्वाकांक्षा। वे प्रकृति की तरह काम करते थे। जैसे वृक्ष प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है और वर्षों बाद असंख्य लोगों को छाया देता है, वैसे ही उनकी रचनाएँ भी धीरे-धीरे सम्पूर्ण मानव-अनुभव को अपने भीतर समेटती चली गईं।
उन्होंने कहा था—“महान लक्ष्य तक पहुँचने के केवल दो मार्ग हैं—बल या धैर्य।” गेटे ने धैर्य का मार्ग चुना। उनके लिए सृजन कोई विजय-अभियान नहीं, बल्कि जीवन के साथ निभाई जाने वाली दीर्घ साधना था। निरन्तरता, धैर्य और समय के प्रति श्रद्धा—यही उनके सबसे बड़े उपकरण थे। शायद इसी कारण उनकी रचनाएँ अपने युग तक सीमित नहीं रहीं। उतावलेपन में लिखा गया साहित्य अपने समय के साथ समाप्त हो जाता है; धैर्य में परिपक्व हुआ साहित्य शताब्दियों का सहचर बन जाता है।
गेटे का सम्पूर्ण साहित्य इसी मौन, संयमित और दीर्घ साधना का अमर प्रमाण है।
5. प्रतिरोध नहीं, विकास
गेटे ने एक बार कहा था—“मनुष्य होने का अर्थ है संघर्ष करना।” किन्तु उनके यहाँ संघर्ष का अर्थ जीवन से युद्ध नहीं, बल्कि उसके साथ सृजनात्मक संवाद है। वे किसी विद्रोही टाइटन की तरह देवताओं को ललकारने वाले कवि नहीं थे। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि आकाश को चुनौती देने वाली टाइटैनिक मनोवृत्ति उनके स्वभाव से मेल नहीं खाती। वे कहते हैं—“मेरे स्वभाव के अधिक अनुकूल वह शान्त, धैर्यपूर्ण और रचनात्मक प्रतिरोध था जो उच्चतर शक्तियों के अस्तित्व को स्वीकार तो करता है, पर उनके सामने आत्मसमर्पण नहीं करता।”
यही गेटे के व्यक्तित्व का सार है। वे जीवन से संघर्ष नहीं करते; उसे समझने का प्रयत्न करते हैं। उनके लिए कवि का पहला दायित्व निर्णय देना नहीं, बल्कि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में ग्रहण करना है। इसीलिए उनके साहित्य में त्रासदी भी संतुलित रहती है। उन्होंने स्वीकार किया था कि यदि वे स्वयं को पूरी तरह त्रासदी के हवाले कर देते, तो शायद जीवित न रह पाते। उन्होंने जीवन की पीड़ाओं को देखा, पर उन्हें अपना स्थायी निवास नहीं बनने दिया। उनका स्वभाव अन्ततः जीवन की पुष्टि करने वाला था, उसके निषेध का नहीं।
इसी कारण रोमानी कवि नोवालिस (Novalis) को वे अत्यधिक व्यावहारिक प्रतीत होते थे। नोवालिस ने लिखा कि गेटे वैसे ही कवि हैं जैसे अंग्रेज़ अपने उद्योगों में होते हैं—सरल, उपयोगी, सुसंगठित और टिकाऊ। वे छोटी-से-छोटी वस्तु को भी पूर्णता तक पहुँचाना चाहते थे, जबकि दूसरे कलाकार ऐसे विराट स्वप्न देखते हैं जिन्हें पूरा करना सम्भव ही नहीं होता। पहली दृष्टि में यह आलोचना लग सकती है, किन्तु उसके भीतर गहरी प्रशंसा छिपी है।
वास्तव में गेटे की कला का सबसे बड़ा गुण उसकी स्वाभाविकता है। उसमें न कृत्रिम नाटकीयता है, न प्रभाव उत्पन्न करने का आग्रह। उनकी भाषा सहज प्रवाहित होती है और उसी सहजता में उसकी विलक्षण शक्ति निहित है। स्वयं नोवालिस ने स्वीकार किया कि गेटे की शैली साधारण से साधारण विषय को भी आकर्षक बना देती है और उसकी आन्तरिक एकता सम्पूर्ण रचना की आत्मा बन जाती है।
गेटे के यहाँ भाषा कभी लेखक की ओर ध्यान नहीं खींचती; वह पाठक को सीधे अनुभव तक ले जाती है। उसमें न कृत्रिम अलंकरण है, न अनावश्यक भावुकता। उनका गद्य और पद्य समान रूप से विचार की स्पष्टता और भावना की ऊष्मा का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करते हैं। तर्क और सौन्दर्य, बुद्धि और संवेदना—दोनों वहाँ सहयात्री बन जाते हैं।
उनकी भाषा में न पुरोहित की गंभीरता है, न उपदेशक का आग्रह। वह एक शिक्षित, सुसंस्कृत और आत्मविश्वासी मनुष्य की सहज वाणी है, जो पाठक पर प्रभाव नहीं डालती, बल्कि उसे अपने साथ चलने का निमन्त्रण देती है। सामान्य शब्द भी उनके हाथों में नया जीवन और नया अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। उनमें गरिमा है, आत्मीयता है, सादगी है और अप्रत्याशित गहराई भी। उनकी शैली में साहस है, पर उग्रता नहीं; संयम है, पर नीरसता नहीं।
शायद इसका कारण यह है कि गेटे कला को जीवन से अलग नहीं मानते थे। उनके लिए साहित्य कोई कृत्रिम संसार नहीं, बल्कि उसी जीवनधारा का विस्तार था जिसमें मनुष्य प्रेम करता है, दुःख सहता है, सीखता है और धीरे-धीरे परिपक्व होता है। इसीलिए उनकी रचनाओं में चमत्कार नहीं, विश्वसनीयता है; उत्तेजना नहीं, गहराई है; क्षणिक प्रभाव नहीं, स्थायी प्रकाश है।
उनकी कला हमें केवल विस्मित नहीं करती; वह हमें आश्वस्त भी करती है। वह यह विश्वास जगाती है कि सौन्दर्य किसी असाधारण घटना का परिणाम नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य और जीवन के प्रति अटूट निष्ठा से जन्म लेता है। सम्भवतः इसी कारण गेटे आज भी केवल पढ़े नहीं जाते—वे धीरे-धीरे हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।
6. यथार्थ की लय
गेटे की कला का एक विशिष्ट गुण उसका गहरा यथार्थबोध (Wirklichkeitssinn) है। यही विशेषता उन्हें अपने महान समकालीन और मित्र शिलर (Friedrich Schiller) से अलग करती है। जहाँ शिलर की रचनाओं में आदर्शवाद (Idealismus), नैतिक उत्कर्ष और स्वतंत्रता की आकांक्षा प्रमुख है, वहीं गेटे जीवन को उसकी समग्रता, जटिलता और विरोधाभासों सहित स्वीकार करते हैं।
युवावस्था में उनके मित्र मेर्क (Johann Heinrich Merck) ने उनसे कहा था—“तुम्हारा मार्ग यथार्थ को काव्य का रूप देना है। दूसरे लोग पहले अपने भीतर एक काव्यलोक रचते हैं और फिर उसे यथार्थ पर आरोपित करते हैं; परिणाम प्रायः कृत्रिम होता है।” गेटे ने इस बात को केवल स्मरण नहीं रखा; उसे अपने सृजन का आधार बना लिया।
वे कल्पना के विरोधी नहीं थे, किन्तु उनका विश्वास था कि महान कल्पना का जन्म भी जीवन की वास्तविक मिट्टी से होना चाहिए। कविता का उद्देश्य यथार्थ से पलायन नहीं, बल्कि उसके गहनतम अर्थों को प्रकाशित करना है। इसी भावना से उन्होंने कहा—“यथार्थ की आत्मा ही सच्चा आदर्श है।”
यह सुनने में विरोधाभासी लग सकता है, किन्तु गेटे के सम्पूर्ण साहित्य का यही केन्द्र है। वे आदर्श को जीवन से अलग किसी आकाश में नहीं खोजते; उनके लिए आदर्श वही है जो जीवन की गहराइयों से स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है।
यही दृष्टि उनके राजनीतिक विचारों में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा था कि किसी किसान का घर जल जाना एक वास्तविक त्रासदी है, जबकि “राष्ट्र के विनाश” जैसे वाक्य अनेक बार केवल नारे बनकर रह जाते हैं। इसका अर्थ राष्ट्र का तिरस्कार नहीं, बल्कि यह स्मरण कराना है कि वास्तविक जीवन मनुष्य के ठोस अनुभवों से बनता है, अमूर्त घोषणाओं से नहीं। किसी परिवार का दुःख, किसी मनुष्य की पीड़ा और किसी घर का उजड़ जाना—यही जीवन के वास्तविक सत्य हैं।
इसी कारण गेटे मूलतः राजनीतिक लेखक नहीं थे, यद्यपि वे समाज के प्रति उदासीन भी नहीं थे। वे मनुष्य की बाहरी नहीं, आन्तरिक स्वतंत्रता के पक्षधर थे। वे विचारों, विवेक और संवेदना को मुक्त करना चाहते थे। उन्होंने एक बार कहा था—“ब्ल्यूशर ने तुम्हें फ़्रांसीसियों से मुक्त कराया; मैंने तुम्हें संकीर्ण मानसिकता से मुक्त किया।” इसमें आत्मविश्वास है, अहंकार नहीं। वे जानते थे कि उनका कार्य युद्धभूमि में नहीं, मनुष्य की चेतना में है।
फ़ाउस्ट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उसमें प्रेम है, अपराध है, पश्चात्ताप है और ज्ञान की प्यास भी, किन्तु कहीं कोई राजनीतिक घोषणापत्र नहीं। ग्रेट्खेन की त्रासदी किसी व्यवस्था के विरुद्ध अभियोग नहीं बनती; वह मनुष्य की दुर्बलता, करुणा और नियति का शाश्वत चित्र बन जाती है। यही गेटे की शक्ति है—वे किसी विचारधारा के नहीं, मनुष्य के कवि हैं।
किन्तु उनके जीवन का एक प्रसंग हमें गहरे द्वन्द्व में डाल देता है। वाइमार की राज्य-परिषद् के सदस्य के रूप में उन्हें उस स्त्री के मुक़दमे पर निर्णय देना पड़ा जिस पर अपने नवजात शिशु की हत्या का आरोप था। अधिकांश सदस्य मृत्युदण्ड के पक्ष में थे। ड्यूक क्षमा देना चाहते थे, किन्तु गेटे ने भी निर्णय-पत्र पर केवल दो शब्द लिखे—“मैं भी।”
यही गेटे का सबसे कठिन पक्ष है। जिसने ग्रेट्खेन की करुणा का अमर चित्र रचा, वही प्रशासक राज्य की विधि-व्यवस्था के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। किन्तु सम्भवतः यही उनके व्यक्तित्व की सबसे गहरी कुंजी भी है। वे व्यक्ति और समाज के बीच किसी सरल समाधान की तलाश नहीं करते। वे जानते हैं कि करुणा आवश्यक है, पर व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। उनके भीतर कवि और प्रशासक एक-दूसरे का निषेध नहीं करते; वे निरन्तर एक-दूसरे को कठिन प्रश्न पूछते रहते हैं।
फ़्रांसीसी लेखक मॉरिस बारेस (Maurice Barrès) ने इफिजेनिया (Iphigenie auf Tauris) को “सभ्यता का नाटक” कहा था, क्योंकि उसमें व्यक्ति की उच्छृंखलता पर समाज के अधिकार की प्रतिष्ठा होती है। यह टिप्पणी केवल इफिजेनिया पर ही नहीं, गेटे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर लागू होती है। उन्होंने मनुष्य की आत्मा को मुक्त किया, पर कभी अराजकता का समर्थन नहीं किया। उन्होंने भावनाओं को गहराई दी, पर विवेक का परित्याग नहीं किया; स्वतंत्रता का सम्मान किया, पर उसे उत्तरदायित्व से कभी अलग नहीं किया।
इसीलिए गेटे किसी एक विचारधारा की सम्पत्ति नहीं बन सकते। वे हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल स्वतंत्र होना नहीं, बल्कि स्वतंत्र रहते हुए उत्तरदायी बने रहना है। सम्भवतः इसी कठिन संतुलन में उनकी महानता का सबसे स्थायी रहस्य निहित है।
7. जीवन : एक अन्वेषण
यदि गेटे के व्यक्तित्व को केवल उनकी संतुलित बुद्धि, अनुशासन और जीवन-प्रेम से समझने का प्रयास किया जाए, तो चित्र अधूरा रह जाएगा। उनके भीतर एक दूसरा संसार भी था—अधिक गहरा, अधिक रहस्यमय और कभी-कभी अस्थिर। वही उनकी महानता को पूर्ण बनाता है।
उनके अनेक समकालीनों ने इस पक्ष की ओर संकेत किया है। जर्मन राजनेता फ़ॉन म्यूलर (Friedrich von Müller) ने लिखा कि गेटे में निषेध की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति और संशयपूर्ण तटस्थता बार-बार प्रकट होती थी। एक यात्री ने तो यहाँ तक कहा—“उनकी एक आँख में देवदूत बसता था और दूसरी में शैतान।” यह केवल चतुर टिप्पणी नहीं, उनके व्यक्तित्व की गहरी द्वैतता का संकेत है।
शार्लोट फ़ॉन शिलर (Charlotte von Schiller) ने लिखा कि गेटे कभी-कभी ऐसी बातें कहते थे जिनमें परस्पर विरोधी अर्थ एक साथ समाहित रहते थे। वे मानो संसार को उसकी सम्पूर्ण जटिलता में देखते थे और किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी में नहीं होते थे।
यहीं प्रश्न उठता है—गेटे वास्तव में विश्वास किसमें करते थे? क्या वे मानवता की अनिवार्य प्रगति में विश्वास रखते थे? स्पष्ट उत्तर है—नहीं। उन्होंने लिखा—“यह झूला चलता रहेगा। एक वर्ग दुःख भोगेगा, दूसरा समृद्ध होगा। स्वार्थ और ईर्ष्या मनुष्य के भीतर सदैव सक्रिय रहेंगे, और दलों का संघर्ष कभी समाप्त नहीं होगा।”
यह निराशा नहीं, अनुभव की भाषा है। गेटे मनुष्य को जैसा है, वैसा स्वीकार करते हैं। वे उसके भीतर स्वर्ग और नरक दोनों को साथ-साथ देखते हैं।
क्या फिर उनकी आस्था कला में थी? इसका उत्तर भी सरल नहीं है। एक युवा लेखक ने उत्साह से कहा कि वह कला के लिए जीएगा और यदि आवश्यकता हुई तो कला के लिए मर भी जाएगा। गेटे ने शान्त स्वर में उत्तर दिया—“कला में कष्ट सहने की बात ही कहाँ है?” और दूसरी बार उन्होंने कहा—“कविता अपने-आप में बहुत बड़ी चीज़ नहीं है। वह संसार को दिया गया एक चुम्बन भर है। केवल चुम्बनों से सन्तान उत्पन्न नहीं होती।”
ये कथन कला के अवमूल्यन के लिए नहीं थे। गेटे केवल उसकी मूर्तिपूजा के विरोधी थे। उनके लिए कविता जीवन का विकल्प नहीं, उसकी अभिव्यक्ति थी। यदि जीवन ही अनुपस्थित हो, तो कविता का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता।
उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष लोगों को उलझाता था। इतने बड़े साहित्यकार और राजपुरुष होने पर भी वे अपरिचित लोगों के सामने सहज नहीं हो पाते थे। लोग इसे उनका अहंकार समझ लेते थे। किन्तु उनकी बहू ओटिली फ़ॉन गेटे (Ottilie von Goethe) ने इसका रहस्य बताया—यह अहंकार नहीं, संकोच का आवरण था। गेटे भीतर से अत्यन्त विनम्र थे और अनेक बार अपनी ही महानता के बोझ से असहज हो उठते थे।
वस्तुतः जितना व्यापक व्यक्तित्व होता है, उतनी ही कम उसमें आत्ममुग्धता होती है। गेटे को अपनी प्रतिभा का पूरा बोध था, फिर भी वे किसी आत्ममोह में नहीं जीते थे। शायद इसका कारण उनके व्यक्तित्व की वही गहरी द्वैतता थी।
वे किसी विचारधारा के सम्पूर्ण अनुयायी नहीं बने। किसी एक सत्य पर स्थिर होने के बजाय वे जीवन के प्रत्येक पक्ष को उसके अपने अधिकार के साथ देखते रहे। उनके भीतर मानो प्रकृति और आत्मा का निरन्तर संवाद चलता था। आत्मा स्पष्ट उत्तर चाहती है; प्रकृति रहस्यों को जन्म देती है। आत्मा व्यवस्था चाहती है; प्रकृति विविधता रचती है। आत्मा निर्णय करती है; प्रकृति केवल सृजन करती है।
गेटे ने अपना जीवन इन्हीं दोनों के बीच संतुलन खोजते हुए बिताया। शायद इसी कारण उनका साहित्य हमें कोई अन्तिम सिद्धान्त नहीं देता। वह जीवन की जटिलता के सामने हमें अधिक विनम्र, अधिक धैर्यवान और अधिक जिज्ञासु बनाता है।
महान लेखक हमारे प्रश्नों का अन्त नहीं करते; वे हमें बेहतर प्रश्न पूछना सिखाते हैं।
8. जीवन के योग्य होना
गेटे के आलोचकों ने प्रायः उन पर यह आरोप लगाया कि वे राजनीति के प्रति उदासीन थे, लोकतान्त्रिक आंदोलनों के प्रति उत्साहित नहीं थे और अपने युग के राष्ट्रीय संघर्षों से पर्याप्त रूप से नहीं जुड़े। बहुतों ने इसे उनके व्यक्तित्व की सीमा माना। किन्तु इस आलोचना में एक भूल थी। उन्होंने यह मान लिया कि राजनीति के प्रति उदासीन होना, मनुष्य के प्रति उदासीन होना भी है। गेटे के जीवन में ऐसा बिल्कुल नहीं था।
वास्तव में गेटे जितना मनुष्य-प्रेमी थे, उतना शायद ही कोई दूसरा लेखक रहा हो। उन्होंने एक बार कहा था कि किसी मानव-मुख का दर्शन मात्र भी उनके मन का विषाद दूर कर देता है। वे उस प्रसिद्ध मानवीय उक्ति से पूर्णतः सहमत थे कि “मनुष्य का सबसे बड़ा अध्ययन स्वयं मनुष्य है।”
उनका प्रेम किसी विचारधारा के लिए नहीं था; वह मनुष्य के लिए था। और मनुष्य, प्रेम तथा भविष्य—ये तीनों उनके लिए अलग-अलग विषय नहीं थे। वे एक ही जीवनधारा की भिन्न अभिव्यक्तियाँ थे।
इसी सन्दर्भ में गेटे ने एक नया शब्द गढ़ा—“जीवन के योग्य” (lebenswürdig)। जब मैंने युवावस्था में पहली बार यह शब्द पढ़ा, तो मैं ठिठक गया। उस समय मैं शोपेनहावर के गहन निराशावाद से प्रभावित था। मेरे लिए महानता का अर्थ था—संसार से विरक्ति, जीवन से दूरी और दुःख का गंभीर आलिंगन। ऐसे समय गेटे की यह अभिव्यक्ति मेरे सामने आई।
शिलर (Friedrich Schiller) की प्रसिद्ध कविता घण्टा (Das Lied von der Glocke) के उपसंहार में वे लिखते हैं—“क्या मृत्यु ऐसे मनुष्य को भी अपने साथ ले जाएगी, जो जीवन के योग्य है?”
“जीवन के योग्य”—यह केवल एक नया शब्द नहीं था; यह एक नया जीवन-दर्शन था। यहाँ जीवन स्वयं सर्वोच्च मूल्य बन जाता है। मानो जीवन किसी सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो और वह उन लोगों को अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान करता हो जिन्होंने अपने आचरण, अपने कर्म और अपनी चेतना से स्वयं को उसके योग्य सिद्ध किया हो। यह विचार मेरे लिए बिल्कुल नया था।
मैं अब तक महानता को जीवन से ऊपर उठने में देखता आया था; गेटे ने पहली बार यह सम्भावना दिखाई कि महानता जीवन को पूरी निष्ठा से स्वीकार करने में भी हो सकती है। यह वही नागरिक चेतना है, जो धरती पर दृढ़तापूर्वक खड़े रहने में विश्वास करती है। इसमें किसी प्रकार का पलायन नहीं है। इसमें संसार का निषेध नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी स्वीकार है। और इसी कारण गेटे कभी-कभी उन लोगों पर व्यंग्य भी करते हैं जो वास्तविक जीवन से दूर रहकर केवल अप्राप्य आदर्शों के पीछे भागते रहते हैं।
किन्तु यहाँ एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। क्या स्वयं गेटे का जीवन सुखी था? इतनी प्रतिभा, इतना सम्मान, इतनी दीर्घ आयु—क्या यह सब उन्हें एक सन्तुष्ट मनुष्य बना सका? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं गेटे ने दिया है, और वह अत्यन्त आश्चर्यजनक है।
जब लोगों ने उनके जीवन को अत्यन्त भाग्यशाली कहा, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में उसका खण्डन किया। उन्होंने कहा—“शान्त हो जाइए। मेरा जीवन उतना सुखी नहीं था जितना लोग समझते हैं। यदि मेरे जीवन के सभी सचमुच आनन्दमय क्षणों को एकत्र कर दिया जाए, तो वे कुल मिलाकर चार सप्ताह से भी अधिक नहीं होंगे।”
यह स्वीकारोक्ति जितनी सरल है, उतनी ही मार्मिक भी। फिर वे उसके पीछे का कारण बताते हैं—“मेरे ऊपर बाहरी और भीतरी—दोनों प्रकार के दायित्व इतने अधिक थे कि सुख का अवकाश ही कहाँ था।”
यहीं गेटे के जीवन का सबसे गहरा सत्य छिपा है। महान प्रतिभा केवल वरदान नहीं होती; वह एक दायित्व भी होती है। जितनी बड़ी प्रतिभा, उतनी ही बड़ी अपेक्षाएँ—अपने भीतर से भी और संसार से भी।
गेटे का जीवन निरन्तर कर्म, अध्ययन, लेखन, प्रशासन, विज्ञान, मित्रता और आत्म-विकास के बीच विभाजित रहा। संसार उनसे निरन्तर कुछ चाहता था, और उनका अपना अन्तर्मन उनसे उससे भी अधिक की अपेक्षा करता था। यही कारण है कि उनका जीवन बाहर से जितना सम्पन्न दिखाई देता है, भीतर से उतना ही श्रमसाध्य था।
इसके साथ एक और प्रश्न जुड़ा है। इतनी सृजनात्मक शक्ति रखने वाला मनुष्य क्या पूर्णतः स्वस्थ भी हो सकता है?
गेटे का उत्तर यहाँ भी अत्यन्त सूक्ष्म है। वे कहते हैं कि असाधारण प्रतिभा कभी साधारण अर्थों में सामान्य नहीं होती। ऐसी प्रतिभा के लिए अत्यन्त संवेदनशील मानसिक और शारीरिक संरचना आवश्यक होती है। वही उसे उन सूक्ष्म अनुभूतियों तक पहुँचाती है जहाँ सामान्य मनुष्य नहीं पहुँच पाता। किन्तु यही संवेदनशीलता उसे आघातों के प्रति अधिक असुरक्षित भी बना देती है।
उन्होंने एकरमान से कहा था—“असाधारण उपलब्धियाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म और संवेदनशील संगठन की अपेक्षा करती हैं। ऐसी प्रकृति सामान्य से अधिक तीव्रता से अनुभव करती है और स्वर्गीय स्वर भी सुन सकती है। परन्तु यदि इस संवेदनशीलता के साथ असाधारण धैर्य और दृढ़ता न जुड़ी हो, तो उसका परिणाम दीर्घकालिक रोग भी हो सकता है।”
यही गेटे की दृष्टि में प्रतिभा का रहस्य है।
प्रतिभा केवल तीव्र अनुभूति नहीं है। प्रतिभा वह शक्ति भी है जो उस अनुभूति का भार जीवन भर उठाए रख सके।
संवेदनशीलता और धैर्य—इन दोनों का यह अद्भुत संयोग ही गेटे के व्यक्तित्व का वास्तविक आधार था। इसीलिए उन्होंने बयासी वर्ष की दीर्घ आयु केवल जीवित रहकर नहीं बिताई; उन्होंने उसे निरन्तर सृजन में रूपान्तरित किया।
उन्होंने एक बार विस्मय से कहा था—“जिसने बीस वर्ष की आयु में ‘वेर्थर’ लिखा हो, वह सत्तर वर्ष की आयु तक कैसे जीवित रह सकता है?” इस प्रश्न में विनोद भी है, विस्मय भी, और आत्मस्वीकृति भी।
गेटे का उत्तर उनके जीवन ने स्वयं दिया। वे इसलिए जीवित रहे कि उनके भीतर जीवन के प्रति आस्था कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने केवल दीर्घ जीवन नहीं जिया; उन्होंने स्वयं को जीवन के योग्य सिद्ध किया।
9. वियोगी से विश्वबंधु
युवावस्था में गेटे ने जिस कृति से समूचे यूरोप को झकझोर दिया, वह थी युवा वेर्थर के दुःख (Die Leiden des jungen Werthers)। इस छोटे-से उपन्यास ने पाठकों पर ऐसा गहरा प्रभाव डाला कि अनेक युवाओं ने स्वयं को उसके नायक में देखना आरम्भ कर दिया। उसकी भावुकता, उसकी निराशा और उसके आत्मघाती अन्त ने एक पूरी पीढ़ी की संवेदना को स्पर्श किया।
किन्तु वृद्धावस्था में गेटे स्वयं इस पुस्तक से लगभग भयभीत हो उठे। उन्होंने स्वीकार किया कि उसके प्रकाशित होने के बाद उन्होंने उसे केवल एक बार पुनः पढ़ा। उसके बाद वे जान-बूझकर उससे दूर रहे। वे कहते हैं—“उसमें सब कुछ बारूद की तरह है। उसे पढ़ते ही मैं फिर उसी मानसिक अवस्था में लौटने लगता हूँ, जिसमें वह पुस्तक लिखी गई थी।”
यह स्वीकारोक्ति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
युवावस्था का गेटे और परिपक्व आयु का गेटे एक-दूसरे से भिन्न नहीं थे, पर वे एक-दूसरे का अतिक्रमण कर चुके थे। उन्होंने अपने भीतर के आवेग को नकारा नहीं, किन्तु उसे जीवन का अन्तिम सत्य भी नहीं माना।
इसीलिए अपने उत्तरकाल में वे बार-बार कहते हैं कि कला का उद्देश्य केवल व्यथा का चित्रण करना नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन के प्रति अधिक समर्थ बनाना भी है। उन्होंने अपने समय की उस कविता की आलोचना की जिसे वे व्यंग्य में “अस्पताल की कविता” कहते थे—ऐसी कविता जो केवल घाव दिखाती है, पर जीवन की शक्ति नहीं जगाती।
इसके विपरीत वे स्पार्टा के उन युद्ध-गीतों की प्रशंसा करते थे जो सैनिकों को मृत्यु का नहीं, जीवन का साहस देते थे।
फिर भी गेटे कभी अपने अतीत से इनकार नहीं करते। उन्होंने वेर्थर लिखा था, और वे जानते थे कि उसमें एक सच्चा अनुभव बोल रहा था। वे केवल इतना चाहते थे कि मनुष्य उस अनुभव में स्थायी निवास न बना ले।
यही संतुलन उनके नैतिक विचारों में भी दिखाई देता है। सामान्य नागरिक दृष्टि से देखें तो समाज की नींव नैतिकता पर टिकी होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि गेटे जैसे अनुशासित व्यक्ति कठोर नैतिकतावादी होंगे। किन्तु आश्चर्य यह है कि वे जीवन को नैतिक नियमों से कहीं अधिक व्यापक मानते हैं। वे आवेग, उत्कटता और यहाँ तक कि उस मानसिक तीव्रता का भी बचाव करते हैं जिसे सामान्य समाज कभी-कभी विकृति कह देता है।
एक बार उनके एक शिष्य ने कहा कि बायरन की रचनाएँ नैतिक दृष्टि से सन्दिग्ध हैं, इसलिए वे मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में विशेष सहायक नहीं हो सकतीं। गेटे ने तुरन्त उत्तर दिया—“ऐसा क्यों? बायरन का साहस, उसका दुस्साहस, उसकी विराटता—क्या ये मनुष्य को ऊँचा नहीं उठाते? हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए कि विकास केवल उस चीज़ से नहीं होता जिसे हम शुद्ध और नैतिक कह देते हैं।”
यह उत्तर गेटे के सम्पूर्ण जीवन-दर्शन को उद्घाटित करता है। वे नैतिकता के विरोधी नहीं हैं; वे जीवन को नैतिकता से बड़ा मानते हैं। उनके लिए मनुष्य का विकास केवल सदाचार से नहीं होता; वह संघर्ष, भूल, आवेग, पीड़ा और आत्म-संघर्ष से भी होता है। जीवन की सम्पूर्णता को स्वीकार किए बिना मनुष्य को समझा नहीं जा सकता।
इसीलिए गेटे का साहित्य कभी उपदेश नहीं देता। वह मनुष्य का न्याय करने के बजाय उसे समझने का प्रयास करता है।
शायद यही कारण है कि वे किसी एक विचारधारा के कवि नहीं बन सके। वे न तो अन्ध-आदर्शवादी थे, न अन्ध-यथार्थवादी। वे जीवन के प्रत्येक पक्ष को उसके अपने सत्य के साथ स्वीकार करना चाहते थे। उनके भीतर व्यवस्था का सम्मान था, किन्तु स्वतंत्रता का भी। उनके भीतर विवेक था, किन्तु कल्पना भी। उनके भीतर अनुशासन था, किन्तु आवेग के प्रति करुणा भी। यही व्यापकता उन्हें केवल जर्मनी का कवि नहीं रहने देती; वे मानव-स्वभाव के कवि बन जाते हैं।
इसी व्यापक दृष्टि के कारण उन्होंने साहित्य की सीमाएँ भी अपने देश तक सीमित नहीं रहने दीं। जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ी, उनका विश्वास दृढ़ होता गया कि महान साहित्य किसी एक भाषा या राष्ट्र की निजी सम्पत्ति नहीं होता। वह सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर बन जाता है।
उनकी दृष्टि में उत्कृष्ट रचना अपनी जन्मभूमि से कहीं बड़ी होती है। वह सीमाओं का अतिक्रमण करती है, नई भाषाओं में प्रवेश करती है और विभिन्न संस्कृतियों के मनुष्यों को एक-दूसरे के निकट ले आती है। साहित्य का भविष्य उनके लिए प्रतिस्पर्धा में नहीं, संवाद में था; अलगाव में नहीं, पारस्परिक आदान-प्रदान में।
यही विचार आगे चलकर उनके सांस्कृतिक चिन्तन का एक महत्त्वपूर्ण आधार बना और आधुनिक साहित्यिक इतिहास की सबसे प्रभावशाली अवधारणाओं में विकसित हुआ। यह केवल भविष्यवाणी नहीं थी; यह एक सांस्कृतिक घोषणा थी। गेटे ने साहित्य को सीमाओं के भीतर कैद करने से इनकार कर दिया। उनके लिए भाषा अलग हो सकती है, पर मनुष्य एक ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी उत्कृष्ट साहित्य जन्म लेता है, वह अन्ततः पूरी मानवता की सम्पत्ति बन जाता है।
आज, जब विश्व पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है, गेटे की यह बात और भी अधिक सत्य प्रतीत होती है। उन्होंने अपने समय से बहुत आगे देखकर यह समझ लिया था कि भविष्य की सभ्यता संवाद पर आधारित होगी, संकीर्णता पर नहीं; आदान-प्रदान पर, अलगाव पर नहीं। और इसी प्रकार गेटे स्वयं भी एक राष्ट्रीय कवि से आगे बढ़कर विश्व-साहित्य के प्रथम सच्चे नागरिक बन गए।
10. विश्व-साहित्य का सूर्योदय
गेटे का जीवन जितना आगे बढ़ता गया, उनकी दृष्टि उतनी ही व्यापक होती गई। आरम्भ में वे जर्मनी के कवि थे; फिर वे यूरोप के लेखक बने; और अन्ततः उनकी चेतना समूची मानवता को अपना पाठक मानने लगी।
यह परिवर्तन किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं था। वे स्वयं अपने अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि कोई भी राष्ट्र अपनी साहित्यिक उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन अकेले नहीं कर सकता। उन्होंने एक बार कहा था—
“कोई भी राष्ट्र अपनी कृतियों और अपने साहित्य का अन्तिम न्यायाधीश नहीं हो सकता। यही बात किसी एक युग के बारे में भी कही जा सकती है।”
इस कथन में गहरी विनम्रता निहित है। गेटे समझते थे कि किसी रचना का वास्तविक मूल्य तभी प्रकट होता है जब वह अपने समय और अपने देश की सीमाओं को पार कर दूसरे मनुष्यों के जीवन में प्रवेश करती है।
इसी व्यापक दृष्टि को उन्होंने विश्व-साहित्य (Weltliteratur) की संज्ञा दी। उनके लिए यह केवल एक साहित्यिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य का सांस्कृतिक आदर्श था। उनका विश्वास था कि विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच निरन्तर संवाद ही साहित्य को उसकी पूर्णता प्रदान करता है। उन्होंने लिखा—
“राष्ट्रीय साहित्य का युग अब अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है। अब विश्व-साहित्य का युग आरम्भ होने वाला है, और प्रत्येक लेखक को उसके आगमन में अपना योगदान देना चाहिए।”
इस विचार की वास्तविक शक्ति केवल उसके सिद्धान्त में नहीं थी; उसका प्रमाण स्वयं गेटे का जीवन बन चुका था। वे अपने जीवनकाल में ही देख रहे थे कि उनकी रचनाएँ भाषाओं और सीमाओं को पार कर नए पाठकों तक पहुँच रही हैं। विश्व-साहित्य उनके लिए कोई अमूर्त कल्पना नहीं रहा; वह उनके अपने अनुभव का प्रत्यक्ष सत्य बन चुका था।
स्कॉटलैण्ड के महान चिन्तक थॉमस कार्लाइल ने उनके उपन्यास विल्हेल्म माइस्टर का अंग्रेज़ी अनुवाद उन्हें भेंट किया। उसके साथ भेजे गए पत्र में एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति गहरा सम्मान झलकता था।
उन्होंने फ़्रांसीसी भाषा में प्रकाशित फ़ाउस्ट का संस्करण देखा, जिसमें महान चित्रकार यूजीन डेलाक्रोआ के चित्र अंकित थे। एडिनबरा, पेरिस और मॉस्को की पत्रिकाओं में उनके नवीनतम लेखन पर गंभीर समीक्षाएँ प्रकाशित हो रही थीं। यह सब देखकर उन्हें अनुभव हुआ कि उनकी रचनाएँ अब केवल जर्मनी की नहीं रहीं; वे अनेक संस्कृतियों के बीच अपना नया जीवन प्राप्त कर रही थीं।
स्वदेश में उन्हें आलोचना भी मिली, उपेक्षा भी मिली, यहाँ तक कि कटुता का सामना भी करना पड़ा। किन्तु विदेशों में उन्हें जिस उदारता और सम्मान के साथ पढ़ा गया, उसने उनके विश्वास को और दृढ़ किया कि साहित्य की वास्तविक मातृभूमि सम्पूर्ण मानवता है।
एक फ़्रांसीसी लेखक ने इस भावना को अत्यन्त सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया—“विदेशी ही हमारा समकालीन भविष्य है।” अर्थात् जो स्वीकृति आज सीमाओं के पार से आती है, वही कल इतिहास का निर्णय बन सकती है।
गेटे के निधन के बाद बीते दशकों ने उनकी इस दूरदृष्टि को और अधिक सत्य सिद्ध किया। यातायात के साधनों का विकास हुआ। अनुवादों की संख्या बढ़ी। विभिन्न देशों के लेखक एक-दूसरे को पढ़ने और उनसे सीखने लगे। संसार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक निकट आ गया।
निस्सन्देह इस प्रक्रिया के अपने खतरे भी हैं। कभी-कभी लोकप्रियता को ही विश्वव्यापी महत्ता समझ लिया जाता है। जो पुस्तक अनेक देशों में बिकती है, वह आवश्यक नहीं कि शाश्वत साहित्य भी हो। अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि और साहित्यिक मूल्य समानार्थी नहीं हैं।
किन्तु इस सम्भावित भ्रम से गेटे की मूल दृष्टि का महत्त्व कम नहीं होता। उनका आग्रह केवल इतना था कि लेखक अपनी भाषा और संस्कृति से गहरे जुड़ा रहे, किन्तु अपनी चेतना को उनकी सीमाओं में बन्द न कर दे। जो साहित्य अपनी स्थानीय जड़ों को सुरक्षित रखते हुए समूची मानवता से संवाद कर सके, वही दीर्घजीवी होता है।
गेटे स्वयं इसका सर्वोत्तम उदाहरण थे। उनकी जड़ें जर्मनी की मिट्टी में थीं, किन्तु उनकी शाखाएँ सम्पूर्ण विश्व में फैल चुकी थीं। वे केवल एक राष्ट्र के गौरव नहीं बने; वे मानव सभ्यता की साझा सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गए।
उनकी दृष्टि में साहित्य का भविष्य प्रतिस्पर्धा में नहीं, संवाद में था; वर्चस्व में नहीं, सहभागिता में; और संकीर्ण राष्ट्रीय गौरव में नहीं, बल्कि उस मानवीय चेतना में जो अनेक भाषाओं में व्यक्त होकर भी एक-दूसरे को पहचान लेती है।
आज, जब संसार पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है और साथ ही पहले से कहीं अधिक विभाजित भी दिखाई देता है, गेटे का यह स्वप्न पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। उनके लिए विश्व-साहित्य मनुष्य की उस साझा चेतना का नाम था जो सीमाओं का अतिक्रमण करके संवाद, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान की नई सम्भावनाएँ रचती है।
यही उनकी सबसे दूरदर्शी सांस्कृतिक विरासत है।
11. भविष्यदृष्टा
गेटे के व्यक्तित्व का एक अत्यन्त रोचक पक्ष यह है कि वे अतीत के महापुरुष होते हुए भी भविष्य के चिन्तक थे। सामान्यतः बढ़ती आयु मनुष्य को स्मृतियों की ओर ले जाती है; किन्तु गेटे की दृष्टि जीवन के अन्तिम वर्षों में भी भविष्य पर लगी रही।
उनके लिए विश्व-साहित्य की अवधारणा केवल आरम्भ थी। उससे आगे वे ऐसी मानव-सभ्यता की कल्पना कर रहे थे जिसमें राष्ट्र अधिक निकट आएँ, ज्ञान की सीमाएँ टूटें और विज्ञान मानव जीवन को नए आयाम दे।
इस भविष्य-दृष्टि का एक प्रतीकात्मक प्रसंग उल्लेखनीय है। जीवन के उत्तरार्ध में उनकी भेंट युवा दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) से हुई। गेटे ने उसका शोध-प्रबन्ध पढ़ा था। सभा में प्रवेश करते ही वे सीधे उसके पास गए, उसका हाथ थामा और उसके कार्य की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की।
वह केवल दो व्यक्तियों की भेंट नहीं थी; मानो यूरोप की दो महान बौद्धिक धाराएँ आमने-सामने खड़ी हों—एक ओर जीवन के महाकवि गेटे, दूसरी ओर शोपेनहावर, जिसका दर्शन आगे चलकर यूरोपीय निराशावाद की सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्ति बना। उसी परम्परा में आगे रिखर्ड वाग्नर (Richard Wagner) और फ़्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) आए।
मेरी पीढ़ी के लिए ये चारों नाम यूरोपीय बौद्धिक आकाश के उज्ज्वल नक्षत्र थे। वे हमारी वैचारिक वंश-परम्परा का हिस्सा बन गए थे, क्योंकि संस्कृति का उत्तराधिकार रक्त से उतना नहीं, जितना विचारों से निर्मित होता है। गेटे ने कहा था—“कलाकार का एक वंश होना चाहिए। उसे यह जानना चाहिए कि वह कहाँ से आया है।”
किन्तु गेटे की दृष्टि केवल अतीत तक सीमित नहीं थी। उनकी अन्तिम कृति विल्हेल्म माइस्टर की यात्राएँ (Wilhelm Meisters Wanderjahre) में वे ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जो पारम्परिक नागरिक व्यवस्था से आगे बढ़ चुका है। वहाँ वे व्यक्ति-केंद्रित आदर्श से आगे बढ़कर सहयोग, विशेषज्ञता और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित समाज की ओर संकेत करते हैं।
उनके अनुसार आधुनिक जीवन इतना जटिल हो चुका है कि कोई एक व्यक्ति सम्पूर्ण ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। पूर्णता अब केवल समाज में सम्भव है।
इसी विचार का विस्तार उनकी प्रसिद्ध ‘शैक्षिक प्रान्त’ (Pädagogische Provinz) की कल्पना में मिलता है। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत प्रतिभा का विकास नहीं, बल्कि ऐसा समाज निर्मित करना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट क्षमता से समष्टि की सेवा करे। इस व्यवस्था में अनुशासन है, सहयोग है और उत्तरदायित्व भी। यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं, बल्कि अपने दायित्व का बोध है।
गेटे के इस रूप को देखकर आश्चर्य होता है। जिस व्यक्ति ने यूरोपीय नागरिक संस्कृति को उसकी सर्वोच्च अभिव्यक्ति दी, वही अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में उस संस्कृति से आगे बढ़ने की सम्भावनाओं पर विचार कर रहा था। महानता का यही लक्षण है—वह अपने ही विचारों को अन्तिम सत्य नहीं मानती; वह स्वयं का भी अतिक्रमण करती रहती है।
गेटे किसी विचारधारा के कैदी नहीं थे। वे जीवन के विद्यार्थी बने रहे। अनुभव के साथ उनकी दृष्टि भी विकसित होती गई। शायद इसी कारण वे आज भी आधुनिक प्रतीत होते हैं।
वे हमें अतीत से प्रेम करना सिखाते हैं, पर उसमें जीना नहीं; परम्परा का सम्मान करना सिखाते हैं, पर उसे भविष्य का विकल्प नहीं बनने देते। यही गुण उन्हें केवल अपने युग का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि आने वाले युगों का सहयात्री बना देता है।
12. जन्म मिला खिलने के लिए
गेटे के जीवन के अन्तिम वर्षों का एक अत्यन्त रोचक पक्ष यह है कि उनकी रुचि केवल साहित्य और दर्शन तक सीमित नहीं रही। जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ी, उनका मन विज्ञान, प्रौद्योगिकी और मानव-सभ्यता के भविष्य की ओर अधिक आकर्षित होने लगा। यह परिवर्तन किसी कवि के लिए असामान्य प्रतीत हो सकता है, किन्तु गेटे के लिए नहीं। वे उन विरले व्यक्तियों में थे जिनके लिए कविता और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। दोनों सत्य की खोज के भिन्न-भिन्न मार्ग थे। इसीलिए वृद्धावस्था में वे उन विशाल अभियान्त्रिक परियोजनाओं के प्रति अद्भुत उत्साह दिखाते हैं जिनकी कल्पना उस समय अधिकांश लोगों के लिए केवल स्वप्न थी।
उन्हें विशेष रूप से उस योजना ने आकर्षित किया जिसमें पनामा स्थलडमरूमध्य को काटकर अटलांटिक और प्रशान्त महासागरों को जोड़ने का विचार था। वे बार-बार इस परियोजना की चर्चा करते थे। केवल उसका उल्लेख ही नहीं करते थे, बल्कि उसके आर्थिक, सांस्कृतिक और मानवीय परिणामों पर विस्तार से विचार करते थे। उन्हें विश्वास था कि यदि यह कार्य सम्पन्न हुआ, तो वह केवल दो समुद्रों को नहीं जोड़ेगा; वह संसार के इतिहास को बदल देगा। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह कार्य संयुक्त राज्य अमेरिका करेगा, और उसके परिणामस्वरूप प्रशान्त महासागर के तट पर नए नगर बसेंगे, नए व्यापारिक मार्ग खुलेंगे और मानव-सभ्यता का एक नया अध्याय आरम्भ होगा। यह केवल एक अभियान्त्रिक परियोजना नहीं थी; यह गेटे की भविष्य-दृष्टि का प्रतीक थी।
उन्हीं दिनों वे दो और महान योजनाओं का उल्लेख बड़े उत्साह से करते थे—राइन और डैन्यूब नदियों को जोड़ने की योजना तथा स्वेज़ नहर के निर्माण का विचार। इन योजनाओं की चर्चा करते समय उनका उत्साह किसी वृद्ध कवि का नहीं, बल्कि किसी युवा अभियन्ता का प्रतीत होता है। उन्होंने एक बार कहा—“यदि इन सबको अपनी आँखों से देख सकूँ, तो इस पृथ्वी पर पचास वर्ष और जीवित रहने की इच्छा हो सकती है।” इस वाक्य में गेटे का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बोल उठता है। वे अतीत की स्मृतियों में नहीं जी रहे थे; वे भविष्य की प्रतीक्षा कर रहे थे।
उनकी दृष्टि अपने नगर, अपने राज्य या अपने राष्ट्र तक सीमित नहीं थी। वे सम्पूर्ण पृथ्वी को एक विकसित होती हुई मानवीय सभ्यता के रूप में देखते थे। उनकी यह दृष्टि फ़ाउस्ट के अन्तिम भाग में भी दिखाई देती है। आश्चर्य की बात है कि उस महान काव्य का चरम क्षण किसी रहस्यवादी अनुभूति में नहीं आता। वह तब आता है जब फ़ाउस्ट एक दलदली भूमि को सुखाकर उसे मनुष्य के उपयोग के योग्य बनाने का स्वप्न देखता है।
कई लोगों को यह अन्त अत्यन्त व्यावहारिक लगा। उन्हें लगा कि इतना महान काव्य किसी उपयोगितावादी योजना पर क्यों समाप्त होता है। किन्तु वास्तव में यही गेटे का दर्शन है। उनके लिए मनुष्य की सर्वोच्च उपलब्धि केवल सौन्दर्य का सृजन नहीं है; वह संसार को रहने योग्य बनाना भी है। सृजन का सर्वोच्च रूप वही है जो मानव-जीवन को अधिक स्वतंत्र, अधिक सुरक्षित और अधिक समृद्ध बनाए।
यहीं गेटे की आधुनिकता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है। वे विज्ञान का स्वागत इसलिए नहीं करते कि वह शक्ति देता है। वे उसका स्वागत इसलिए करते हैं कि वह मनुष्य को जोड़ता है।
संचार, परिवहन, व्यापार और ज्ञान—इन सबके विस्तार में वे मानवता के अधिक निकट आने की सम्भावना देखते हैं। उनकी दृष्टि में प्रगति का अर्थ केवल मशीनों की वृद्धि नहीं था; वह मनुष्यों के बीच बढ़ती हुई सहभागिता थी। इसीलिए उनका विश्व-प्रेम किसी साम्राज्यवादी विस्तार की आकांक्षा नहीं था। यदि उसमें कोई सार्वभौमिक आकांक्षा थी, तो वह केवल प्रेम की थी—ऐसी चेतना की, जो राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानवता को अपना परिवार मानती है।
उनके लिए महानता का अर्थ दूसरों पर अधिकार स्थापित करना नहीं था; महानता का अर्थ था—अधिक से अधिक मनुष्यों के जीवन में भागीदार बनना। आज, जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने वास्तव में पृथ्वी को पहले से कहीं अधिक निकट ला दिया है, गेटे की यह दूरदृष्टि विस्मित करती है। उन्होंने उस युग की कल्पना की थी जिसमें समुद्र, महाद्वीप और संस्कृतियाँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक गहराई से एक-दूसरे से जुड़ेंगी।
उनकी कल्पना केवल साहित्य तक सीमित नहीं थी; वह सम्पूर्ण मानव-सभ्यता के भविष्य को अपने भीतर समेटे हुए थी। इसी कारण गेटे केवल कवि नहीं थे। वे उन दुर्लभ मनीषियों में थे जो यह समझ चुके थे कि संस्कृति, विज्ञान और मानव-प्रगति—ये तीनों अन्ततः एक ही यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं। और उस यात्रा का अन्तिम उद्देश्य केवल अधिक ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि मनुष्य को अधिक मानवीय बनाना है।
13. उत्क्रान्ति का उद्घोष
यदि गेटे के उत्तरकालीन विचारों को एक सूत्र में बाँधा जाए, तो कहा जा सकता है कि वे अपने युग से कहीं आगे देख रहे थे। वे केवल उस संसार के कवि नहीं थे जिसमें वे जी रहे थे; वे उस संसार के भी चिन्तक थे जो अभी जन्म लेना बाकी था।
उनकी दृष्टि में मध्यवर्गीय युग—जिसने यूरोप को विज्ञान, शिक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और संस्कृति की महान उपलब्धियाँ दी थीं—अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुका था। अब उसके सामने एक नई परीक्षा थी। क्या वह स्वयं को बदलने का साहस करेगा, या अपने ही अतीत से चिपककर इतिहास के किनारे खड़ा रह जाएगा?
गेटे का उत्तर स्पष्ट था। उनके अनुसार प्रत्येक सभ्यता तभी जीवित रहती है जब वह अपने भीतर आत्म-परिवर्तन की क्षमता बनाए रखे। जो समाज केवल अपनी पुरानी उपलब्धियों का उत्सव मनाता है, वह धीरे-धीरे अपनी सृजनात्मक शक्ति खो देता है। इसीलिए वे बार-बार भविष्य की ओर संकेत करते हैं।
उनकी दृष्टि में आने वाला युग अधिक संगठित होगा, अधिक सहयोगी होगा और अधिक विवेकपूर्ण भी। अनावश्यक दुःखों को केवल भाग्य का खेल मानकर स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। मनुष्य अपनी बुद्धि, अपने विज्ञान और अपने सामूहिक प्रयत्न से जीवन को अधिक मानवीय बना सकेगा। किन्तु यह परिवर्तन केवल बाहरी संस्थाओं से सम्भव नहीं होगा। उसके लिए मनुष्य की चेतना को भी बदलना होगा।
गेटे विशेष रूप से उस भावुकता से सावधान करते हैं जो विवेक का स्थान ले लेती है। वे कहते हैं कि अतीत के प्रति अन्धमोह, परम्परा के नाम पर जड़ता और भावनाओं का अनियन्त्रित उभार किसी समाज को आगे नहीं ले जा सकता।
उनकी दृष्टि में भावना का अपना स्थान है, किन्तु वह बुद्धि की विरोधी नहीं हो सकती। पहले व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए; उसके बाद ही भावना अपनी वास्तविक गरिमा के साथ विकसित हो सकती है। यही कारण है कि वे बार-बार विवेक, प्रकाश और स्पष्टता की ओर लौटते हैं।
उनके लिए मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु अज्ञानता नहीं, बल्कि वह मानसिक आलस्य है जो अज्ञान को ही अपना आश्रय बना लेता है। यहाँ गेटे किसी राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं कर रहे। वे एक नैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की बात कर रहे हैं। उनका विश्वास है कि मानव-समाज को सहयोग, योजना और उत्तरदायित्व पर आधारित एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। यदि ऐसा स्वेच्छा से नहीं होगा, तो इतिहास अपने कठोर तरीक़ों से यह परिवर्तन कराएगा।
इतिहास किसी वर्ग, किसी राष्ट्र या किसी सभ्यता को स्थायी अधिकार नहीं देता। सत्ता उसी के पास रहती है जो अपने समय के दायित्व को समझता है। यदि कोई वर्ग या समाज अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं कर पाता, तो उसे स्थान छोड़ना पड़ता है। इतिहास प्रतीक्षा नहीं करता।
गेटे का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। वे किसी वर्ग के विरोधी नहीं थे। वे उस जड़ता के विरोधी थे जो किसी भी वर्ग, किसी भी संस्था और किसी भी परम्परा में जन्म ले सकती है। उनका विश्वास था कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्म-परिवर्तन की क्षमता है।
इसीलिए वे अपने समय के मध्यवर्ग को उसके महान पूर्वजों की याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि इसी वर्ग ने विज्ञान को जन्म दिया, आधुनिक शिक्षा को विकसित किया, स्वतंत्र चिन्तन को प्रतिष्ठित किया और संस्कृति को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। यदि उसने यह सब किया है, तो वह स्वयं को फिर से नया भी बना सकता है। किन्तु उसके लिए अतीत के गौरव पर नहीं, भविष्य की जिम्मेदारी पर ध्यान देना होगा।
गेटे के लिए अपने महान व्यक्तियों का सम्मान केवल समारोह आयोजित करने से पूरा नहीं होता। उनकी सच्ची स्मृति तभी जीवित रहती है जब हम उनके भीतर निहित साहस, जिज्ञासा और परिवर्तन की आकांक्षा को अपने जीवन में उतारें। इसी भाव के साथ थॉमस मान अपने निबन्ध का समापन गेटे की इन पंक्तियों से करते हैं—मृत आडम्बरों से मुँह मोड़ो, जीवित से प्रेम करना सीखो। यही इस पूरे निबन्ध का सार है।
गेटे अतीत का सम्मान करते हैं, किन्तु अतीत की पूजा नहीं। वे परम्परा को स्वीकार करते हैं, किन्तु उसे भविष्य का बन्धन नहीं बनने देते। वे विवेक का सम्मान करते हैं, पर उसे करुणा से अलग नहीं करते। वे विज्ञान का स्वागत करते हैं, पर उसे मानवता की सेवा से पृथक नहीं देखते।
और अन्ततः वे हमें यही सिखाते हैं कि सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान उसकी स्मृतियाँ नहीं, बल्कि उसका भविष्य गढ़ने का साहस है। इसीलिए गेटे केवल जर्मनी के महाकवि नहीं हैं। वे उन विरल मानव-मनीषियों में हैं जो प्रत्येक पीढ़ी से एक ही प्रश्न पूछते हैं—
क्या तुम केवल अपने समय के उत्तराधिकारी बनोगे, या उसके सृजनकर्ता भी?
14. जड़ें और उड़ान
गेटे के जीवन और विचारों पर जितना अधिक मनन किया जाए, उतना ही स्पष्ट होता है कि वे केवल अपने युग के प्रतिनिधि नहीं थे; वे इतिहास की उस निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया के साक्षी थे जिसमें प्रत्येक पीढ़ी को स्वयं से आगे बढ़ना होता है। उनकी दृष्टि में किसी भी समाज का वास्तविक मूल्य उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी आत्म-नवीकरण की क्षमता से आँका जाना चाहिए।
कोई भी सभ्यता केवल इसलिए जीवित नहीं रहती कि उसके अतीत में महान पुरुष जन्मे थे। वह तब तक जीवित रहती है जब तक वह उन महान व्यक्तियों की चेतना को अपने वर्तमान में सक्रिय रख सकती है। इसी कारण गेटे के लिए स्मृति कभी अतीत का संग्रहालय नहीं बनती। वह भविष्य की तैयारी बन जाती है।
उन्होंने अपने जीवन में यह देखा था कि मनुष्य प्रायः परम्परा का सम्मान करने के बजाय उसकी पूजा करने लगता है। परम्परा तब प्रेरणा नहीं रहती; वह बोझ बन जाती है। समाज अपनी पुरानी सफलताओं से चिपक जाता है और नई चुनौतियों का सामना करने का साहस खो बैठता है।
गेटे इस प्रवृत्ति से सावधान करते हैं। वे चाहते हैं कि मनुष्य अपने अतीत को अपनाए, किन्तु उसकी कैद में न रहे। उनके लिए विरासत का अर्थ उसे सुरक्षित रख देना नहीं था; उसका अर्थ था उसे आगे बढ़ाना।
इसीलिए उनका सम्पूर्ण जीवन एक निरन्तर आत्म-विस्तार की प्रक्रिया था। युवावस्था में उन्होंने भावनाओं की शक्ति को पहचाना। प्रौढ़ावस्था में उन्होंने विवेक और अनुशासन को अपनाया। वृद्धावस्था में उन्होंने विज्ञान, विश्व-साहित्य और मानव-सभ्यता के भविष्य की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया।
उनके व्यक्तित्व का कोई भी चरण पिछले चरण का निषेध नहीं करता। प्रत्येक नया चरण पहले को अपने भीतर समाहित करके उससे आगे बढ़ता है। यही किसी जीवित चेतना की पहचान है।
थॉमस मान इसी कारण गेटे को केवल जर्मन संस्कृति का गौरव नहीं मानते। उनके लिए गेटे उस मध्यवर्गीय मानवतावाद की सर्वोच्च अभिव्यक्ति हैं जिसने यूरोप को आधुनिक बनाया—और साथ ही उस मानवतावाद के आत्म-अतिक्रमण का भी संकेत हैं।
गेटे ने अपने वर्ग, अपनी संस्कृति और अपने युग की श्रेष्ठतम उपलब्धियों को आत्मसात् किया; पर वे वहीं रुक नहीं गए। उन्होंने भविष्य की ओर देखने का साहस भी दिखाया। यही उन्हें कालजयी बनाता है।
इतिहास में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपने समय का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो अपने समय को बदल देते हैं। और कुछ विरले ऐसे होते हैं जो आने वाले समय की दिशा का संकेत दे जाते हैं। गेटे तीसरी श्रेणी के मनीषी हैं।
उनकी महानता केवल उनकी रचनाओं में नहीं है; उनकी महानता उस दृष्टि में है जो मनुष्य को निरन्तर विकसित होती हुई सत्ता के रूप में देखती है। उनके लिए जीवन किसी अन्तिम निष्कर्ष तक पहुँचने का नाम नहीं था। वह निरन्तर सीखने, बदलने और व्यापक होते जाने की प्रक्रिया थी। इसीलिए गेटे का सन्देश आज भी उतना ही जीवित है जितना दो शताब्दियों पहले था।
वे हमें यह नहीं सिखाते कि क्या सोचना चाहिए। वे हमें यह सिखाते हैं कि सोचना कभी बन्द नहीं करना चाहिए। वे हमें किसी विचारधारा के अनुयायी नहीं बनाते। वे हमें जीवन का विद्यार्थी बनाते हैं। और शायद यही किसी भी महान गुरु की सबसे बड़ी पहचान है।
15. जीवन का उत्सव
थॉमस मान अपने इस दीर्घ निबन्ध का समापन किसी साहित्यिक निष्कर्ष से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और नैतिक आह्वान के साथ करते हैं। गेटे के व्यक्तित्व के अनेक आयामों—कवि, वैज्ञानिक, प्रशासक, चिन्तक, नागरिक और विश्वमानव—का चित्रण करने के बाद वे उस प्रश्न पर पहुँचते हैं जो उनके अपने समय का भी था और हमारे समय का भी है—सभ्यता का भविष्य।
मान के अनुसार इतिहास किसी वर्ग, राष्ट्र या राजनीतिक व्यवस्था को स्थायी अधिकार नहीं देता। प्रत्येक युग को अपनी वैधता अपने कर्म से अर्जित करनी पड़ती है। जो समाज अपने ऐतिहासिक दायित्व को पहचानता है, वही भविष्य का नेतृत्व करता है; जो केवल अतीत के गौरव में जीता है, वह धीरे-धीरे इतिहास की मुख्यधारा से बाहर हो जाता है।
इसीलिए वे अपने समय के मध्यवर्ग से प्रश्न करते हैं—क्या वह केवल अपनी पुरानी उपलब्धियों का उत्सव मनाएगा, या वही रचनात्मक साहस फिर दिखाएगा जिसने पुनर्जागरण, विज्ञान, आधुनिक शिक्षा और मानवीय स्वतंत्रता को जन्म दिया था? यदि उसमें आत्म-नवीकरण की शक्ति शेष है, तो उसका भविष्य सुरक्षित है; यदि नहीं, तो इतिहास नई सृजनात्मक शक्तियों को आगे ले आएगा।
किन्तु यह चेतावनी किसी एक वर्ग के लिए नहीं है। यह प्रत्येक समाज और प्रत्येक पीढ़ी के लिए है। गेटे का जीवन स्वयं इसका प्रमाण है। उन्होंने कभी अपने किसी विचार को अन्तिम सत्य नहीं माना। वे निरन्तर सीखते रहे, बदलते रहे और अपनी ही सीमाओं का अतिक्रमण करते रहे। उन्होंने परम्परा का सम्मान किया, पर उसकी कैद स्वीकार नहीं की; विज्ञान का स्वागत किया, पर उसे मानवता से अलग नहीं होने दिया; और कला को जीवन की व्यापकता का उत्सव बनाया।
थॉमस मान का विश्वास है कि मानवता का भविष्य अन्धी भावुकता से नहीं, बल्कि विवेक, सहयोग और उत्तरदायित्व से निर्मित होगा। मनुष्य को अनावश्यक पीड़ाओं से मुक्त करने के लिए केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं; उसके लिए विचार, संगठन और सामूहिक प्रयत्न भी आवश्यक हैं।
किन्तु इन सबका अन्तिम उद्देश्य जीवन की समृद्धि है—ऐसा जीवन जिसमें ज्ञान और करुणा, स्वतंत्रता और अनुशासन, व्यक्तित्व और समाज परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हों।
इसी अर्थ में गेटे का सम्पूर्ण जीवन जीवन के उत्सव में रूपान्तरित हो जाता है। वह क्षणिक उल्लास का नहीं, बल्कि निरन्तर आत्म-विकास, सृजन और मानवीय उत्कर्ष का उत्सव है। उनके लिए जीवित रहना केवल अस्तित्व बनाए रखना नहीं था; अपने भीतर निहित सम्भावनाओं को विकसित करते हुए समूची मानवता के जीवन को अधिक प्रकाशमान बनाना था।
शायद इसी कारण गेटे आज भी केवल जर्मनी के महाकवि नहीं हैं। वे मानव-चेतना की उस अखण्ड यात्रा के सहयात्री हैं जो प्रत्येक पीढ़ी से एक ही आग्रह करती है—अपने समय की चुनौतियों का साहसपूर्वक सामना करो, ज्ञान को मानवता की सेवा में लगाओ, और ऐसा जीवन जियो जो स्वयं जीवन का उत्सव बन जाए।
इसी में मनुष्य की गरिमा है, और इसी में गेटे की अमरता।
गेटे : उत्कृष्ट जीवन के प्रणेता
थॉमस मान (1875–1955)
साहित्य का नोबेल पुरस्कार, 1929
मूल जर्मन निबन्ध “Goethe” (1932) पर आधारित। हिन्दी रूपान्तर The Yale Review में प्रकाशित अंग्रेज़ी पाठ के आधार पर।
—अरुण तिवारी
