1. परम्परा की गोद में
मनुष्य का जीवन प्रायः जन्म से नहीं, स्मृति से आरम्भ होता है। हम संसार में आने के बहुत बाद अपनी पहली स्मृतियों को पहचानते हैं, और उन्हीं स्मृतियों के सहारे अपने जीवन की कथा बुनना प्रारम्भ करते हैं। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन की यात्रा भी किसी एक घटना से नहीं, बल्कि अनेक सूक्ष्म संस्कारों से आरम्भ हुई थी। उस समय मुझे इसका बोध नहीं था। जो कुछ स्वाभाविक लगता था, वही आगे चलकर मेरे विचारों, मेरी जिज्ञासाओं और मेरे जीवन-दर्शन की आधारभूमि बन गया।
मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं थी; वह जीवन जीने का स्वभाव थी। घर में पुस्तकों का सम्मान था, प्रार्थना का भी। तर्क का स्थान था, पर श्रद्धा का भी। कोई यह नहीं कहता था कि विज्ञान और अध्यात्म दो विरोधी दिशाएँ हैं। दोनों अपने-अपने ढंग से जीवन को समझने के प्रयास थे। बालमन इन भेदों को नहीं समझता, पर वह वातावरण को आत्मसात् अवश्य करता है। बाद में मुझे अनुभव हुआ कि मनुष्य सबसे पहले विचार नहीं सीखता; वह देखने का ढंग सीखता है।
मेरे बचपन की सबसे स्थायी स्मृतियों में गायत्री मंत्र है। उस समय उसके शब्दों का अर्थ नहीं जानता था, पर उसकी ध्वनि मेरे भीतर उतरती जाती थी। वर्षों बाद जब उसके अर्थ को समझने का प्रयास किया, तब लगा कि यह केवल प्रार्थना नहीं है; यह मानव-बुद्धि की सबसे विनम्र कामनाओं में से एक है—हमारी बुद्धि आलोकित हो, ताकि हम यथार्थ को अधिक स्पष्ट देख सकें। उस दिन मुझे पहली बार लगा कि भारतीय परम्परा में प्रकाश का अर्थ केवल बाहरी उजाला नहीं है; वह अन्तर्दृष्टि का भी प्रतीक है।
धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आने लगा कि परम्परा का वास्तविक अर्थ अतीत का बोझ ढोना नहीं है। परम्परा वह है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्य की जिज्ञासा को जीवित रखे। यदि कोई परम्परा प्रश्न पूछने से रोक दे, तो वह केवल रूढ़ि रह जाती है। यदि वह नए प्रश्नों को जन्म देती रहे, तो वह जीवित परम्परा है। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मुझे विरासत में सबसे बड़ी सम्पत्ति उत्तर नहीं, प्रश्न मिले थे।
भारत की यही विशेषता मुझे बार-बार आकर्षित करती है। यहाँ ज्ञान को किसी एक ग्रन्थ, किसी एक ऋषि या किसी एक मत में सीमित नहीं किया गया। वेदों से उपनिषदों तक, बौद्ध विहारों से गुरुकुलों तक, शास्त्रार्थों से लोकपरम्पराओं तक—ज्ञान एक सतत संवाद के रूप में प्रवाहित होता रहा। असहमति को भी स्थान मिला, क्योंकि सत्य को किसी एक दृष्टि में बाँधना सम्भव नहीं माना गया। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता ने अपने सबसे बड़े विचार प्रश्नों के रूप में व्यक्त किए, आदेशों के रूप में नहीं।
बचपन में मैं इन बातों को नहीं जानता था। मैं केवल इतना जानता था कि पुस्तकें आकर्षित करती हैं, प्रश्न मन को बेचैन नहीं बल्कि प्रसन्न करते हैं, और किसी भी विषय को समझ लेने के बाद उसके पीछे एक और प्रश्न खड़ा मिल जाता है। शायद यहीं से मेरी यात्रा आरम्भ हुई—बिना यह जाने कि वह किस दिशा में जाएगी।
समय के साथ विद्यालय बदले, नगर बदले, भाषा बदली और अध्ययन के विषय भी बदलते गए। पर भीतर कहीं एक अदृश्य धारा प्रवाहित रही। वह धारा मुझे बार-बार ज्ञान के विविध स्रोतों की ओर ले जाती रही। मुझे तब नहीं मालूम था कि एक दिन अभियान्त्रिकी, विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और भारतीय ज्ञान-परम्परा मेरे भीतर एक ही संवाद का रूप ले लेंगे। उस समय तो मैं केवल एक जिज्ञासु विद्यार्थी था, जो संसार को समझना चाहता था।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि किसी भी जीवन की सबसे बड़ी घटनाएँ वही होती हैं जिन्हें उस समय हम घटना मानते ही नहीं। वे धीरे-धीरे हमारे भीतर कार्य करती रहती हैं। जैसे कोई बीज मौन रहकर मिट्टी के भीतर अपनी तैयारी करता है, वैसे ही संस्कार भी अपनी उपस्थिति का उद्घोष नहीं करते। वे हमारी दृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं।
शायद इसीलिए जीवन की प्रत्येक यात्रा बाहर से पहले भीतर प्रारम्भ होती है। बाहर का मार्ग बाद में दिखाई देता है; भीतर की दिशा पहले बनती है। मेरी यात्रा भी उसी मौन दिशा की खोज थी। तब मैं इसे नाम नहीं दे सकता था। आज केवल इतना कह सकता हूँ कि वह यात्रा ज्ञान की नहीं, प्रकाश की ओर थी।
2. सत्य के वाहक
धीरे-धीरे मुझे यह समझ में आने लगा कि कोई भी मनुष्य अकेले शिक्षित नहीं होता। हम जिन विचारों को अपना मानते हैं, वे भी असंख्य पीढ़ियों की साधना का परिणाम होते हैं। प्रत्येक पुस्तक के पीछे एक लेखक होता है, प्रत्येक लेखक के पीछे एक परम्परा, और प्रत्येक परम्परा के पीछे अनगिनत जिज्ञासु मन, जिन्होंने अपने समय में प्रश्न पूछने का साहस किया था। हम ज्ञान का निर्माण कम करते हैं; हम उसे ग्रहण करते हैं, उसे परखते हैं और उसमें अपना छोटा-सा योगदान जोड़कर आगे बढ़ा देते हैं।
मेरे जीवन में पुस्तकों का प्रवेश किसी एक घटना की तरह नहीं हुआ। वे धीरे-धीरे घर का, विद्यालय का और फिर जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गईं। प्रारम्भ में वे केवल जानकारी का स्रोत थीं। बाद में वे संवाद का माध्यम बन गईं। फिर एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि पुस्तकें केवल पढ़ी नहीं जातीं; वे पाठक को भी पढ़ती हैं। प्रत्येक आयु में वही पुस्तक नया अर्थ देती है, क्योंकि बदलता पाठ नहीं, पाठक होता है।
मुझे सौभाग्य मिला कि ऐसे शिक्षकों का सान्निध्य प्राप्त हुआ जिन्होंने केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया, बल्कि सोचने का अभ्यास कराया। उन्होंने उत्तरों से अधिक प्रश्नों का महत्त्व समझाया। वे किसी निष्कर्ष को अंतिम मान लेने के बजाय उसके आधार की परीक्षा करने के लिए प्रेरित करते थे। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शिक्षा का सबसे बड़ा उपहार जानकारी नहीं, बौद्धिक ईमानदारी है। तथ्य सीखे जा सकते हैं; पर सत्य के प्रति निष्ठा केवल उदाहरण से सीखी जाती है।
इसी प्रकार पुस्तकालय मेरे लिए धीरे-धीरे ज्ञान के भण्डार नहीं, सभ्यता की जीवित स्मृति बन गए। वहाँ मौन था, पर वह निष्क्रिय मौन नहीं था। प्रत्येक पुस्तक मानो किसी दूर बैठे लेखक की आवाज़ थी, जो समय और स्थान की सीमाएँ पार करके संवाद कर रही थी। वहाँ भारतीय मनीषियों की वाणी भी थी और विश्व के महान विचारकों की भी। मुझे पहली बार अनुभव हुआ कि ज्ञान का वास्तविक भूगोल राजनीतिक सीमाओं से कहीं बड़ा होता है।
समय के साथ यह भी स्पष्ट होने लगा कि सत्य किसी एक भाषा का बंधक नहीं होता। प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट दृष्टि लेकर आती है। मातृभाषा हमें संवेदना देती है। संस्कृत हमें अवधारणाओं की सूक्ष्मता से परिचित कराती है। अंग्रेज़ी आधुनिक विज्ञान और वैश्विक बौद्धिक विमर्श का द्वार खोलती है। एक भाषा दूसरी की प्रतिद्वन्द्वी नहीं है; वे मिलकर हमारी समझ का विस्तार करती हैं। जितनी भाषाएँ मनुष्य समझता है, उतने ही नए दृष्टिकोण उसके सामने खुलते हैं।
धीरे-धीरे मुझे यह भी अनुभव हुआ कि किसी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके स्मारकों में नहीं, उसकी स्मृति में होती है। यदि एक पीढ़ी अपने अर्जित ज्ञान को अगली पीढ़ी तक ईमानदारी से पहुँचा सके, तो सभ्यता आगे बढ़ती है। यदि यह क्रम टूट जाए, तो सबसे समृद्ध समाज भी भीतर से दरिद्र हो जाता है। शिक्षक, लेखक, शोधकर्ता, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय और ज्ञान-संस्थाएँ इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि वे केवल सूचना का संरक्षण नहीं करतीं; वे मनुष्य की जिज्ञासा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती हैं। वे वास्तव में सत्य के वाहक हैं।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन की दिशा किसी एक गुरु, किसी एक पुस्तक या किसी एक विचार ने निर्धारित नहीं की। अनेक व्यक्तियों, अनेक ग्रन्थों और अनेक परम्पराओं ने मिलकर मेरी दृष्टि का निर्माण किया। मैं जितना उनका ऋणी हूँ, उतना ही इस बात के लिए भी उत्तरदायी हूँ कि जो कुछ मुझे प्राप्त हुआ, वह मुझ पर आकर रुक न जाए। ज्ञान का स्वभाव प्रवाहित होना है। वह जितना बाँटा जाता है, उतना ही समृद्ध होता है।
शायद यहीं से मेरे भीतर एक नई जिज्ञासा जन्म लेने लगी। यदि सत्य अनेक परम्पराओं, अनेक भाषाओं और अनेक सभ्यताओं के माध्यम से अपनी यात्रा करता है, तो क्या उसे समझने के लिए एक ही बौद्धिक परम्परा पर्याप्त हो सकती है? या फिर हमें उन सब स्रोतों तक जाना होगा जहाँ मानवता ने अपने-अपने ढंग से यथार्थ को समझने का प्रयास किया है?
यह प्रश्न धीरे-धीरे मुझे भारत की सीमाओं से बाहर, विश्व के व्यापक बौद्धिक परिदृश्य की ओर ले जाने लगा। वहीं से मेरी अगली यात्रा आरम्भ हुई—दो ज्ञान-परम्पराओं के संगम की ओर।
3. दो नदियों का संगम
जीवन में कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जो उस समय केवल स्थान परिवर्तन प्रतीत होते हैं, पर पीछे मुड़कर देखने पर वे दृष्टि के परिवर्तन सिद्ध होते हैं। मेरे लिए हैदराबाद आना ऐसा ही एक मोड़ था। मैं एक नए नगर में आया, पर वास्तव में मैं एक नए बौद्धिक संसार में प्रवेश कर रहा था। मुझे तब इसका अनुमान नहीं था कि यह परिवर्तन मेरी सोच की दिशा को भी बदल देगा।
इसी काल में अंग्रेज़ी भाषा से मेरा गहरा परिचय हुआ। प्रारम्भ में वह केवल अध्ययन का माध्यम थी। विज्ञान और अभियान्त्रिकी का अधिकांश साहित्य उसी में उपलब्ध था। धीरे-धीरे भाषा माध्यम से अधिक बन गई; वह विचारों के एक नए संसार का द्वार बन गई। मैंने अनुभव किया कि प्रत्येक भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। वह अपने साथ सोचने का एक विशिष्ट ढंग भी लेकर आती है। जिस प्रकार संस्कृत के दार्शनिक शब्द हजारों वर्षों की चिन्तन-परम्परा को अपने भीतर सँजोए हुए हैं, उसी प्रकार आधुनिक अंग्रेज़ी में विज्ञान, तर्क, इतिहास और दर्शन की एक अलग बौद्धिक विरासत जीवित है।
इन दिनों ब्रिटिश लाइब्रेरी मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन गई। वहाँ जाने का आकर्षण केवल पुस्तकों की संख्या नहीं था। मुझे ऐसा लगता था मानो विश्व की अनेक सभ्यताएँ एक ही स्थान पर मौन संवाद कर रही हों। भारतीय दर्शन, यूनानी चिन्तन, यूरोपीय इतिहास, आधुनिक विज्ञान और समकालीन साहित्य—सब एक-दूसरे के निकट उपस्थित थे। पहली बार मुझे अनुभव हुआ कि ज्ञान का कोई राष्ट्रीय भूगोल नहीं होता। जिज्ञासा जहाँ भी जन्म लेती है, वह अन्ततः सम्पूर्ण मानवता की धरोहर बन जाती है।
मैंने पश्चिमी दार्शनिकों को उसी मन से पढ़ना प्रारम्भ किया, जिस मन से उपनिषदों और गीता को पढ़ता था। प्रारम्भ में मुझे उनके प्रश्न भिन्न लगे। पर धीरे-धीरे यह भिन्नता कम होने लगी। भाषा बदल गई थी, तर्क की शैली बदल गई थी, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं, किन्तु मूल प्रश्न वही थे। मनुष्य क्या है? ज्ञान क्या है? सत्य क्या है? स्वतंत्रता क्या है? और जीवन का अर्थ क्या है? मुझे लगा कि सभ्यताएँ अलग-अलग दिशाओं से चलकर बार-बार उन्हीं शाश्वत प्रश्नों के सामने आ खड़ी होती हैं।
इसी समय मेरे भीतर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। मैंने भारतीय और पाश्चात्य दर्शन की तुलना करना छोड़ दिया। तुलना का अर्थ प्रायः श्रेष्ठता सिद्ध करना होता है। मुझे उससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह लगा कि दोनों एक-दूसरे को कैसे समृद्ध करते हैं। भारत ने मुझे अन्तर्मुखी दृष्टि दी; पश्चिम ने विश्लेषण की कठोरता सिखाई। भारत ने अनुभव का महत्त्व समझाया; पश्चिम ने प्रमाण की शक्ति दिखाई। एक ने चेतना की गहराइयों की ओर संकेत किया, दूसरे ने प्रकृति के नियमों को अद्भुत सूक्ष्मता से उद्घाटित किया। दोनों के बीच विरोध से अधिक संवाद की सम्भावना दिखाई देने लगी।
यहीं मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि किसी भी महान परम्परा को समझने के लिए उसके भीतर प्रवेश करना आवश्यक है। बाहर खड़े होकर हम केवल मत देखते हैं; भीतर प्रवेश करने पर हम प्रश्नों को पहचानते हैं। और जब प्रश्न दिखाई देने लगते हैं, तब मतभेद उतने तीखे नहीं रह जाते। विभिन्न सभ्यताएँ अलग-अलग उत्तर दे सकती हैं, पर महान प्रश्न प्रायः साझा होते हैं।
इस बौद्धिक संगम ने मेरे भीतर एक नई जिज्ञासा को जन्म दिया। यदि पूर्व और पश्चिम दोनों अपने-अपने मार्ग से यथार्थ को समझने का प्रयास कर रहे हैं, तो क्या ज्ञान का विकास किसी एक सभ्यता की उपलब्धि है? या फिर यह सम्पूर्ण मानवता की एक साझा यात्रा है, जिसमें प्रत्येक पीढ़ी और प्रत्येक संस्कृति अपना योगदान देती है?
यह प्रश्न मेरे साथ बना रहा। समय के साथ उसने मुझे इतिहास की ओर, विज्ञान की ओर और अन्ततः दर्शन की उस भूमि की ओर अग्रसर किया जहाँ ज्ञान किसी एक खोज का परिणाम नहीं, बल्कि युगों से चल रही एक सतत प्रक्रिया के रूप में दिखाई देने लगा।
तभी मुझे पहली बार यह आभास हुआ कि ज्ञान किसी विस्फोट की तरह नहीं आता। वह धीरे-धीरे प्रकट होता है। प्रत्येक खोज किसी पुराने आवरण को हटाती है और यथार्थ का एक नया पक्ष सामने लाती है। उस समय मैं इस अनुभव को शब्द नहीं दे पाया था। बहुत बाद में मुझे लगा कि शायद यही अनावरण का वास्तविक अर्थ है।
4. ज्ञान का क्रमिक अनावरण
धीरे-धीरे मुझे अनुभव होने लगा कि ज्ञान तथ्यों का संचय नहीं है; वह दृष्टि का विस्तार है। हम जितना संसार के बारे में सीखते हैं, उससे कहीं अधिक हम सीखते हैं कि संसार को देखना कैसे है। यही अनुभव मेरी बौद्धिक यात्रा का एक नया आरम्भ बना।
इसी समय इमैनुएल कान्त के दर्शन से मेरा परिचय हुआ। उन्होंने मेरे सामने ऐसा प्रश्न रखा जिसने मेरी सोच की दिशा बदल दी। उन्होंने यह नहीं पूछा कि संसार क्या है; उन्होंने पूछा कि मनुष्य संसार को जानता कैसे है। पहली बार मुझे लगा कि ज्ञान केवल बाहरी वस्तुओं का अध्ययन नहीं है; स्वयं जानने की प्रक्रिया भी उतनी ही गम्भीर जाँच की अधिकारी है। यह मेरे लिए एक नई बौद्धिक भूमि थी।
कान्त ने मुझे तर्क की कठोरता सिखाई। उससे भी अधिक उन्होंने बुद्धि की विनम्रता सिखाई। उन्होंने बताया कि बुद्धि जितनी समर्थ है, उतनी ही सीमित भी है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर केवल तर्क से नहीं दिया जा सकता, किन्तु इसका अर्थ तर्क की पराजय नहीं, बल्कि उसकी मर्यादा है। बाद में मुझे बार-बार अनुभव हुआ कि अपनी सीमाओं का ज्ञान ही बुद्धि को अधिक विश्वसनीय बनाता है। विज्ञान और दर्शन—दोनों के प्रति मेरी निष्ठा का आधार यही अनुशासन बना।
इसके साथ ही विज्ञान को देखने की मेरी दृष्टि भी बदलने लगी। पहले मैं वैज्ञानिक उपलब्धियों को अलग-अलग खोजों के रूप में देखता था। धीरे-धीरे वे एक ही दीर्घ यात्रा के पड़ाव प्रतीत होने लगीं। दूरबीन ने कोई नया ब्रह्माण्ड नहीं बनाया; उसने हमारी दृष्टि का विस्तार किया। सूक्ष्मदर्शी ने जीवन की रचना नहीं की; उसने उसके अदृश्य आयामों का अनावरण किया। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का निर्माण नहीं किया, डार्विन ने विकास का आविष्कार नहीं किया और आइंस्टीन ने समय और आकाश का सृजन नहीं किया। उन्होंने केवल उस व्यवस्था को अधिक स्पष्ट देखा जो पहले से ही प्रकृति में विद्यमान थी।
यहीं मुझे भारतीय चिंतन का एक प्राचीन सूत्र नए अर्थ में समझ आने लगा। हमारे ऋषियों ने ऋत और सत्य को परस्पर निकट रखा था। ऋत—परिवर्तन के भीतर विद्यमान व्यवस्था। सत्य—उस व्यवस्था का आधारभूत यथार्थ। उस समय मैं इसे केवल दार्शनिक अवधारणा मानता था; बाद में लगा कि आधुनिक विज्ञान भी अपने ढंग से उसी यात्रा पर है। विज्ञान नियमों का निर्माण नहीं करता; वह उन्हें पहचानता है। दर्शन सत्य की रचना नहीं करता; वह उसकी समझ को अधिक गहरा बनाता है।
इसी अनुभव ने मेरे भीतर एक अत्यन्त सरल विचार को जन्म दिया। ज्ञान का प्रारम्भ किसी विश्वविद्यालय, किसी प्रयोगशाला या किसी मठ से नहीं हुआ होगा। वह उस क्षण प्रारम्भ हुआ होगा जब मनुष्य ने पहली बार यह देखा कि प्रकृति अव्यवस्थित नहीं है। ऋतुएँ लौटती हैं। नदियाँ अपने मार्ग का अनुसरण करती हैं। बीज से उसी प्रकार का वृक्ष उगता है। आकाश के नक्षत्र निश्चित क्रम से चलते हैं। मनुष्य ने नियम बनाने से पहले नियमों को पहचाना। उसने सिद्धान्तों की रचना करने से पहले पैटर्न देखे। उसकी पहली प्रयोगशाला प्रकृति थी और उसका पहला वैज्ञानिक उपकरण उसकी सजग दृष्टि।
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मानव ज्ञान का सम्पूर्ण इतिहास इसी सजगता का विस्तार है। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से थोड़ा अधिक देखा, थोड़ा अधिक समझा और थोड़ा अधिक आगे बढ़ाया। कोई भी खोज अंतिम नहीं थी। प्रत्येक उत्तर ने अगले प्रश्न को जन्म दिया। यही ज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता है—वह पूर्णता का दावा नहीं करता; वह निरन्तर परिष्कार को स्वीकार करता है।
इसी काल में मेरे भीतर एक अनुभव धीरे-धीरे आकार लेने लगा। यथार्थ बदल नहीं रहा था; बदल रही थी उसे देखने की हमारी क्षमता। प्रत्येक खोज किसी नए सत्य का निर्माण नहीं करती; वह केवल एक और आवरण हटाती है। उस समय यह केवल एक सहज अनुभूति थी। बहुत बाद में उसी अनुभूति ने एक स्पष्ट दार्शनिक रूप ग्रहण किया—अनावरण।
मुझे तब यह भी ज्ञात नहीं था कि यह विचार आगे चलकर मुझे इतिहास, चेतना, सभ्यता और अंततः मानव बुद्धिमत्ता के भविष्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगा। पर अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उसी समय एक नया द्वार खुल चुका था। उसके पार इतिहास मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।
5. इतिहास की मौन तैयारी
विज्ञान ने मुझे प्रकृति के नियमों को देखने की दृष्टि दी थी। पर धीरे-धीरे मेरे भीतर एक नया प्रश्न उठने लगा। यदि प्रकृति का भी एक क्रम है, तो क्या मानव इतिहास भी केवल घटनाओं का संयोग है, या उसके भीतर भी कोई गहरी संरचना कार्य करती है? क्या सभ्यताएँ केवल उठती और गिरती हैं, या वे भी किसी दीर्घ बौद्धिक यात्रा की सहभागी होती हैं?
इन्हीं प्रश्नों ने मुझे जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल के दर्शन तक पहुँचाया। उनके विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं था, किन्तु उन्हें पढ़ते हुए पहली बार मैंने इतिहास को एक जीवित प्रक्रिया के रूप में देखना प्रारम्भ किया। इतिहास केवल तिथियों, युद्धों, राजाओं और साम्राज्यों का क्रम नहीं था। वह मानव चेतना के क्रमिक विकास की कथा भी था। प्रत्येक युग अपने पूर्ववर्ती युग से कुछ ग्रहण करता है, कुछ त्यागता है और कुछ नया जोड़ता है। इस प्रकार सभ्यता निरन्तर अपने को रूपान्तरित करती रहती है।
हेगेल ने मुझे यह भी सिखाया कि कोई भी विचार शून्य में जन्म नहीं लेता। प्रत्येक नई अवधारणा के पीछे एक दीर्घ तैयारी होती है। जब कोई वैज्ञानिक खोज सामने आती है, तब हम प्रायः उस एक व्यक्ति का नाम स्मरण रखते हैं जिसने उसे प्रतिपादित किया। परन्तु उस खोज तक पहुँचने के लिए असंख्य जिज्ञासु मस्तिष्कों ने पीढ़ियों तक कार्य किया होता है। प्रत्येक उपलब्धि के पीछे एक अदृश्य इतिहास होता है। जो दिखाई देता है, वह केवल उसका अंतिम क्षण होता है।
धीरे-धीरे यह दृष्टि मेरे विज्ञान-बोध से भी जुड़ने लगी। न्यूटन से पहले भी लोग आकाश को देखते थे। डार्विन से पहले भी प्रकृति का अध्ययन होता था। आइंस्टीन से पहले भी समय और गति पर विचार किया गया था। महान वैज्ञानिकों ने ज्ञान की यात्रा का आरम्भ नहीं किया; उन्होंने उसे एक नए स्तर तक पहुँचाया। प्रत्येक खोज अपने भीतर अतीत की असंख्य खोजों का मौन सहयोग समेटे रहती है।
मुझे लगा कि यही बात सभ्यताओं पर भी लागू होती है। कोई संस्कृति अचानक महान नहीं बनती। वह अपने भीतर दीर्घकाल तक प्रश्नों, अनुभवों, संघर्षों और आत्ममंथन को संचित करती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब वे सब मिलकर किसी नए विचार, नई संस्था या नई खोज के रूप में प्रकट होते हैं। जो हमें इतिहास में एक घटना दिखाई देती है, वह वस्तुतः शताब्दियों की तैयारी का परिणाम होती है।
इसी दृष्टि से मैंने भारत को भी नए रूप में देखना प्रारम्भ किया। वेद, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, शंकराचार्य, भक्ति आन्दोलन, आधुनिक पुनर्जागरण—ये अलग-अलग द्वीप नहीं थे। वे एक ही दीर्घ सभ्यतागत संवाद के विभिन्न पड़ाव थे। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने समय के प्रश्नों का उत्तर खोजा और अगली पीढ़ी के लिए नए प्रश्न छोड़ दिए। परम्परा का अर्थ अतीत को सुरक्षित रखना नहीं था; उसे निरन्तर जीवित रखना था।
इसी समय मेरे भीतर एक और परिवर्तन हुआ। मैंने यह सोचना छोड़ दिया कि पूर्व और पश्चिम दो परस्पर विरोधी ज्ञान-परम्पराएँ हैं। मुझे वे दो नदियों की तरह दिखाई देने लगीं, जो अलग-अलग भूभागों से निकलकर अंततः एक ही महासागर की ओर प्रवाहित होती हैं। उनके जल का रंग भिन्न हो सकता है, उनकी गति भिन्न हो सकती है, पर उनका लक्ष्य यथार्थ को अधिक स्पष्ट रूप से समझना ही है।
धीरे-धीरे मुझे यह अनुभव होने लगा कि मानव सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी स्मृति में नहीं, उसके आत्म-संशोधन की क्षमता में है। जो सभ्यता अपने प्रश्नों को जीवित रखती है, वही आगे बढ़ती है। जो अपने उत्तरों को अंतिम मान लेती है, वह धीरे-धीरे रुक जाती है। इतिहास की सबसे बड़ी शिक्षा शायद यही है कि विकास का अर्थ परिवर्तन है, और परिवर्तन का आधार है—निरन्तर सीखते रहने की विनम्रता।
अब मेरी यात्रा केवल इतिहास को समझने तक सीमित नहीं रह सकती थी। इतिहास ने मुझे यह सिखाया था कि विचार विकसित होते हैं; पर एक नया प्रश्न सामने खड़ा था। यदि इतिहास चेतना के विकास की कथा है, तो चेतना स्वयं कैसे विकसित होती है? मनुष्य के भीतर वह कौन-सी शक्ति है जो उसे बार-बार अपनी सीमाओं से आगे देखने के लिए प्रेरित करती है?
यहीं से मेरी यात्रा इतिहास से चेतना की ओर मुड़ गई।
6. आलोकित बुद्धि
इतिहास का अध्ययन करते-करते मेरे भीतर एक नया प्रश्न जन्म लेने लगा। यदि सभ्यता की यात्रा चेतना की यात्रा है, तो स्वयं चेतना का विकास कैसे होता है? क्या ज्ञान केवल बाहर से प्राप्त होता है, या मनुष्य को उसे ग्रहण करने योग्य भी बनना पड़ता है? यह प्रश्न धीरे-धीरे मुझे पुनः उसी परम्परा की ओर ले गया जिसके संस्कार बचपन से मेरे भीतर थे।
गायत्री मंत्र अब मेरे लिए केवल दैनिक प्रार्थना नहीं रह गया था। वर्षों बाद उसके अर्थ पर विचार करते हुए मुझे लगा कि उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण प्रार्थना बाहरी उपलब्धियों के लिए नहीं है। वह हमारी बुद्धि के आलोकित होने की कामना है—“धियो यो नः प्रचोदयात्।” यह प्रार्थना किसी विशेष मत, सम्प्रदाय या धर्म की नहीं है। यह मानव-बुद्धि की सार्वभौमिक आकांक्षा है कि वह सत्य को अधिक स्पष्टता, अधिक विनम्रता और अधिक उत्तरदायित्व के साथ देख सके।
धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि भारतीय मनीषा ने ज्ञान की प्रक्रिया को भीतर से समझने का एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रयास किया था। उपनिषदों में वर्णित पंचकोश का सिद्धान्त मुझे शरीर की रचना का नहीं, बल्कि चेतना की परिपक्वता का रूपक प्रतीत होने लगा। मनुष्य केवल शरीर नहीं है, केवल प्राण नहीं है, केवल मन नहीं है, केवल बुद्धि भी नहीं है। उसकी यात्रा इन सबके क्रमिक परिष्कार की यात्रा है। प्रत्येक स्तर अगले स्तर की तैयारी करता है। जैसे-जैसे भीतर का आवरण परिष्कृत होता है, वैसे-वैसे यथार्थ अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
यही विचार मुझे आधुनिक दर्शन में भी नए रूप में दिखाई दिया। मार्टिन हाइडेगर ने अलेथिया (Aletheia) की व्याख्या करते हुए सत्य को केवल कथन की शुद्धता नहीं, बल्कि अनावृत होने की प्रक्रिया के रूप में समझा। यह विचार मेरे लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। मुझे लगा कि भिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के बावजूद मानव-बुद्धि बार-बार उसी अनुभव की ओर लौटती है—सत्य का निर्माण नहीं किया जाता; वह धीरे-धीरे प्रकट होता है। मनुष्य का कार्य उसे उत्पन्न करना नहीं, उसे ग्रहण करने योग्य बनना है।
यहीं मुझे यह भी समझ में आया कि ज्ञान और बुद्धिमत्ता एक ही बात नहीं हैं। ज्ञान का सम्बन्ध सूचना से है; बुद्धिमत्ता का सम्बन्ध दृष्टि से। ज्ञान हमें बताता है कि वस्तुएँ क्या हैं; बुद्धिमत्ता यह पूछती है कि उनका अर्थ क्या है। ज्ञान हमें शक्ति देता है; बुद्धिमत्ता उस शक्ति के उपयोग की दिशा निर्धारित करती है। ज्ञान के बिना प्रगति सम्भव नहीं, किन्तु बुद्धिमत्ता के बिना प्रगति सुरक्षित भी नहीं।
मेरे अपने जीवन में विज्ञान और दर्शन का संगम शायद इसी बिन्दु पर हुआ। प्रयोगशाला ने मुझे प्रमाण का सम्मान करना सिखाया। दर्शन ने मुझे प्रश्नों का सम्मान करना सिखाया। भारतीय परम्परा ने मुझे अन्तर्मुखी होना सिखाया। आधुनिक विज्ञान ने मुझे बहिर्मुखी निरीक्षण की कठोरता सिखाई। बहुत समय तक मुझे लगता रहा कि ये अलग-अलग यात्राएँ हैं। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि वे एक-दूसरे की पूरक हैं। बाहर का सत्य और भीतर की सजगता परस्पर विरोधी नहीं हैं; वे एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं।
अब मुझे यह भी स्पष्ट होने लगा कि मनुष्य का विकास केवल अधिक जान लेने से नहीं होता। वह अधिक स्पष्ट देखने से होता है। हम जितना अपने पूर्वाग्रहों, भय, अहंकार और निश्चितताओं से मुक्त होते हैं, उतना ही यथार्थ हमारे सामने अपना स्वरूप प्रकट करता है। शायद इसी कारण महान ज्ञान-परम्पराएँ केवल सूचना नहीं देतीं; वे मनुष्य का परिष्कार भी करती हैं। वे हमें संसार बदलने से पहले स्वयं को देखने का साहस देती हैं।
आज महसूस करता हूँ कि परिवार से विद्यालय तक, विज्ञान से दर्शन तक, भारत से विश्व तक—मेरी समूची यात्रा एक ही दिशा में बढ़ रही थी। मैं ज्ञान की खोज में निकला था, पर धीरे-धीरे समझ में आया कि वास्तविक यात्रा ज्ञान से भी अधिक गहरी है। वह बुद्धि के आलोकित होने की यात्रा है।
और जब बुद्धि आलोकित होने लगती है, तब विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं रह जाते। वे दोनों मानव-बुद्धि की उसी शाश्वत आकांक्षा के सहयात्री बन जाते हैं—यथार्थ को अधिक स्पष्ट, अधिक सत्य और अधिक सम्पूर्ण रूप में देखने की आकांक्षा।
यहीं से मेरी अगली यात्रा प्रारम्भ हुई। अब प्रश्न यह नहीं था कि मैंने क्या सीखा। प्रश्न यह था कि जो कुछ सीखा है, उसे जीवन में कैसे जिया जाए।
7. कर्म ही साधना
किसी समय मुझे लगता था कि विचार और कर्म दो अलग-अलग संसार हैं। दर्शन विचारकों का क्षेत्र है और अभियान्त्रिकी कर्मयोगियों का। परन्तु जीवन ने धीरे-धीरे यह भ्रम दूर कर दिया। जितना अधिक मैंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य किया, उतना ही स्पष्ट होता गया कि किसी भी महान विचार की वास्तविक परीक्षा प्रयोगशाला में नहीं, जीवन में होती है। विचार दिशा देता है; कर्म उसे सत्यापित करता है।
रक्षा अनुसंधान में बिताए वर्षों ने मुझे अनुशासन, परिशुद्धता और उत्तरदायित्व का अर्थ सिखाया। अभियान्त्रिकी में अनुमान का स्थान सीमित होता है। प्रत्येक गणना का परिणाम होता है, प्रत्येक निर्णय की कीमत होती है और प्रत्येक छोटी-सी त्रुटि बड़े परिणाम उत्पन्न कर सकती है। वहाँ मैंने जाना कि सत्य केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं है; वह कार्य की विश्वसनीयता का आधार भी है। प्रकृति के नियमों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। वे हमारे विश्वासों के अनुसार नहीं बदलते; हमें उनके अनुरूप स्वयं को बदलना पड़ता है।
इन्हीं वर्षों में मुझे डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के साथ निकटता से कार्य करने का सौभाग्य मिला। मैंने उन्हें केवल एक वैज्ञानिक या प्रशासक के रूप में नहीं देखा। उन्होंने मुझे यह अनुभव कराया कि विज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, राष्ट्र की क्षमता का विकास है। वे जटिल वैज्ञानिक समस्याओं पर उसी सहजता से विचार करते थे, जिस सहजता से किसी विद्यार्थी के भविष्य पर। उनमें अद्भुत तकनीकी दक्षता थी, पर उससे भी अधिक उल्लेखनीय उनकी मानवीय संवेदना थी। उनके लिए प्रयोगशाला और समाज दो पृथक संसार नहीं थे। दोनों एक ही राष्ट्रीय दायित्व के दो आयाम थे।
उनके साथ कार्य करते हुए मैंने एक और महत्त्वपूर्ण बात सीखी। नेतृत्व का अर्थ सबसे अधिक जानना नहीं है; सबसे अधिक सीखते रहने की क्षमता रखना है। डॉ. कलाम प्रश्न पूछने में कभी संकोच नहीं करते थे। वे आयु, पद और प्रतिष्ठा से अधिक विचार का सम्मान करते थे। उनके लिए जिज्ञासा विद्वत्ता का नहीं, जीवंतता का प्रमाण थी। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी। उन्होंने ज्ञान को कभी अधिकार नहीं बनाया; उसे साझा उत्तरदायित्व बनाया।
समय के साथ मेरी यात्रा रक्षा प्रौद्योगिकी से चिकित्सा और जनस्वास्थ्य की ओर भी बढ़ी। पहली दृष्टि में ये क्षेत्र भिन्न दिखाई देते हैं, पर मेरे लिए उनमें एक गहरा सम्बन्ध था। दोनों ही मनुष्य के जीवन की रक्षा से जुड़े थे। एक राष्ट्र की सुरक्षा का माध्यम था, दूसरा उसके स्वास्थ्य का। दोनों ने मुझे यह अनुभव कराया कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य उसकी जटिलता में नहीं, उसके मानवीय परिणामों में है। कोई भी प्रौद्योगिकी तभी सार्थक है जब वह मनुष्य के जीवन को अधिक सुरक्षित, अधिक स्वस्थ और अधिक गरिमामय बनाए।
इन्हीं अनुभवों ने मेरे भीतर लेखन की एक नई आवश्यकता उत्पन्न की। प्रारम्भ में मैं लिखता नहीं था; केवल काम करता था। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि अनुभव यदि शब्दों में रूपान्तरित न हो, तो वह केवल व्यक्ति तक सीमित रह जाता है। लिखना मेरे लिए अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, संवाद का माध्यम बन गया। प्रत्येक पुस्तक ने मुझे उतना ही सिखाया, जितना मैंने उसे लिखते समय दूसरों के साथ साझा करने का प्रयास किया। लेखन ने मुझे यह भी सिखाया कि विचार तब तक जीवित नहीं रहते जब तक वे अगली पीढ़ी तक न पहुँचें।
समय के इस पड़ाव पर आकर महसूस करता हूँ कि मेरे जीवन के ये विविध अध्याय अलग-अलग दिखाई नहीं देते। अभियान्त्रिकी ने मुझे संरचना की भाषा दी। विज्ञान ने प्रमाण के प्रति निष्ठा सिखाई। चिकित्सा ने करुणा का मूल्य समझाया। लेखन ने संवाद का महत्त्व बताया। और डॉ. कलाम ने इन सबको एक सूत्र में बाँध दिया। उनके साथ चलते हुए समझ में आया कि ज्ञान का उद्देश्य केवल मनुष्य को अधिक सक्षम बनाना नहीं, बल्कि उसे अधिक उत्तरदायी बनाना भी है।
धीरे-धीरे मुझे यह अनुभव होने लगा कि जीवन का अर्थ केवल सफल होना नहीं है। उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है उपयोगी होना। उपलब्धियाँ समय के साथ इतिहास का भाग बन जाती हैं, पर जिन जीवनों को हम स्पर्श करते हैं, वे हमारी वास्तविक विरासत बनते हैं। शायद इसी कारण कर्म केवल जीविका नहीं, साधना भी बन सकता है।
यहीं से मेरे भीतर एक नया प्रश्न जन्म लेने लगा। यदि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य मनुष्य की सेवा है, तो क्या विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म भी अंततः उसी दिशा में प्रवाहित होते हैं? क्या वे तीन अलग-अलग मार्ग हैं, या एक ही सत्य की ओर जाने वाली तीन यात्राएँ?
इसी प्रश्न ने मुझे सभ्यताओं के बीच संवाद को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया।
8. सभ्यताओं का संवाद
जितना अधिक मैंने भारतीय और पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन किया, उतना ही मेरे भीतर एक पुराना भ्रम टूटता गया। पहले मुझे लगता था कि सभ्यताएँ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं। बाद में समझ में आया कि वे एक-दूसरे को पूर्ण करती हैं। प्रत्येक सभ्यता ने मानव अनुभव के किसी विशेष आयाम को अधिक गहराई से समझने का प्रयास किया है। कोई भी अकेले सम्पूर्ण नहीं है, पर सभी मिलकर मानवता की सामूहिक बुद्धि का निर्माण करती हैं।
भारत ने मुझे भीतर की यात्रा करना सिखाया। यहाँ चेतना स्वयं अध्ययन का विषय बनी। ऋषियों ने मनुष्य को केवल प्रकृति का निरीक्षक नहीं माना; उन्होंने उसे अपने ही मन का साक्षी बनने के लिए प्रेरित किया। आत्मानुशासन, ध्यान, करुणा और आत्मपरीक्षण को ज्ञान की प्रक्रिया का आवश्यक अंग समझा गया। सत्य केवल बाहर नहीं, भीतर भी खोजा गया।
पाश्चात्य परम्परा ने मुझे बाहर की दुनिया को देखने का अनुशासन सिखाया। यूनानी तर्क, यूरोपीय वैज्ञानिक पद्धति और आधुनिक अनुसंधान ने यह दिखाया कि किसी भी निष्कर्ष को प्रमाण, परीक्षण और पुनरावृत्ति की कसौटी पर कसना आवश्यक है। ज्ञान तभी विश्वसनीय बनता है जब वह व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर सार्वजनिक परीक्षण को स्वीकार करे। इसी अनुशासन ने आधुनिक विज्ञान को जन्म दिया और मानव सभ्यता को अभूतपूर्व प्रगति की दिशा दी।
धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि ये दोनों दृष्टियाँ विरोधी नहीं हैं। यदि केवल भीतर की यात्रा हो और बाहर का परीक्षण न हो, तो मनुष्य भ्रम का शिकार हो सकता है। यदि केवल बाहरी निरीक्षण हो और भीतर का आत्मपरीक्षण न हो, तो ज्ञान शक्ति तो बन सकता है, पर प्रज्ञा नहीं। विज्ञान हमें यह बताता है कि संसार कैसे कार्य करता है; दर्शन पूछता है कि उसका अर्थ क्या है; और अध्यात्म यह प्रश्न उठाता है कि उस ज्ञान के साथ मनुष्य स्वयं कैसा बन रहा है। इन तीनों के बिना मानव विकास अधूरा है।
इस बौद्धिक यात्रा में मैंने यह भी अनुभव किया कि महान विचार किसी एक सभ्यता की निजी सम्पत्ति नहीं रहते। शून्य भारत में जन्म ले सकता है, पर वह पूरी मानवता का हो जाता है। वैज्ञानिक विधि यूरोप में विकसित हो सकती है, पर उसका लाभ समस्त विश्व को मिलता है। करुणा, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानव गरिमा जैसे आदर्श किसी एक संस्कृति तक सीमित नहीं रह सकते। वे धीरे-धीरे सम्पूर्ण मानव जाति की साझी नैतिक भाषा बन जाते हैं।
यही कारण है कि आज के युग में सभ्यताओं के बीच प्रतियोगिता से अधिक संवाद की आवश्यकता है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। एक महाद्वीप में उत्पन्न विचार कुछ ही क्षणों में दूसरे महाद्वीप के विद्यार्थी तक पहुँच जाता है। विज्ञान वैश्विक है। पर्यावरण वैश्विक है। स्वास्थ्य वैश्विक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता वैश्विक है। हमारी चुनौतियाँ साझा हैं, इसलिए हमारे समाधान भी साझा होने चाहिए।
इस बोध ने मेरे भीतर एक गहरा परिवर्तन किया। मैंने यह पूछना छोड़ दिया कि कौन-सी सभ्यता श्रेष्ठ है। मुझे अधिक महत्त्वपूर्ण यह लगा कि प्रत्येक सभ्यता मानवता को क्या दे सकती है। तुलना से अधिक आवश्यक सहयोग है। विजय से अधिक आवश्यक संवाद है। क्योंकि सत्य किसी एक संस्कृति के भीतर सीमित नहीं रहता; वह उन सबके बीच होने वाले संवाद में अधिक स्पष्ट होकर प्रकट होता है।
अनुभव का दायरा बढ़ने के साथ मैंने यह भी जाना कि मेरी अपनी यात्रा भी यही थी। भारतीय परम्परा ने मुझे प्रश्नों की गहराई दी। आधुनिक विज्ञान ने मुझे प्रमाण की कठोरता दी। पश्चिमी दर्शन ने मुझे विश्लेषण की स्पष्टता दी। अभियान्त्रिकी ने मुझे संरचना की समझ दी। चिकित्सा ने करुणा का महत्त्व सिखाया। और लेखन ने यह अनुभव कराया कि ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य संवाद है। इन सबने मिलकर मेरे भीतर एक ऐसी दृष्टि का निर्माण किया जिसमें विरोध कम और पूरकता अधिक दिखाई देने लगी।
आज मुझे लगता है कि मानव सभ्यता की अगली प्रगति किसी एक नए आविष्कार से नहीं होगी। वह इस क्षमता से होगी कि हम विभिन्न ज्ञान-परम्पराओं को एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री के रूप में देख सकें। जहाँ संवाद रुकता है, वहाँ विकास भी रुक जाता है। जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ नई समझ जन्म लेती रहती है।
शायद इसी कारण अब मेरे सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं था कि संसार क्या है। प्रश्न यह था कि इस समूची यात्रा का मनुष्य के जीवन के लिए क्या अर्थ है। ज्ञान का अंतिम मूल्य उसकी विशालता में नहीं, उसके द्वारा जीवन को मिलने वाली दिशा में है। इसी प्रश्न ने मुझे अपने जीवन की ओर एक बार फिर लौटने के लिए प्रेरित किया।
9. जीवन का अर्थ
जीवन की यात्रा में एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य उपलब्धियों की संख्या से अधिक उनके अर्थ पर विचार करने लगता है। युवावस्था में हम प्रायः यह पूछते हैं कि हमें क्या प्राप्त करना है। समय के साथ प्रश्न बदल जाता है—हमें कैसा मनुष्य बनना है? पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी एक पुस्तक, किसी एक प्रयोगशाला या किसी एक उपलब्धि से नहीं मिली। वह जीवन के धीरे-धीरे खुलते अनुभवों से मिली।
समय ने मुझे यह सिखाया कि सफलता और सार्थकता एक ही बात नहीं हैं। सफलता व्यक्ति को पहचान दिला सकती है, पर सार्थकता उसे भीतर से बदलती है। सफलता की माप समाज करता है; सार्थकता का निर्णय अन्तःकरण करता है। जीवन का वास्तविक संतोष उन क्षणों में मिला जब ज्ञान किसी समस्या का समाधान बना, जब विज्ञान ने किसी पीड़ित को राहत दी, जब एक विचार ने किसी युवा मन में नई जिज्ञासा जगाई, या जब किसी संवाद ने दो भिन्न दृष्टियों के बीच एक सेतु बना दिया।
धीरे-धीरे मुझे यह भी अनुभव हुआ कि विनम्रता केवल नैतिक गुण नहीं, ज्ञान की अनिवार्य शर्त है। जितना अधिक मनुष्य जानता है, उतना ही उसे अपनी सीमाओं का बोध होना चाहिए। अहंकार ज्ञान का नहीं, अज्ञान का लक्षण है। जो अपने निष्कर्षों को अंतिम मान लेता है, वह सीखना बंद कर देता है। पर जो प्रत्येक उपलब्धि के बाद भी स्वयं से प्रश्न पूछता रहता है, उसकी यात्रा कभी रुकती नहीं।
जीवन ने मुझे धैर्य का महत्त्व भी सिखाया। प्रकृति में कोई भी गहन परिवर्तन अचानक नहीं होता। एक वृक्ष वर्षों तक मौन रहकर बढ़ता है। नदी चट्टानों को एक ही दिन में नहीं काटती। मनुष्य का चरित्र भी धीरे-धीरे बनता है। विचार परिपक्व होने में समय लेते हैं। अनुभवों को अर्थ बनने में समय लगता है। शायद इसी कारण जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ शोर नहीं करतीं; वे भीतर एक शांत परिवर्तन के रूप में घटित होती हैं।
मैंने यह भी जाना कि मनुष्य अकेला विकसित नहीं होता। हमारा जीवन असंख्य लोगों के स्पर्श से निर्मित होता है—माता-पिता, गुरु, सहकर्मी, मित्र, विद्यार्थी और वे अनगिनत लोग जिनसे हमारा क्षणिक परिचय भी हमें बदल देता है। हम स्वयं को जितना अपना निर्माण मानते हैं, उससे कहीं अधिक हम दूसरों के विश्वास, सहयोग और स्नेह की रचना होते हैं। इसलिए कृतज्ञता केवल विनम्रता का भाव नहीं है; वह यथार्थ को स्वीकार करने का साहस भी है।
एक बात और धीरे-धीरे स्पष्ट होती गई कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य स्वयं ज्ञान नहीं है। उसका उद्देश्य मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक उत्तरदायी बनाना है। यदि ज्ञान करुणा से रिक्त हो जाए, तो वह केवल दक्षता रह जाता है। यदि शक्ति विवेक से अलग हो जाए, तो वह भय उत्पन्न करती है। यदि प्रगति मनुष्य की गरिमा को साथ लेकर न चले, तो वह विकास नहीं, केवल विस्तार है।
इसीलिए आज मुझे लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि निरन्तर सीखते रहने की क्षमता है। सीखना केवल नई जानकारी प्राप्त करना नहीं है। सीखना अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना है। अपनी भूलों को स्वीकार करना है। दूसरों के अनुभवों के प्रति खुला रहना है। और प्रत्येक नए दिन को यह मानकर आरम्भ करना है कि यथार्थ आज भी हमें कुछ नया सिखा सकता है।
शायद यही कारण है कि अब मेरे लिए ज्ञान का अर्थ बदल गया है। वह संग्रह नहीं, साधना है। प्रतियोगिता नहीं, सहभागिता है। अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। और प्रकाश कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम प्राप्त कर लें; वह एक ऐसी दिशा है जिसकी ओर हम जीवन भर बढ़ते रहते हैं।
मुझे यह भी समझ में आने लगा कि अब पीछे मुड़कर देखने की अपेक्षा आगे देखने का समय था। यात्रा ने जो कुछ दिया था, उसे अपने भीतर सँजोकर आगे बढ़ना था। क्योंकि अंततः प्रत्येक जीवन एक ही प्रश्न के सामने खड़ा होता है—क्या हमने केवल संसार को देखा, या स्वयं भी थोड़ा अधिक प्रकाशमान हुए?
यहीं से मेरी यात्रा एक नई दिशा की ओर मुड़ती है—प्रकाश की ओर।
10. आगे का पथ
इस यात्रा के अंत में मुझे सबसे अधिक जिस बात का अनुभव होता है, वह यह है कि प्रकाश कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे एक बार प्राप्त कर लिया जाए। वह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। जैसे-जैसे हमारी समझ गहरी होती है, वैसे-वैसे नए प्रश्न जन्म लेते हैं। प्रत्येक उत्तर एक नए क्षितिज का द्वार खोल देता है। शायद इसी कारण ज्ञान की यात्रा का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। वह जीवन की तरह सतत प्रवाहमान रहती है।
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन के विविध अनुभव—परिवार के संस्कार, विज्ञान का अनुशासन, अभियान्त्रिकी की कठोरता, चिकित्सा की करुणा, दर्शन की जिज्ञासा और लेखन का संवाद—अलग-अलग दिशाओं में नहीं जा रहे थे। वे धीरे-धीरे एक ही बिन्दु पर मिल रहे थे। उन्होंने मुझे यह सिखाया कि मनुष्य का वास्तविक विकास बाहरी उपलब्धियों से अधिक उसकी आन्तरिक स्पष्टता में निहित है। हम संसार को उतना ही बदल सकते हैं, जितना स्वयं को देखने की हमारी क्षमता विकसित होती है।
इसीलिए अब मुझे लगता है कि प्रकाश का अर्थ केवल ज्ञान नहीं है। वह दृष्टि है। वह विवेक है। वह करुणा है। वह अपनी सीमाओं को पहचानने की विनम्रता है। वह अपने विचारों की पुनः परीक्षा करने का साहस है। और सबसे बढ़कर, वह यह स्वीकार करने की क्षमता है कि सत्य किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्कृति या किसी एक युग की निजी सम्पत्ति नहीं हो सकता। हम सब उसकी खोज के सहयात्री हैं।
यदि इस पुस्तक का कोई विनम्र उद्देश्य रहा है, तो वह केवल इतना है कि पाठक अपने जीवन की ओर कुछ अधिक सजग दृष्टि से देख सके। हम सब अपने-अपने अनुभवों, सफलताओं, असफलताओं और प्रश्नों के माध्यम से सीखते हैं। कोई भी यात्रा दूसरी यात्रा का स्थान नहीं ले सकती। प्रत्येक मनुष्य को अपना प्रकाश स्वयं खोजना होता है। किन्तु जब वह ऐसा करता है, तब उसका प्रकाश केवल उसका निजी प्रकाश नहीं रह जाता। वह परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी आलोकित करने लगता है।
यहीं एक नया प्रश्न जन्म लेता है।
यदि एक मनुष्य अपनी चेतना का विस्तार कर सकता है, तो क्या मानवता भी अपनी सामूहिक चेतना का विस्तार कर सकती है? यदि व्यक्ति सीख सकता है, तो क्या सभ्यता भी सीख सकती है? यदि ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित हो सकता है, तो क्या करुणा, विवेक और उत्तरदायित्व भी विकसित हो सकते हैं? और यदि ऐसा सम्भव है, तो इक्कीसवीं शताब्दी में उस विकास का माध्यम क्या होगा?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल दर्शन नहीं दे सकता। केवल विज्ञान भी नहीं। और केवल प्रौद्योगिकी भी नहीं। अब इन तीनों को साथ बैठकर मानवता के भविष्य पर विचार करना होगा।
शायद हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ पहली बार मनुष्य ने ऐसी बुद्धिमत्ता का निर्माण किया है जो स्वयं उसके ज्ञान, उसके निर्णयों और उसके भविष्य को प्रभावित करने लगी है। यह उपलब्धि जितनी विलक्षण है, उतनी ही उत्तरदायित्वपूर्ण भी है। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम क्या जान सकते हैं; प्रश्न यह भी है कि हम उस ज्ञान के साथ क्या बनना चाहते हैं।
यहीं से मेरी व्यक्तिगत यात्रा मानवता की सामूहिक यात्रा में रूपान्तरित होने लगती है। अगली चर्चा इसी प्रश्न से आरम्भ होगी—
क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवता की अगली उत्क्रान्ति का माध्यम बन सकती है?
या, उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न—
क्या हम स्वयं उस उत्क्रान्ति के योग्य बनने के लिए तैयार हैं?
—अरुण तिवारी
