फ़ाउस्टीय कर्म के तीन नियम

by Arun Tiwari | Jul 16, 2026

1. भूमिका

किसी पुस्तक को महान क्या बनाता है? मेरे लिए दो गुण अन्य सभी गुणों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं—पहला, पीढ़ियों तक, सम्भवतः एक शताब्दी या उससे भी अधिक समय तक जीवित बने रहने की उसकी क्षमता; और दूसरा, अपने लेखक के राष्ट्र और भाषा की सीमाओं से बहुत दूर तक पाठकों तक पहुँचने की उसकी शक्ति।

जब मैं ले मिज़राब्ल (Les Misérables), वार एंड पीस (War and Peace), द डिवाइन कॉमेडी (The Divine Comedy) या डॉन क्विक्सोट (Don Quixote) पढ़ता हूँ, तो मुझे केवल यह अनुभव नहीं होता कि मैं उनके विचारों को समझ रहा हूँ। वे मेरे भीतर सक्रिय होने लगते हैं—मेरी स्थापित धारणाओं को विचलित करते हैं, मेरी चेतना का विस्तार करते हैं और धीरे-धीरे मेरे आन्तरिक व्यक्तित्व को रूपान्तरित करते हैं—यहाँ तक कि उन्हें पढ़ने के बाद मैं ठीक वही व्यक्ति नहीं रह जाता, जो उन्हें पढ़ने से पहले था। भारतीय कृतियों में मैंने इस रूपान्तरणकारी शक्ति का सबसे गहरा अनुभव श्री अरविन्द की सावित्री में किया है।

इन सभी महान पुस्तकों में गेटे के फ़ाउस्ट (Faust) ने मुझे सबसे अधिक गहराई से उद्वेलित किया है। यह पुस्तक पहली बार 2004 में मेरे हाथों में आई थी, किन्तु कोविड-19 के वर्षों में जीवन पर आरोपित उस अनिवार्य ठहराव के दौरान ही मुझे अन्ततः उसके विराट और रहस्यमय संसार में प्रवेश करने का अवसर मिला।

2. एक ऐसी कृति, जो अपने रचयिता के साथ विकसित हुई

1770 के दशक में 1749 में जन्मे गेटे अभी युवा ही थे, किन्तु तब तक वे स्टुर्म उंड ड्रांग (Sturm und Drang) आन्दोलन की विद्रोही आवाज़ों में से एक के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इन्हीं वर्षों में उन्होंने उस नाटक के प्रारम्भिक हस्तलिखित रूप को अपने परिचितों के बीच प्रसारित करना आरम्भ किया, जिसे बाद में उरफ़ाउस्ट (Urfaust) के नाम से जाना गया। 1790 में उन्होंने फ़ाउस्ट: एक अंश प्रकाशित किया। इसके अठारह वर्ष बाद फ़ाउस्ट: प्रथम भाग सामने आया और उसके विराट द्वितीय भाग को उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले पूरा किया। सम्पूर्ण कृति 1832 में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई।

इस प्रकार गेटे ने अपने लगभग समूचे वयस्क जीवन में फ़ाउस्ट को अपने भीतर धारण किए रखा। केवल यही तथ्य इसे एक असाधारण पुस्तक बना देता है। यह मात्र ऐसी कृति नहीं है, जिसे उन्होंने लिखा; यह एक ऐसी कृति है, जो उनके साथ-साथ बढ़ी, बदली और परिपक्व हुई।

गेटे लगभग छह दशकों तक बार-बार उस कथा की ओर क्यों लौटते रहे और उसे नया रूप क्यों देते रहे, जबकि उसकी मूल परिकल्पना भी निरन्तर बदलती जा रही थी? इसका सबसे सरल उत्तर है—क्योंकि गेटे स्वयं बदलते रहे। ग्रेचेन (Gretchen) की त्रासदी की कल्पना करने वाला युवा कवि वह व्यक्ति नहीं था, जो अन्ततः फ़ाउस्ट के उद्धार की कल्पना करने वाला था।

इन दोनों दृष्टियों के बीच गेटे की इटली-यात्रा, वाइमर (Weimar) में उनके प्रशासनिक दायित्व, कवि, नाटककार, इतिहासकार और दार्शनिक चिन्तक फ़्रेडरिक शिलर के साथ उनकी मित्रता और बौद्धिक सहभागिता, उनके वैज्ञानिक अनुसन्धान, फ़्रांसीसी क्रान्ति की उथल-पुथल, नेपोलियन के युद्ध तथा एक अधिकाधिक प्रौद्योगिक और परस्पर सम्बद्ध होते यूरोप का उदय उपस्थित थे। उनके जीवन में व्यक्तिगत परीक्षाएँ भी कम नहीं थीं। इनमें उनके अक्सर उद्दण्ड और अशिष्ट व्यवहार करने वाले पुत्र आउगुस्त (August von Goethe) से उत्पन्न निराशा और असन्तोष भी सम्मिलित था। इन सभी अनुभवों ने व्यक्ति, समाज, इतिहास, प्रकृति और मानवीय महत्त्वाकांक्षा के विषय में उनकी समझ का विस्तार किया। फिर भी एक प्रश्न शेष रहता है—इन सभी रूपान्तरणों के बीच गेटे बार-बार फ़ाउस्ट की ओर ही क्यों लौटते रहे?

सम्भवतः इसलिए कि केवल फ़ाउस्ट में ही इन सभी अनुभवों को समाहित करने की पर्याप्त व्यापकता थी। गेटे के जीवन का प्रत्येक काल इस काव्य-नाटक में एक नई परत जोड़ता गया। युवा कवि की ज्वालामुखीय तीव्रता शास्त्रीय कलाकार की संयमित दृष्टि में विलीन नहीं हुई। इसी प्रकार जब गेटे ने अर्थव्यवस्था, राजनीति, प्रौद्योगिकी और विश्व-इतिहास की ओर ध्यान दिया, तब भी उनके भीतर का वैज्ञानिक पर्यवेक्षक अदृश्य नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व का प्रत्येक आयाम विकसित होते हुए भी उपस्थित रहा—कभी सामंजस्य में, तो कभी तनाव में। इस प्रकार फ़ाउस्ट गेटे की विकसित होती चेतना का एक जीवन्त पात्र बन गया। यही कारण है कि उसे किसी एक दार्शनिक प्रतिपादन में सीमित नहीं किया जा सकता।

फ़ाउस्ट का अर्थ किसी सिद्धान्त में नहीं, बल्कि एक गति में निहित है—उस गति में, जिसके माध्यम से एक मानव-जीवन और सम्भवतः एक सम्पूर्ण सभ्यता अपना रूप ग्रहण करती है। यह कृति निजी आकांक्षा से सार्वजनिक सत्ता की ओर, प्रलोभन से प्रशासन की ओर, जादुई संसार से वित्तीय यथार्थ की ओर, ज्ञान से प्रौद्योगिकी की ओर, और एक परिवार के विनाश से सम्पूर्ण भू-दृश्यों के पुनर्निर्माण की ओर बढ़ती है। इसका आरम्भ एक विद्वान के अध्ययन-कक्ष में होता है और समापन एक विराट अभियांत्रिकी उपक्रम के निकट।

इन दोनों बिन्दुओं के बीच एक बेचैन मनुष्य की अतृप्त आकांक्षा धीरे-धीरे सभ्यता के समस्त साधनों से सम्पन्न होती जाती है। जैसे-जैसे फ़ाउस्ट की शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे उसके असन्तोष के परिणाम भी व्यापक होते जाते हैं। जो आरम्भ में एक व्यक्ति के भीतर की अव्यवस्था थी, वही अन्ततः इतिहास को गति देने वाली शक्ति बन जाती है। मनुष्य की आन्तरिक बेचैनी जब विचार, संकल्प और कर्म में रूपान्तरित होती है, तो वह केवल एक जीवन ही नहीं, पूरे युग की दिशा बदल सकती है।

अब मैं फ़ाउस्ट की इस महान रचना से मानवीय क्रिया के तीन ऐसे नियम ग्रहण करने का प्रयास करूँगा, जो फ़ाउस्ट की कथा से आगे बढ़कर आधुनिक सभ्यता को भी समझने में हमारी सहायता करते हैं।

3. फ़ाउस्टीय कर्म का प्रथम नियम

आरम्भिक फ़ाउस्ट का भावनात्मक केन्द्र फ़ाउस्ट और मेफ़िस्टोफ़िलीस (Mephistopheles) के बीच लगी शर्त नहीं, बल्कि ग्रेचेन की त्रासदी है। फ़ाउस्ट एक ऐसे व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आता है, जो ज्ञान से थक चुका है। उसने दर्शन, विधि, चिकित्सा और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया है, फिर भी उसे लगता है कि वह जीवन्त सत्य के तनिक भी निकट नहीं पहुँच सका। उसका संकट स्पष्टतः आधुनिक है—उसके पास विद्वत्ता है, पर अर्थ नहीं; उपलब्धियाँ हैं, पर आत्मतृप्ति नहीं।

निर्जीव सूत्रों और विरासत में मिले सिद्धान्तों को अस्वीकार करने में कुछ वीरतापूर्ण अवश्य है, किन्तु उसकी आकांक्षा अभी नैतिक रूप से अधूरी है। वह अनुभव चाहता है, पर अभी यह नहीं समझता कि प्रत्येक अनुभव में दूसरे मनुष्यों का जीवन भी सम्मिलित होता है।

इसकी कीमत चुकाने वाली पहली व्यक्ति ग्रेचेन है। वह परिवार, पड़ोस, चर्च और विरासत में मिली नैतिक व्यवस्था से निर्मित एक घरेलू और सम्बन्धपरक संसार से आती है। इसके विपरीत फ़ाउस्ट शिक्षित है, गतिशील है और भीतर से बेघर है। वह ग्रेचेन के संसार में प्रवेश कर सकता है, उसे बदल सकता है और फिर आगे बढ़ सकता है; किन्तु ग्रेचेन उन परिणामों से बचकर नहीं निकल सकती। सम्पूर्ण अनुभव की फ़ाउस्ट की खोज में जो केवल एक प्रसंग है, वही ग्रेचेन के समूचे जीवन की त्रासद नियति बन जाता है।

मेफ़िस्टोफ़िलीस प्रलोभन और प्रेम-संबंध का मार्ग सुगम बनाता है, किन्तु इच्छा फ़ाउस्ट की अपनी है। उपहार, गोपनीयता और अन्तरंगता धीरे-धीरे ग्रेचेन को उस संसार से अलग कर देते हैं, जिसने अब तक उसे सहारा दिया था। उसकी माँ की मृत्यु हो जाती है, उसका भाई मारा जाता है, वह विवाह के बिना गर्भवती होती है और सामाजिक अपमान तथा बहिष्कार का पात्र बनती है। वह अपने नवजात शिशु की हत्या कर देती है और अन्ततः कारागार में डाल दी जाती है।

यह त्रासदी किसी एक पृथक् अपराध से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि परिणामों की एक ऐसी शृंखला से विकसित होती है जिसकी कल्पना करने में फ़ाउस्ट बार-बार विफल रहता है। वह ग्रेचेन को देखता है, किन्तु उन सम्बन्धों के जाल को नहीं देख पाता जो उसके जीवन को भीतर तक बदलकर रख देते हैं।

यहीं गेटे फ़ाउस्टीय कर्म के प्रथम नियम को उद्घाटित करते हैं—

जैसे-जैसे इच्छा अधिक तीव्र होकर स्वयं पर केन्द्रित होती जाती है, वैसे-वैसे दूसरे मनुष्यों को स्वतंत्र व्यक्तियों के बजाय अपने अनुभव की पूर्ति के साधन के रूप में देखना सहज होता जाता है।

फ़ाउस्ट ग्रेचेन को नष्ट करने के उद्देश्य से आगे नहीं बढ़ता; वह उससे सचमुच प्रेम करता है, किन्तु उसका प्रेम उसकी अतृप्त इच्छाओं और आत्मकेन्द्रित आकांक्षाओं से मुक्त नहीं है। और यही तथ्य इस त्रासदी को इतना अधिक विचलित करने वाला बनाता है। बुराई का आरम्भ सदैव किसी को हानि पहुँचाने की सचेत इच्छा से नहीं होता। वह दूसरे व्यक्ति की सम्पूर्ण वास्तविकता को पहचानने में हुई विफलता से भी आरम्भ हो सकती है।

फ़ाउस्ट के प्रेम में उसे अपना बना लेने की इच्छा भी उलझी हुई है। वह ग्रेचेन की निष्कपटता, कोमलता और सहजता में वह सब खोजता है, जो विद्वत्ता उसे नहीं दे सकी थी। ग्रेचेन उसके आध्यात्मिक संकट का उत्तर बन जाती है। किन्तु जिस क्षण कोई दूसरा व्यक्ति हमारे संकट का उत्तर बन जाता है, उसी क्षण यह जोखिम उत्पन्न हो जाता है कि हम उस व्यक्ति से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली वस्तु या अनुभूति से प्रेम करने लगें।

इसलिए ग्रेचेन की त्रासदी केवल कामुक प्रलोभन के विरुद्ध दी गई चेतावनी से कहीं बड़ी है। वह जीवन और दूसरे मनुष्यों के जीवन को अपने आत्म-विकास की सामग्री के रूप में प्रयोग करने के नैतिक संकट को उजागर करती है।

फ़ाउस्ट प्रत्येक सम्भव अनुभव को प्राप्त करना चाहता है, किन्तु ग्रेचेन यह दिखाती है कि कोई भी अनुभव केवल व्यक्तिगत नहीं होता। प्रत्येक कर्म हमें विश्वास, निर्भरता और असुरक्षा से बने सम्बन्धों के एक जाल के भीतर ले जाता है। इस प्रकार, एक व्यक्ति का विस्तार किसी दूसरे व्यक्ति का विनाश बन सकता है।

यह प्रतिरूप पहले से ही सभ्यतागत है—लाभ शक्ति-केन्द्रों में एकत्र होते हैं, जबकि उनकी कीमत कम शक्तिशाली लोगों पर डाल दी जाती है। इस प्रकार, उपलब्धि का गौरव किसी और के हिस्से में आता है और उसकी मानवीय तथा नैतिक लागत कोई और चुकाता है।

फ़ाउस्ट को जीवन की प्रखर अनुभूति, ज्ञान और भावनात्मक विस्तार प्राप्त होता है। ग्रेचेन के हिस्से में गर्भावस्था, अपमान, शोक और कारावास आते हैं। यही सब, जो आगे चलकर शासन, सेनाओं, वित्त और अभियांत्रिकी के माध्यम से विशाल स्तर पर घटित होगा, सबसे पहले एक युवा स्त्री के छोटे-से कक्ष में घटित होता है।

4. चेतना की आत्मकथा

गहरे स्तर पर फ़ाउस्ट एक आत्मकथात्मक कृति भी है। युवा गेटे फ़ाउस्ट के विद्रोह को भीतर से जानते थे—विरासत में मिली व्यवस्थाओं के प्रति अधैर्य, शास्त्रीय पाण्डित्य के प्राधिकार पर अविश्वास, आवेग का उन्माद और परम्परागत सीमाओं से परे जाकर जीवन जीने की आकांक्षा। इसी भावभूमि से युवा वेर्थर के दुःख (Die Leiden des jungen Werthers) की रचना हुई थी, जिसका नायक अपनी आन्तरिक अनुभूतियों की विराटता का सामाजिक संसार की सीमाओं के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता। दोनों कृतियों में चेतना एक अतृप्त भूख के रूप में अनुभव होती है।

किन्तु गेटे केवल इस भूख के कवि बने नहीं रहे। वाइमर में बिताए वर्षों ने उन्हें प्रशासन, वित्त, खनन, सार्वजनिक संस्थाओं और व्यावहारिक शासन की कठोर सीमाओं से परिचित कराया। उनकी इटली-यात्रा ने शास्त्रीय रूप के प्रति उनकी निष्ठा को गहरा किया, जबकि उनके वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनका ध्यान विकास, ध्रुवता, रूपविज्ञान और प्रकृति की सजीव संरचना की ओर मोड़ा। शिलर के प्रोत्साहन ने उन्हें पुनः फ़ाउस्ट की ओर लौटने और ग्रेचेन की त्रासदी को एक अधिक व्यापक दार्शनिक संरचना में स्थापित करने में सहायता की।

परिपक्व गेटे यह समझ चुके थे कि जो शक्ति भीतर से संयमित नहीं होती, वह अन्ततः आत्मविनाशक हो जाती है। अनियन्त्रित ऊर्जा अन्ततः एंट्रॉपी, अर्थात् विघटन और अव्यवस्था, की ओर बढ़ती है। रूप से रहित ऊर्जा स्वयं को क्षीण कर देती है; सम्बन्धों से रहित स्वतन्त्रता परभक्षी बन जाती है; अवलोकन से रहित ज्ञान जड़ सिद्धान्त में बदल जाता है; और आत्मचिन्तन से रहित अनुभव केवल तृष्णा बनकर रह जाता है।

फ़ाउस्ट के क्षितिज का विस्तार गेटे की इसी परिपक्वता के साथ होता है। आरम्भिक नाटक फ़ाउस्ट के असन्तोष के भीतर से बोलता है; उत्तरवर्ती कृति उसी असन्तोष को क्रमशः बाहर से देखने लगती है। गेटे फ़ाउस्ट की अविराम प्रयत्नशीलता के प्रति अपनी सहानुभूति बनाए रखते हैं, किन्तु साथ ही उसके परिणामों की जाँच भी करते हैं।

वे मेफ़िस्टोफ़िलीस को भी बनाए रखते हैं, क्योंकि संशय, व्यंग्य और निषेध बुद्धि के अनिवार्य कार्य हैं। मेफ़िस्टोफ़िलीस पाखण्ड को उजागर करता है, दम्भ को भेदता है और आडम्बरपूर्ण संस्थाओं के भीतर छिपी वास्तविकता को देख पाता है। फिर भी उसकी दृष्टि सदैव संकुचित और अपचायक बनी रहती है। वह विकास की अपेक्षा दुर्बलता को, प्रेम की अपेक्षा तृष्णा को और जीवन की अपेक्षा यान्त्रिकी को तरजीह देता है।

इसलिए फ़ाउस्ट और मेफ़िस्टोफ़िलीस को आधुनिक चेतना के भीतर सक्रिय दो प्रवृत्तियों के रूप में पढ़ा जा सकता है। वे केवल नाटक के दो पात्र नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर इच्छा और स्वार्थ की जुड़वाँ शक्तियों के रूप में उपस्थित रहते हैं।

फ़ाउस्ट घोषणा करता है—जो कुछ अस्तित्व में है, वह पर्याप्त नहीं है।
मेफ़िस्टोफ़िलीस निष्कर्ष निकालता है—तब जो कुछ अस्तित्व में है, उसका उपयोग किया जा सकता है।

फ़ाउस्ट आकांक्षा प्रदान करता है; मेफ़िस्टोफ़िलीस साधन और विधि। उनकी साझेदारी सृजनशील है, क्योंकि बुद्धि से संयुक्त इच्छा संसार को रूपान्तरित कर सकती है। किन्तु वही साझेदारी खतरनाक भी है, क्योंकि कल्याण की प्रेरक शक्ति न तो इच्छा में निहित है, न ही बुद्धि में; वह नैतिक विवेक और मानवीय उत्तरदायित्व से उत्पन्न होती है।

गेटे की परिपक्वता ने इस अन्तर्विरोध को और अधिक गहराई से उजागर किया; उन्होंने उसके दोनों पक्षों को एक साथ देखने योग्य बनाया। वे फ़ाउस्ट के ठहराव को अस्वीकार करने के साहस की प्रशंसा कर सकते थे, साथ ही रुक न सकने की उसकी असमर्थता से भयभीत भी हो सकते थे। वे मेफ़िस्टोफ़िलीस के संशयवाद को मूल्यवान मान सकते थे, किन्तु यह भी पहचानते थे कि स्थायी निषेध अन्ततः प्रत्येक निष्ठा को भीतर से क्षीण कर देता है।

जीवन न केवल यह है, न केवल वह; वह इन दोनों ध्रुवों के बीच कभी न थमने वाले लोलक की तरह निरन्तर झूलता रहता है।

जब गेटे ने फ़ाउस्ट के द्वितीय भाग को एक “अधिक ऊँचे, अधिक व्यापक, अधिक स्पष्ट” और अधिक निर्वैयक्तिक संसार से सम्बन्धित बताया, तब वे दृष्टिकोण में आए इसी परिवर्तन को चिह्नित कर रहे थे। प्रथम भाग व्यक्तिपरक पीड़ा के निकट बना रहता है; द्वितीय भाग फ़ाउस्ट को उससे कहीं अधिक विशाल व्यवस्थाओं के भीतर स्थापित करता है। अपने जीवन के उत्तरार्ध में गेटे की चेतना व्यक्तिगत अनुभव की तीव्रता से आगे बढ़कर सभ्यता के मनन की ओर मुड़ चुकी थी—और उनका काव्य-नाटक भी उसके साथ उसी दिशा में विस्तृत होता गया।

5. प्रयत्नशीलता: अभिशाप या आह्वान?

फ़ाउस्ट: प्रथम भाग काव्य-नाटक ‘स्वर्ग में प्रस्तावना’ (Prolog im Himmel) से आरम्भ होता है—एक ऐसे दिव्य संवाद से, जिसमें ईश्वर और मेफ़िस्टोफ़िलीस मनुष्य के स्वभाव तथा फ़ाउस्ट की नियति पर विचार करते हैं। इसका सार यह है कि मनुष्य प्रयत्न करते हुए भटक सकता है, किन्तु उसकी बेचैनी और सतत् खोज ही अन्ततः उसे पतन से ऊपर उठने की सम्भावना प्रदान करती है।

गेटे अब ग्रेचेन की त्रासदी को एक ब्रह्माण्डीय अपरिहार्यता के रूप में स्थापित कर देते हैं। मेफ़िस्टोफ़िलीस मानता है कि मनुष्य की आकांक्षा मूलतः निरर्थक है। मनुष्य स्वयं को विवेकशील प्राणी समझता है, किन्तु वह अपने विवेक का उपयोग मुख्यतः—जैसा कि मेफ़िस्टोफ़िलीस उपहासपूर्वक कहता है—पशुओं से भी अधिक पशुवत् बनने के लिए करता है।

ईश्वर इस बात से असहमत नहीं हैं कि फ़ाउस्ट भटकेगा, असफल होगा और दूसरों को पीड़ा पहुँचाएगा। भूल मानव-यात्रा में आने वाला कोई आकस्मिक व्यवधान नहीं है; वह उसकी अनिवार्य परिस्थितियों में से एक है। फिर भी ईश्वर एक अधिक गहरा विश्वास व्यक्त करते हैं—

Ein guter Mensch, in seinem dunklen Drange,
Ist sich des rechten Weges wohl bewusst.

“एक अच्छा मनुष्य अपनी धुँधली प्रयत्नशीलता में भी सही मार्ग का बोध बनाए रखता है।”

यह प्रस्तावना सम्पूर्ण नाटक के अर्थ को रूपान्तरित कर देती है। अब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि फ़ाउस्ट दोषी है या नहीं। वह स्पष्टतः दोषी है। अधिक गहरा प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य की भूल किसी विकासात्मक प्रक्रिया का अंग बन सकती है। क्या आकांक्षा अपने कारण उत्पन्न हुई पीड़ा से कुछ सीख सकती है? क्या प्रयत्नशीलता अधिक विवेकवान बन सकती है, अथवा वह केवल अधिक शक्ति अर्जित करती जाती है?

मेफ़िस्टोफ़िलीस का निराशावाद अत्यन्त सरल है, क्योंकि वह मान लेता है कि मनुष्य को स्थायी रूप से तृष्णा, दम्भ और मूर्खता तक सीमित किया जा सकता है। किन्तु प्रगति में भावुकतापूर्ण विश्वास भी उतना ही सरलीकृत होगा। ग्रेचेन की पीड़ा हमें फ़ाउस्ट के विकास को आत्मज्ञान की ओर बढ़ती किसी निष्कलुष तीर्थयात्रा के रूप में देखने से रोकती है। फ़ाउस्ट अन्ततः चाहे जो बन जाए, उसका विकास मार्ग में नष्ट और क्षतिग्रस्त हुए जीवनों को मिटा नहीं सकता।

इसलिए केवल फ़ाउस्ट के निरन्तर गतिशील बने रहने से ही इस शर्त का निर्णय नहीं हो जाता। फ़ाउस्ट मानो विश्राम करने में लगभग असमर्थ है। वह विद्वत्ता से जादू की ओर, कामना से सौन्दर्य की ओर, सम्राट की सेवा से सैन्य हस्तक्षेप की ओर और भू-स्वामित्व से विराट सार्वजनिक निर्माण-कार्यों की ओर बढ़ता जाता है। प्रत्येक उपलब्धि उसके सामने असन्तोष का एक नया क्षितिज खोल देती है। मानो किसी जागृत और कभी न बुझने वाली प्यास से अभिशप्त होकर, वह किसी एक वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि निरन्तर अतिक्रमण की अवस्था की खोज करता है।

यही बात फ़ाउस्ट को स्पष्टतः आधुनिक बनाती है। परम्परागत समाज सामान्यतः मनुष्य को एक ऐसी व्यवस्था के भीतर स्थान देते थे, जिसका निर्माण उसने स्वयं नहीं किया था। आधुनिकता उसे प्रत्येक व्यवस्था को अस्थायी और परिवर्तनशील मानने के लिए प्रेरित करती है। प्रकृति को पुनर्गठित किया जा सकता है, संस्थाओं को नया रूप दिया जा सकता है, पहचानों का पुनर्निर्माण किया जा सकता है और भविष्य को योजनाबद्ध किया जा सकता है।

ऐसी स्वतन्त्रता ऐतिहासिक रूप से सृजनशील है, किन्तु आध्यात्मिक रूप से अस्थिर करने वाली भी। जब हर सीमा कृत्रिम दिखाई देने लगे, तब सीमित होना ही अपमान बन जाता है।

फ़ाउस्ट की प्रतिज्ञा इस आधुनिक स्थिति को नाटकीय रूप प्रदान करती है। वह स्वयं को केवल उसी क्षण खोएगा, जब वह सन्तुष्ट हो जाएगा—जब वह बीतते हुए क्षण से कहेगा कि वह ठहर जाए, क्योंकि वह इतना सुन्दर है। आरम्भ में यह शर्त उसे आत्मसन्तोष से बचाती हुई प्रतीत होती है। फ़ाउस्ट कभी निष्क्रिय सुविधा अथवा स्थिर सन्तोष के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगा। किन्तु यही प्रतिज्ञा उसके सबसे बड़े संकट को भी प्रकट करती है—वह ऐसे किसी मूल्य को पहचान ही नहीं सकता, जो तत्काल किसी नई सम्भावना का द्वार न खोलता हो।

गेटे का प्रश्न यह नहीं है कि मानवता को प्रयत्न करना छोड़ देना चाहिए। ऐसा करना आकांक्षाविहीन मानवता का अपनी ही सम्भावनाओं से विश्वासघात होगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य की प्रयत्नशीलता, शक्ति उसकी दृष्टिहीनता को कई गुना बढ़ा दे उससे पहले, अपने उद्यमों के परिणामों का उत्तरदायित्व ग्रहण करना सीख सकती है।

क्या मनुष्य सृजनात्मक अतिक्रमण और विनाशकारी बेचैनी के बीच भेद कर सकता है? क्या वह संसार और दूसरे मनुष्यों को अपने आत्म-विस्तार की सामग्री बनाए बिना अपनी क्षमताओं का विकास कर सकता है?

शेष नाटक इसी सम्भावना की परीक्षा करने का गेटे का प्रयास है।

6. निजी तृष्णा सार्वजनिक सत्ता बन जाती है

फ़ाउस्ट: प्रथम भाग में फ़ाउस्ट के पास संस्थागत शक्ति बहुत कम है। वह व्यक्तियों को हानि पहुँचा सकता है, किन्तु समाज को पुनर्गठित नहीं कर सकता। द्वितीय भाग में इसका पैमाना बदल जाता है। फ़ाउस्ट सम्राट के दरबार में प्रवेश करता है, जहाँ सत्ता एक प्रदर्शन बन चुकी है, वित्तीय व्यवस्था ढह रही है और प्रशासन का वास्तविकता से सम्पर्क टूट गया है। दरबार तमाशों के सहारे जीवित है। गम्भीर समस्याओं को मनोरंजन में बदल दिया जाता है और मनोरंजन शासन का विकल्प बन जाता है।

इन परिस्थितियों में मेफ़िस्टोफ़िलीस अपने सबसे विलक्षण आविष्कारों में से एक प्रस्तुत करता है—काग़ज़ी मुद्रा (paper currency), जिसके मूल्य की गारण्टी कथित रूप से साम्राज्य की भूमि के नीचे दबे हुए खज़ानों से दी जाती है।

गेटे केवल काग़ज़ी मुद्रा की आलोचना नहीं कर रहे थे। वे मानवीय कल्पना में घटित हो रहे एक गहरे परिवर्तन की जाँच कर रहे थे। मुद्रा ने सदैव विनिमय को सम्भव बनाया था, किन्तु आधुनिक वित्त ने समाजों को काल्पनिक भविष्यों को भी वर्तमान में सक्रिय करने की शक्ति दे दी। वचन, ऋण और सामूहिक विश्वास के आधार पर मूल्य उत्पन्न किया जा सकता था। पुराना कीमियागर दावा करता था कि सीसे को सोने में बदला जा सकता है। आधुनिक वित्तकार उससे भी अधिक शक्तिशाली रहस्य खोज लेता है—एक हस्ताक्षर को सामाजिक ऊर्जा में बदला जा सकता है।

ग्रेचेन की त्रासदी में इच्छा व्यक्तिगत है। सम्राट के दरबार में वही इच्छा व्यवस्थागत रूप धारण कर लेती है। किसी एक सहभागी को सम्पूर्ण प्रक्रिया समझने की आवश्यकता नहीं होती। सम्राट संकट से मिली राहत का आनन्द लेता है। दरबारी धन खर्च करते हैं। अधिकारी उत्सव मनाते हैं। मुद्रा चलन में फैलती जाती है। उत्तरदायित्व व्यवस्था के भीतर घुलकर अदृश्य हो जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में मेफ़िस्टोफ़िलीस फलता-फूलता है, क्योंकि अब उसे मनुष्यों को सचेत रूप से दुष्ट बनाने की आवश्यकता नहीं रहती; उसे केवल उनके कर्मों और परिणामों के बीच का सम्बन्ध अदृश्य कर देना होता है। यही उसकी आधुनिकता का सार है।

मेफ़िस्टोफ़िलीस मूलतः हिंसक आवेग का कोई राक्षस नहीं, बल्कि साधनात्मक पृथक्करण की बुद्धि है। वह सुख को उत्तरदायित्व से, मुद्रा को मूल्य से, कर्म को परिणाम से और शक्ति को जवाबदेही से अलग कर देता है। उसका सबसे प्रभावी छल यही है कि मनुष्य कर्म तो करता रहे, किन्तु उसकी कीमत और परिणाम को अपना मानना छोड़ दे।

यहीं गेटे विशाल व्यवस्थाओं की एक केन्द्रीय नैतिक समस्या का पूर्वानुमान करते हैं—कोई उपलब्धि जितनी अधिक जटिल होती जाती है, उसके प्रत्येक सहभागी के लिए केवल आंशिक उत्तरदायित्व स्वीकार करना उतना ही सरल हो जाता है।

शासक हस्ताक्षर करता है। मन्त्री आदेश को क्रियान्वित करता है। वित्तकार साधन उपलब्ध कराता है। सैनिक सुरक्षा देता है। अभियन्ता निर्माण करता है। उपभोक्ता लाभ उठाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी एक व्यक्ति ने समग्र परिणाम को जानबूझकर उत्पन्न नहीं किया। फिर भी वह परिणाम हमारे सामने उपस्थित होता है।

गेटे इस नाटक में सूक्ष्म किन्तु असन्दिग्ध रूप से चेतावनी देते हैं कि अपने उत्तरदायित्व से अनभिज्ञ होना कोई नैतिक क्षमा नहीं है; और अपनी निष्कपटता का विश्वास भी किसी को उसके कर्मों के परिणामों से नहीं बचा सकता।

7. फ़ाउस्टीय कर्म का द्वितीय नियम

नाटक के विस्तार की अगली अवस्था वाग्नर (Wagner) की प्रयोगशाला में दिखाई देती है। फ़ाउस्ट का पूर्व सहायक वाग्नर अब एक सफल विद्वान बन चुका है। किन्तु जहाँ फ़ाउस्ट ने निष्प्राण अकादमिक ज्ञान के विरुद्ध विद्रोह किया था, वहीं वाग्नर तकनीकी विशेषज्ञता को पूरे विश्वास के साथ स्वीकार करता है। अब वह जीवन के साथ किसी रहस्यात्मक एकात्मता की खोज नहीं करता; वह वैज्ञानिक विधि से जीवन का निर्माण करना चाहता है। इसका परिणाम है होमुनकुलुस (Homunculus)—काँच के एक पात्र के भीतर निर्मित एक बुद्धिमान और प्रकाशमान जीव।

उसे किसी एक आधुनिक प्रौद्योगिकी की भविष्यवाणी मान लेना अत्यधिक सरलीकरण होगा, क्योंकि गेटे ने उसकी कल्पना के लिए कीमिया, शास्त्रीय मिथकों और अपने समय की वैज्ञानिक अटकलों से सामग्री ग्रहण की थी। फिर भी यह दृश्य असाधारण रूप से आधुनिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें बुद्धि को सामान्य जैविक विकास से अलग कर दिया गया है।

होमुनकुलुस पूर्णतः जीवित होने से पहले ही सोच सकता है। उसके पास शरीर से रहित चेतना, परिपक्वता से रहित प्रतिभा और किसी स्थान अथवा समुदाय से सम्बन्धित हुए बिना गतिशीलता है। वह निर्मित सम्भावना का रूप है।

ग्रेचेन और होमुनकुलुस के बीच का अन्तर अत्यन्त अर्थपूर्ण है। ग्रेचेन उस जीवन का प्रतिनिधित्व करती है, जो शरीर, परिवार, जन्म, धर्म और समुदाय में अन्तर्निहित है। इसके विपरीत होमुनकुलुस ऐसी बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे तकनीक द्वारा उत्पन्न कर एक कृत्रिम माध्यम के भीतर सीमित कर दिया गया है। इसलिए ग्रेचेन से होमुनकुलुस तक की यात्रा जैविक जीवन से अभिकल्पित जीवन की ओर बढ़ने वाली यात्रा भी है।

गेटे इस प्रयोग का समर्थन नहीं करते; वे उसकी सम्भावना और उसके संकट—दोनों को एक साथ सामने रखते हैं। होमुनकुलुस जीवन्त, जिज्ञासु और आकर्षक है, किन्तु उसका अस्तित्व यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या प्रयोगशाला में निर्मित जीवन को केवल तकनीकी उपलब्धि मान लेना पर्याप्त है।

फ़ाउस्ट की भाँति होमुनकुलुस में भी विकसित होने की तीव्र आकांक्षा है। किन्तु उसका अस्तित्व एक ऐसा प्रश्न उठाता है, जो प्रौद्योगिक सभ्यता में लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होता गया है—क्या मानवीय प्रतिभा ऐसी शक्तियों की रचना कर सकती है, जिनका तकनीकी अस्तित्व इस नैतिक समझ से पहले प्रकट हो जाए कि उन्हें संसार में किस प्रकार स्थान दिया जाना चाहिए?

यह प्रश्न कृत्रिम जीवन से बहुत आगे तक जाता है। सभ्यताएँ बार-बार ऐसी क्षमताओं का आविष्कार करती हैं, जिन्हें संचालित करने के लिए आवश्यक संस्थाएँ, संयम और नैतिक कल्पना अभी विकसित नहीं हुई होतीं। तकनीकी सम्भावना पहले उपस्थित होती है; उत्तरदायित्व धीरे-धीरे उसके पीछे आता है—और प्रायः तभी आता है, जब हानि हो चुकी होती है।

इसे फ़ाउस्टीय कर्म का द्वितीय नियम कहा जा सकता है—

सृजित वस्तु को संचालित करने की बुद्धि प्रायः सृजन की शक्ति के बाद आती है।

क्षमता और उत्तरदायित्व के बीच के इस अन्तराल में किसी कार्य को कर सकने की योग्यता ही धीरे-धीरे उसके औचित्य का प्रमाण बनने लगती है। किन्तु विश्वास की प्रत्येक छलाँग उड़ान में नहीं बदलती; इतिहास ऐसी दुर्घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें साहस विवेक से आगे निकल गया।

सम्भावना अपनी गति स्वयं उत्पन्न करती है, जबकि संयम भीरुता, अवरोध अथवा पिछड़ेपन का प्रतीक दिखाई देने लगता है।

वाग्नर की प्रयोगशाला विशेषज्ञता की सीमाओं को भी प्रकट करती है। वह एक असाधारण तकनीकी परिणाम उत्पन्न कर सकता है, किन्तु उस परिणाम को कोई संसार प्रदान नहीं कर सकता। होमुनकुलुस को शरीर, सम्बन्ध और विकास की खोज में प्रयोगशाला से बाहर जाना पड़ता है। इसलिए केवल निर्माण से सृजन पूर्ण नहीं हो जाता। किसी वस्तु को बना देना आवश्यक नहीं कि उसे समझ लेना भी हो; बुद्धि को सक्रिय कर देना प्रज्ञा की रचना करना नहीं है।

कोई सभ्यता उत्पादन की प्रक्रिया में सिद्धहस्त हो सकती है, फिर भी इस अधिक मूलभूत प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ रह सकती है—

उत्पादन अन्ततः किस प्रकार के जीवन को पोषित करता है?

गेटे की भविष्यवाणी विशिष्ट उपकरणों के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रतिरूपों के माध्यम से कार्य करती है। उन्होंने बाद की शताब्दियों की विशेष मशीनों का पूर्वानुमान नहीं किया था; लेकिन उन्होंने उस आध्यात्मिक व्याकरण को पहचान लिया था, जिससे वे मशीनें जन्म लेने वाली थीं—प्रदत्त प्रकृति से असन्तोष, तकनीकी निर्माण में विश्वास और यह धारणा कि प्रयोगशाला से उत्पन्न प्रत्येक नई वस्तु अन्ततः उन समस्याओं को भी हल कर देगी, जिन्हें स्वयं प्रयोगशाला ने जन्म दिया है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रति हमारे विश्वास में यही प्रवृत्ति अपने चरम रूप में दिखाई देती है।

8. इतिहास का अधिग्रहण

ट्रॉय की हेलेन से फ़ाउस्ट की भेंट इच्छा के एक अन्य रूप को सामने लाती है—अतीत के सर्वोच्च सौन्दर्य को अपने अधिकार में लेने की लालसा।

हेलेन कथानक की केवल एक स्त्री-पात्र नहीं है; वह शास्त्रीय संसार—रूप, अनुपात, सौन्दर्य और सांस्कृतिक स्मृति—की साकार अभिव्यक्ति है। फ़ाउस्ट केवल उसकी प्रशंसा नहीं करता। वह उसका आह्वान करता है, उसके साथ एकात्मता चाहता है और प्राचीनता को अपने निजी अनुभव का अंग बनाने का प्रयत्न करता है।

यह प्रसंग गेटे के शास्त्रीय संस्कार को प्रतिबिम्बित करता है, विशेषतः उस रूपान्तरण को, जो उनकी इटली-यात्रा से जुड़ा था। किन्तु इसके साथ ही यह अधिग्रहण के प्रति नाटक की आलोचना का विस्तार भी करता है। अब फ़ाउस्ट केवल ऐन्द्रिय अनुभव, वैज्ञानिक ज्ञान और राजनीतिक सत्ता ही नहीं चाहता; वह सांस्कृतिक इतिहास को भी अपने अनुभव में समाहित करना चाहता है।

अतीत को बदलने की इच्छा अहं की परम धृष्टता है—और फ़ाउस्ट अब उसी सीमा का अतिक्रमण करना चाहता है।

आधुनिकता प्रायः अतीत से सम्बन्ध-विच्छेद के आधार पर स्वयं को परिभाषित करती है, किन्तु साथ ही सौन्दर्य, वैधता और प्रतिष्ठा के लिए बार-बार उसी अतीत का दोहन भी करती है। प्राचीन रूपों को उन संसारों से अलग कर दिया जाता है, जिन्होंने उन्हें अर्थ प्रदान किया था, और उन्हें नई महत्त्वाकांक्षाओं की सेवा में लगा दिया जाता है।

फ़ाउस्ट और हेलेन का मिलन कुछ समय के लिए शास्त्रीय और आधुनिक के बीच सामंजस्य की सम्भावना उत्पन्न करता है—सिद्ध रूप का बेचैन ऊर्जा से मिलन। उनका पुत्र यूफ़ोरियोन (Euphorion) इस संयोग की प्रतिभा और उसके संकट—दोनों को मूर्त करता है। वह आकाश की ओर उन्मुख है, मर्यादा के प्रति अधीर है और प्रत्येक सीमा का अतिक्रमण करने के लिए संकल्पित है। वह बन्धनों से परे छलाँग लगाता है और गिरकर नष्ट हो जाता है।

यह सामंजस्य स्थायी नहीं रह सकता। आधुनिक इच्छा केवल अपने बल पर शास्त्रीय सौन्दर्य को अधिकार में नहीं ले सकती।

अतीत का अध्ययन किया जा सकता है, उससे प्रेम किया जा सकता है और उसे नए रूप में जीवन्त किया जा सकता है; किन्तु उसकी जीवन्त अखण्डता नष्ट किए बिना उसे निजी सम्पत्ति में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

प्राचीनता के साथ गेटे का अपना सम्बन्ध इस प्रसंग को आत्मकथात्मक गहराई प्रदान करता है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन शास्त्रीय रूप को आधुनिक साहित्य में पुनर्स्थापित करने में लगाया था। फिर भी वृद्ध गेटे यह समझ चुके थे कि केवल अनुकरण अथवा अधिग्रहण के माध्यम से ऐतिहासिक समन्वय सम्भव नहीं है। जैसा कि फ़ाउस्ट में ही कहा गया है—

Was du ererbt von deinen Vätern hast,
Erwirb es, um es zu besitzen.

“जो कुछ तुमने अपने पूर्वजों से विरासत में पाया है, उसे सचमुच अपना बनाने के लिए नए सिरे से अर्जित करो।”

किन्तु फ़ाउस्ट सम्पूर्ण अनुभव चाहता है—ग्रेचेन की निष्कपटता, हेलेन का सौन्दर्य, साम्राज्य की सत्ता, वैज्ञानिक सृजनशीलता और प्रकृति पर प्रभुत्व। उसकी महानता उसकी आकांक्षा की व्यापकता में निहित है; उसका संकट इस धारणा में है कि जो कुछ उसकी चेतना का विस्तार करता है, उसे अपने अधिकार में बुला लेना भी उसका वैध अधिकार है।

जो तृष्णा पहले ग्रेचेन की ओर बढ़ी थी, वही अब समूचे इतिहास की ओर हाथ बढ़ा चुकी है।

9. फ़ाउस्टीय कर्म का तृतीय नियम

फ़ाउस्ट का अन्तिम और सर्वाधिक दूरगामी रूपान्तरण एक विकासकर्ता के रूप में होता है। सम्राट की सहायता करने के पुरस्कारस्वरूप समुद्रतटीय भूमि प्राप्त करने के बाद वह भूमि-पुनरुद्धार की एक विराट परियोजना आरम्भ करता है। समुद्र को रोकने के लिए तटबन्ध बनाए जाते हैं, बन्दरगाह निर्मित होते हैं, व्यापार का विस्तार होता है और बसावट के लिए नई भूमि उपलब्ध कराई जाती है।

उसकी महत्त्वाकांक्षा अब एक वास्तविक सामाजिक उद्देश्य ग्रहण कर चुकी है। वह केवल निजी सुख की खोज नहीं करता, बल्कि एक ऐसे स्थायी संसार की कल्पना करता है, जिसमें असंख्य लोग रह सकें और काम कर सकें।

गेटे इस आधुनिक स्वप्न की भव्यता को गम्भीरता से लेते हैं—बुद्धि द्वारा प्रकृति का रूपान्तरण, श्रम का संगठन और सामूहिक समृद्धि का निर्माण। फिर भी वे इस विराट परियोजना के बीच एक ऐसा अवरोध खड़ा कर देते हैं, जो पहली दृष्टि में लगभग नगण्य दिखाई देता है।

फ़ाउस्ट के विशाल भू-क्षेत्र के ऊपर फ़िलेमोन और बाउकिस (Philemon and Baucis) की कुटिया, छोटी-सी प्रार्थनास्थली और लिंडन के वृक्ष (Lindenbäume) स्थित हैं। फ़ाउस्ट को वहाँ भूमि का एक अनुपयोगी टुकड़ा दिखाई देता है, जो उसके दृश्य और योजना में बाधा डालता है; किन्तु वृद्ध दम्पति के लिए वह एक ऐसा घर है, जिसे स्मृतियों, उपासना और आत्मीय सम्बन्ध ने पवित्र बना दिया है।

जब वे किसी अन्य स्थान पर बसाए जाने से इनकार कर देते हैं, तब मेफ़िस्टोफ़िलीस हिंसा द्वारा उस अवरोध को हटा देता है। उनका घर जला दिया जाता है और उसमें रहने वाले लोग मारे जाते हैं। फ़ाउस्ट इस घटना से स्तब्ध है, किन्तु वह निर्दोष नहीं है। उसने वह माँग उत्पन्न की थी, जिसे मेफ़िस्टोफ़िलीस ने पूरा किया।

वह उन्हें हटाना चाहता था, किन्तु साथ ही एक लोक-कल्याणकारी व्यक्ति के रूप में अपनी छवि भी सुरक्षित रखना चाहता था।

यहीं ग्रेचेन की त्रासदी विस्तृत होकर सभ्यता की त्रासदी बन जाती है। कभी ग्रेचेन फ़ाउस्ट के नए अनुभवों की खोज के मार्ग में बाधा बनी थी; अब फ़िलेमोन और बाउकिस सम्पूर्ण भू-क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने की उसकी आकांक्षा में बाधा बनते हैं।

दोनों ही स्थितियों में किसी दूसरे मनुष्य का अपने संसार में जड़ें जमाए हुआ अस्तित्व फ़ाउस्ट की गतिशील और अतृप्त इच्छा के सामने आ खड़ा होता है। फ़ाउस्ट स्पष्ट रूप से उनकी मृत्यु की माँग नहीं करता; वह केवल उन्हें वहाँ से हटाने की माँग करता है। किन्तु जिन लोगों को उनके संसार से अलग नहीं किया जा सकता, उनके लिए विस्थापन स्वयं विनाश बन सकता है।

आधुनिक विकास बार-बार पैमाने की भाषा द्वारा ऐसी हिंसा को उचित ठहराता है। एक विराट भविष्य को एक छोटे-से वर्तमान के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाता है। लाभों की गणना की जाती है, जबकि पीड़ितों को कुछ व्यक्तिगत प्रसंगों तक सीमित कर दिया जाता है। प्रतिरोध अविवेकपूर्ण दिखाई देने लगता है, क्योंकि स्मृति, आत्मीयता और अपनेपन के अर्थ को आर्थिक क्षतिपूर्ति की भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

इसे फ़ाउस्टीय कर्म का तृतीय नियम कहा जा सकता है—

जिस कल्याण का वचन दिया जा रहा है, उसकी विशालता उसे प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधनों को नैतिक निर्दोषता प्रदान नहीं करती।

वर्षों तक निरन्तर वनों की कटाई, नदियों के प्रवाह को मोड़ने और औद्योगिक गैसों के उत्सर्जन ने आज हमें एक भयावह और अब अपरिवर्तनीय जलवायु परिवर्तन के सामने ला खड़ा किया है। मानवता को निर्माण करना ही होगा; किन्तु निर्माण उस समय फ़ाउस्टीय बन जाता है, जब वह अपने मार्ग में खड़े लोगों के प्रति उत्तरदायी रहना छोड़ देता है।

10. अन्धत्व, मृत्यु और अनुग्रह

फ़िलेमोन और बाउकिस की मृत्यु के बाद ‘चिन्ता’ (Sorge) का रूप धारण किए हुए एक आकृति फ़ाउस्ट के महल में प्रवेश करती है और उसे अन्धा कर देती है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है—

फ़ाउस्ट अपनी शारीरिक दृष्टि उसी क्षण खोता है जब उसका आन्तरिक अन्धत्व अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुका होता है।

उसके पास भूमि, सम्पत्ति, श्रम और सत्ता है, पर अब वह अपनी उपलब्धियों के नैतिक भू-दृश्य को देख पाने में असमर्थ है।

फिर भी फ़ाउस्ट योजनाएँ बनाता रहता है। खुदाई की आवाज़ सुनकर वह समझता है कि श्रमिक उस जल-निकासी व्यवस्था को पूरा कर रहे हैं, जो समुद्र से प्राप्त उसकी भूमि को सुरक्षित बनाएगी। वास्तव में, लेमूर्स (Lemuren)—मृत्यु के वे प्रेतवत् सेवक, जिन्हें मेफ़िस्टोफ़ेलीस ने बुलाया है—उसकी कब्र खोद रहे होते हैं।

फ़ाउस्ट उनके फावड़ों की आवाज़ को भी अपने भावी निर्माण की ध्वनि समझता है। फ़ाउस्ट अपने ही दफ़न की ध्वनि को निर्माण की निरन्तरता का संकेत समझता है। मृत्यु भी उसे उत्पादकता के रूप में सुनाई देती है।

उसकी भूल केवल इन्द्रियजनित नहीं है। वह वही सुनता है, जो उसकी परियोजना ने उसे सुनना सिखाया है। प्रत्येक ध्वनि उस भविष्य की पुष्टि बन जाती है, जिसकी उसने कल्पना कर रखी है।

यहाँ गेटे एक व्यक्ति की त्रासदी से आगे बढ़कर संस्थाओं और सभ्यताओं के अन्धत्व तक पहुँचते हैं। वे भी सफलता के संकेत उत्पन्न करती रह सकती हैं, जबकि वे यह पूछने की क्षमता खो चुकी हों कि सफलता का अर्थ क्या है। अधिक निर्माण, अधिक तीव्र गति, अधिक संचरण और अधिक उत्पादन स्वयं में ही उचित ठहरने लगते हैं।

कोई सभ्यता कार्यकुशलता में अत्यन्त प्रतिभाशाली होते हुए भी नैतिक रूप से अन्धी हो सकती है।

फिर भी फ़ाउस्ट की अन्तिम दृष्टि अत्यन्त मार्मिक है। वह ऐसे स्वतन्त्र मनुष्यों की कल्पना करता है, जो सामूहिक श्रम से सुरक्षित की गई भूमि पर रहते और कार्य करते हों। पहली बार उसका सुख केवल अपने अनुभवों की तीव्रता से नहीं, बल्कि दूसरों के उत्कर्ष से जुड़ता दिखाई देता है।

किन्तु यह दृष्टि अब भी गहरे रूप से विडम्बनापूर्ण है। वह स्वतन्त्रता की कल्पना करता है, जबकि मेफ़िस्टोफ़ेलीस के सेवक उसकी कब्र खोद रहे हैं। वह उस भूमि पर सुरक्षित समुदाय की कल्पना करता है, जिसे हिंसा के माध्यम से प्राप्त किया गया है। वह भविष्य को देखता है, पर वर्तमान के मृतकों को स्वीकार नहीं कर पाता।

उसकी सर्वोच्च आकांक्षा उसी क्षण प्रकट होती है, जब वह उसकी नैतिक परीक्षा करने में असमर्थ हो चुका है।

फ़ाउस्ट विकसित हुआ है, पर पर्याप्त नहीं। वह उपभोग से योगदान की ओर बढ़ा है, किन्तु उसके जीवन के आरम्भिक चरणों में बनी प्रभुत्व की आदतें अब भी उसके साधनों में विद्यमान हैं। गेटे का प्रश्न अत्यन्त तीक्ष्ण हो उठता है—

क्या किसी आकांक्षा को उसके महान लक्ष्य के कारण उद्धार योग्य माना जा सकता है, जब उसके साधन उसी हिंसा को पुनः उत्पन्न करते रहें, जिससे ऊपर उठने का वह दावा करती है?

इसलिए फ़ाउस्ट के उद्धार को दोषमुक्ति नहीं समझा जाना चाहिए। गेटे ग्रेचेन के प्रलोभन, उससे जुड़ी मृत्यु की घटनाओं, युद्ध की हिंसा अथवा फ़िलेमोन और बाउकिस के विनाश को आकस्मिक कीमतों की तरह नहीं देखते। न ही फ़ाउस्ट केवल इसलिए बचाया जाता है कि वह निरन्तर प्रयत्नशील रहता है, क्योंकि उसी प्रयत्नशीलता ने नाटक में बहुत-सा दुःख भी उत्पन्न किया है।

वह इसलिए नहीं बचता कि उसका जीवन-वृत्त निष्कलंक है, बल्कि इसलिए कि किसी मनुष्य को केवल उसके कर्मों के लेखे-जोखे तक सीमित नहीं किया जा सकता। फ़ाउस्ट दोषी बना रहता है, किन्तु उसका दोष उसके अस्तित्व का सम्पूर्ण सत्य नहीं बनता। उसने स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया है, पर उसके रूपान्तरण की सम्भावना समाप्त नहीं हुई है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि—

फ़ाउस्ट स्वयं को स्वर्ग तक नहीं उठाता। उसे उठाया जाता है।

प्रेम, अनुग्रह और मध्यस्थता वह कर दिखाते हैं, जो इच्छा, बुद्धि और कर्म नहीं कर सके। ग्रेचेन—जिसे फ़ाउस्ट की अनुभव-लिप्सा ने सबसे अधिक पीड़ा पहुँचाई थी—उसकी आध्यात्मिक मार्गदर्शिका के रूप में लौटती है।

उसकी उपस्थिति उसके दुःख को मिटाती नहीं; बल्कि उस दुःख की स्मृति को फ़ाउस्ट के उद्धार के अर्थ से अविभाज्य बना देती है। फ़ाउस्ट अपने पीड़ित को भूलकर ऊपर नहीं उठ सकता। उसका आरोहण उस नैतिक चेतना से होकर गुजरना आवश्यक है, जिसका प्रतिनिधित्व ग्रेचेन करती है।

यहाँ ‘शाश्वत नारीत्व’ (das Ewig-Weibliche) को केवल किसी लैंगिक सिद्धान्त के रूप में नहीं, बल्कि उस नैतिक शक्ति के रूप में समझना अधिक उचित है जो फ़ाउस्टीय अतिरेक का संशोधन करती है। वह विजय के स्थान पर ग्रहणशीलता, एकाकीपन के स्थान पर सम्बन्ध, अमूर्तता के स्थान पर करुणामय देखभाल और बलप्रयोग के स्थान पर आकर्षण की शक्ति को प्रतिष्ठित करती है।

पूरे नाटक में फ़ाउस्ट जो कुछ चाहता है, उसे अपने अधिकार में लेने का प्रयास करता है। अन्तिम क्षणों में उसे स्वयं को खिंचने देना पड़ता है। यह उलटाव निर्णायक है।

फ़ाउस्टीय इच्छा छवियों को बुला सकती है, सम्पत्ति पैदा कर सकती है, बाँध बना सकती है और भूभाग का पुनर्गठन कर सकती है, किन्तु वह स्वयं का उद्धार नहीं कर सकती। उद्धार वहीं आरम्भ होता है, जहाँ आत्मनिर्भरता का अहंकार समाप्त होता है।

इस प्रकार गेटे का निष्कर्ष आधुनिक युग में कर्म के महिमामण्डन पर एक आवश्यक सीमा लगाता है। मनुष्य को कार्य करना चाहिए, सृजन करना चाहिए और प्रयत्नशील रहना चाहिए; किन्तु प्रेम से रहित कर्म अपने उद्देश्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। अनुग्रह से रहित बुद्धि उन जीवनों को समझ नहीं सकती, जिन्हें उसने क्षति पहुँचाई है। और स्मृति से रहित प्रगति अन्ततः पुनरावृत्ति का ही एक दूसरा रूप बन जाती है।

फ़ाउस्ट का उद्धार उसके अपराधों की दोषमुक्ति नहीं है; वह केवल उस दीर्घ शुद्धिकरण का आरम्भ है, जिसे न उपलब्धि पूरा कर सकती है, न ज्ञान और न ही शक्ति।

जिस मनुष्य ने जीवन भर संसार को अपनी इच्छा के अधीन करना चाहा, उसे अन्ततः स्वयं उस करुणा, सम्बन्ध और अनुग्रह के सामने समर्पित होना पड़ता है, जिन्हें उसने अपनी विजय-यात्रा में बार-बार उपेक्षित किया था।

फ़ाउस्ट बचाया इसलिए नहीं जाता कि उसने पर्याप्त शक्ति अर्जित कर ली थी, बल्कि इसलिए कि शक्ति की सीमाओं के पार भी उसके रूपान्तरण की सम्भावना शेष थी।

11. जब इच्छा व्यवस्था बन जाती है

अब फ़ाउस्ट: भाग एक से भाग दो तक के विकास को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। भाग एक में नैतिक प्रश्न व्यक्तिगत है—फ़ाउस्ट ने ग्रेचेन के साथ क्या किया? भाग दो में वही प्रश्न संरचनात्मक हो जाता है—जब फ़ाउस्ट की दृष्टि संस्थाओं का रूप धारण कर लेती है, तब क्या होता है?

यही नाटक का सबसे भविष्यदर्शी विस्तार है। किसी व्यक्ति की आकांक्षा परिस्थितियों से सीमित होती है, किन्तु कोई सभ्यता वित्त, प्रशासन, सेनाओं, प्रयोगशालाओं, बाज़ारों और मशीनों के माध्यम से इच्छा को असाधारण रूप से बढ़ा सकती है। व्यवस्था व्यक्तिगत इच्छा को समाप्त नहीं करती; वह उसे विस्तृत करती है, अनेक स्तरों पर वितरित करती है और उसके वास्तविक स्वरूप को छिपा देती है।

आधुनिक दायित्वहीनता प्रायः ठीक इसी रूप में प्रकट होती है। लोग स्वयं को किसी संस्था के घोषित उद्देश्य से जोड़ते हैं, पर उन साधनों से अपना सम्बन्ध अस्वीकार कर देते हैं जिनके माध्यम से वह उद्देश्य पूरा किया जाता है। गेटे ने समझ लिया था कि विनाशकारी परिणामों के लिए सदैव दुष्ट इरादों की आवश्यकता नहीं होती।

एक उचित लक्ष्य, यदि अमूर्तन, अधीरता और प्रत्यायोजित हिंसा से जुड़ जाए, तो वही पर्याप्त हो सकता है।

फ़ाउस्टीय कर्म-प्रक्रिया का बार-बार उभरने वाला व्याकरण असन्तोष से आरम्भ होता है—जो कुछ विद्यमान है, वह अपर्याप्त प्रतीत होता है। असन्तोष नवाचार को जन्म देता है; नवाचार को संसाधनों की आवश्यकता होती है; संसाधन अमूर्तन के माध्यम से जुटाए जाते हैं; अमूर्तन विस्तार को सम्भव बनाता है; विस्तार निर्णय और उसके परिणाम के बीच दूरी उत्पन्न करता है; और यह दूरी उत्तरदायित्व को दुर्बल कर देती है।

उसके बाद होने वाली क्षति को प्रगति की अपरिहार्य कीमत बताया जाता है।

यह क्रम पूरे नाटक में बार-बार दिखाई देता है। विद्वान का असन्तोष उसे जादू की ओर ले जाता है, जादू प्रलोभन की ओर और प्रलोभन ग्रेचेन के संसार के विनाश की ओर। वित्तीय संकट काग़ज़ी मुद्रा को जन्म देता है, जो काल्पनिक सम्पत्ति को तत्काल आर्थिक प्रचलन में बदल देती है। वैज्ञानिक महत्त्वाकांक्षा होमुनकुलुस को उत्पन्न करती है, इससे पहले कि जीवन में उसके स्थान को समझा गया हो। राजनीतिक संघर्ष जादुई युद्ध की ओर ले जाता है, विजय क्षेत्रीय पुरस्कार में बदलती है और समुद्र से भूमि प्राप्त करने की परियोजना उन लोगों के विस्थापन और मृत्यु का कारण बनती है जो योजना के मार्ग में बाधा बनते हैं।

प्रत्येक उपलब्धि एक सीमा को पार करती है, किन्तु साथ ही उससे भी बड़ी नैतिक समस्या उत्पन्न कर देती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञान, धन, प्रौद्योगिकी या विकास अपने आप में आसुरी हैं। मेफ़िस्टोफ़ेलीस किसी एक उपकरण के भीतर निवास नहीं करता; वह उपकरणों के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण में बसता है—इस विश्वास में कि कार्यकुशलता उत्तरदायित्व को स्थगित कर देती है।

फ़ाउस्टीय सभ्यता की पहचान मशीनों से नहीं, बल्कि इस अस्वीकार से होती है कि कोई सीमा केवल इसलिए स्वीकार कर ली जाए क्योंकि वह पहले से विद्यमान है।

सीमाओं को न मानने की इस वृत्ति ने मनुष्य को असाधारण मुक्ति प्रदान की है, किन्तु इसी ने प्रकृति, इतिहास और मानव-जीवन को निरन्तर पुनर्रचना के लिए उपलब्ध वस्तुओं में भी बदल दिया है। ज्ञान, समृद्धि, स्वतन्त्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास जैसी उचित इच्छाएँ भी तब विनाशकारी हो सकती हैं, जब उन्हें उन विशिष्ट मनुष्यों और जीवित अस्तित्वों से अलग कर दिया जाए जो उनकी प्राप्ति से प्रभावित होते हैं।

उपलब्धि अपने आप में बुराई नहीं है, किन्तु सफलता अपरीक्षित इच्छा के प्रभाव-क्षेत्र को विस्तृत कर देती है।

शक्ति जितनी अधिक होती है, उसके परिणामों की कल्पना करने का दायित्व उतना ही गहरा होना चाहिए। फिर भी शक्ति प्रायः अपने चारों ओर विशेषज्ञों, अधिकारियों और प्रक्रियाओं का ऐसा घेरा बना लेती है, जो परिणामों को उस व्यक्ति की दृष्टि से और अधिक अदृश्य कर देता है जिसके आदेश से वे उत्पन्न होते हैं।

इसलिए गेटे की चेतावनी उनके विस्मय और प्रशंसा से अलग नहीं की जा सकती। वे संसार को रूपान्तरित करने की मानवीय आकांक्षा की भव्यता को समझते थे और किसी रूढ़िवादी लेखक की तरह फ़ाउस्ट की केवल निन्दा नहीं कर सकते थे। फ़ाउस्ट की ऊर्जा उसी मानवीय प्रयत्नशीलता का एक रूप है, जो कला, विज्ञान, खोज और सभ्यता को जन्म देती है।

यह अन्तर्विरोध स्वयं गेटे के भीतर भी विद्यमान था। कवि के रूप में वे जैविक और स्वाभाविक रूप-सौन्दर्य का सम्मान करते थे; शास्त्रीयतावादी के रूप में वे मर्यादा और सन्तुलन खोजते थे; वैज्ञानिक के रूप में वे अनुशासित अवलोकन करते थे; प्रशासक के रूप में वे हस्तक्षेप की आवश्यकता स्वीकार करते थे; और आधुनिक बुद्धिजीवी के रूप में वे वैश्विक आदान-प्रदान तथा विराट परियोजनाओं की ओर देखते थे।

फ़ाउस्ट वह रंगभूमि बन गया, जहाँ उनकी ये सभी प्रतिबद्धताएँ एक-दूसरे के सामने उपस्थित हुईं।

गेटे की भविष्यदर्शी शक्ति इसी बात से उत्पन्न होती है कि उन्होंने इस संघर्ष का समय से पहले कोई सरल समाधान प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने न तो प्रगति की पूजा की और न अतीत-राग में शरण ली। वे जानते थे कि मानवता संसार को रूपान्तरित करना जारी रखेगी।

निर्णायक प्रश्न यह था कि क्या उसकी नैतिक कल्पनाशक्ति उसकी तकनीकी शक्ति जितनी तीव्र गति से विकसित हो सकेगी।

फ़ाउस्ट अन्त में केवल अपनी दृष्टि नहीं खोता; वह उस नैतिक अन्धत्व का दृश्य रूप धारण कर लेता है, जिसका अभ्यास उसने जीवन भर किया था। उसकी प्रत्येक परियोजना ने उसे वही देखने की शिक्षा दी, जिसे मापा, उपयोग किया, बदला या अपने उद्देश्य में समाहित किया जा सके।

जो कुछ उसकी योजना से बाहर था—व्यक्ति की पीड़ा, स्मृति का अधिकार, प्रकृति की सीमा, जीवन की स्वतन्त्र गरिमा—वह धीरे-धीरे उसकी चेतना से अदृश्य होता गया।

इसीलिए उसकी शारीरिक अन्धता आकस्मिक दण्ड नहीं, बल्कि उसके सम्पूर्ण जीवन-दृष्टिकोण की अन्तिम परिणति है।

12. फ़ाउस्ट : मानवता की खुली नियति

फ़ाउस्ट को मानवता की नियति कहा जा सकता है, क्योंकि वह आधुनिक सभ्यता की केन्द्रीय दुविधा को मूर्त रूप देता है। उसके रूपान्तरण आधुनिक सभ्यता के अपने विकास से मिलते-जुलते हैं—विरासत में प्राप्त सत्ता के विरुद्ध विद्रोह, ज्ञान का तकनीक में, तकनीक का उत्पादन में और उत्पादन का प्रकृति तथा मानव-जीवन को पुनर्गठित करने वाली शक्ति में रूपान्तरण। आरम्भ में उसे संसार अपर्याप्त दिखाई देता है; अन्त तक वह उसे नए सिरे से गढ़ने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। इन दोनों अवस्थाओं के बीच आधुनिकता का नैतिक इतिहास निहित है।

किन्तु अन्ततः नाटक को ग्रेचेन के पास लौटना ही पड़ता है। वह केवल भाग एक का केन्द्र नहीं है; वह वह कसौटी है, जिस पर फ़ाउस्ट के सम्पूर्ण जीवन का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वह उस अविभाज्य और अपरिमेय मनुष्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके जीवन को किसी दूसरे व्यक्ति की आकांक्षा की विराटता के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

फ़िलेमोन और बाउकिस सभ्यतागत स्तर पर उसी सत्य के प्रतिरूप हैं। पैमाना बदल गया है, पर ढाँचा वही बना रहता है—एक युवती का कमरा समुद्रतटीय भूभाग में बदल जाता है, प्रलोभन विकास का रूप ले लेता है और व्यक्तिगत परित्याग प्रशासनिक विस्थापन में परिणत हो जाता है।

फ़ाउस्ट का असन्तोष उसकी महानता भी है और उसका संकट भी। वह मृत ज्ञान, निष्क्रिय अस्तित्व और विरासत में मिली सीमाओं को स्वीकार करने से इनकार करता है, किन्तु वह पर्याप्तता को पहचान नहीं पाता। प्रत्येक वस्तु को या तो उसके अनुभव का विस्तार करना चाहिए या उसकी परियोजना के आगे समर्पित हो जाना चाहिए।

ग्रेचेन एक अनुभव बन जाती है, हेलेन अधिकार में लिया गया सौन्दर्य, धन जादू, जीवन निर्माण की वस्तु और प्रकृति अधिग्रहण योग्य भूभाग। जैसे-जैसे उसकी शक्ति बढ़ती है, भावनात्मक दायित्वहीनता संरचनात्मक हिंसा में बदल जाती है। एक स्त्री की त्रासदी उस सभ्यता की त्रासदी बन जाती है, जो अपने रूपान्तरणों को समझने की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र गति से संसार को बदल सकती है।

गेटे प्रयत्नशीलता की निन्दा नहीं करते। आकांक्षा से रहित मानवता अपनी सम्भावनाओं के साथ विश्वासघात करेगी। संकट उस प्रयत्नशीलता में है, जो अपने क्षितिज से परे कुछ भी नहीं देखती।

उत्तरदायी प्रयत्न के लिए सजगता, स्मृति, संयम और इस स्वीकार की आवश्यकता होती है कि किसी दूसरे मनुष्य का छोटा-सा संसार भी ऐसा मूल्य रख सकता है, जिसकी गणना कोई विराट परियोजना नहीं कर सकती। उसे केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि क्या बनाया जा सकता है, बल्कि यह भी कि उस निर्माण से क्या नष्ट होगा; केवल यह नहीं कि कितने लोगों को लाभ मिलेगा, बल्कि यह भी कि लाभ के गणित से कौन अदृश्य हो गया है।

इसलिए फ़ाउस्ट का उद्धार उसकी दोषमुक्ति नहीं है। उसकी उपलब्धियाँ उसके अपराध को मिटाती नहीं, किन्तु अपराध भी उसके अस्तित्व का सम्पूर्ण सत्य नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि—

फ़ाउस्ट स्वयं को स्वर्ग तक नहीं उठाता; उसे उठाया जाता है।

प्रेम, अनुग्रह और मध्यस्थता वह कर दिखाते हैं, जो इच्छा और बुद्धि नहीं कर सके। ग्रेचेन उसकी आध्यात्मिक मार्गदर्शिका के रूप में लौटती है, क्योंकि उद्धार पीड़ित को पीछे छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता।

नाटक का समापन गेटे के ‘शाश्वत नारीत्व’ के आह्वान के साथ होता है—

Das Ewig-Weibliche zieht uns hinan.

“शाश्वत नारीत्व हमें ऊपर की ओर खींचता है।”

इसे प्रेम, ग्रहणशीलता, सम्बन्ध और अनुग्रह की उस शक्ति के रूप में समझा जा सकता है, जो फ़ाउस्टीय इच्छा की एकाकी सम्प्रभुता को सन्तुलित और संशोधित करती है। फ़ाउस्ट का आरोहण उस जीवन की स्मृति से होकर गुजरना आवश्यक है, जिसे उसने क्षति पहुँचाई थी, और उस शक्ति के माध्यम से सम्भव होता है, जिसे वह न तो उत्पन्न कर सकता है और न आदेश दे सकता है।

यहीं फ़ाउस्ट अन्ततः मेफ़िस्टोफ़ेलीस को उस प्रश्न के सामने ला खड़ा करता है, जिसका उत्तर उसके पास नहीं है—

तुम क्या नहीं कर सकते?

मेफ़िस्टोफ़ेलीस इच्छाओं को भड़का सकता है, भ्रम रच सकता है, बाधाओं को हटवा सकता है, सत्ता को संगठित कर सकता है और विनाश को एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया में बदल सकता है। किन्तु वह प्रेम नहीं कर सकता, क्षमा नहीं दे सकता, किसी के लिए मध्यस्थता नहीं कर सकता और किसी जीवन को अन्तिम अर्थ प्रदान नहीं कर सकता।

वह मनुष्य को गिरा सकता है, पर उसके पतन के अर्थ का अन्तिम निर्णय नहीं कर सकता। इस अर्थ में फ़ाउस्ट उसे अधिक शक्ति या चतुराई से नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में प्रवेश करके मात देता है जहाँ निषेध की पहुँच समाप्त हो जाती है।

मेफ़िस्टोफ़ेलीस की पराजय फ़ाउस्ट की विजय से नहीं, बल्कि अनुग्रह की उपस्थिति से होती है।

अन्तिम शिक्षा न तो यह है कि “प्रयत्न करना छोड़ दो” और न यह कि “प्रगति हमें बचा लेगी।” वह इससे कहीं अधिक कठिन है—

प्रयत्न करो, किन्तु देखना सीखो।
सृजन करो, किन्तु उसके प्रति उत्तरदायी बने रहो जिसे तुम्हारा सृजन विस्थापित करता है।
रूपान्तरण करो, किन्तु शक्ति को प्रज्ञा मत समझो।
आगे बढ़ो, किन्तु ग्रेचेन की स्मृति को अपने साथ लेकर चलो।

फ़ाउस्ट आज भी भविष्यदर्शी है, क्योंकि आधुनिक सभ्यता स्वयं को उसी निर्णायक क्षण में पाती है, जहाँ वह अपने अन्तिम समय में खड़ा था—अपार सामर्थ्य से सम्पन्न, निरन्तर सक्रिय, किन्तु अपने कर्म के अर्थ को लेकर अन्धी।

उसकी यात्रा फ़ाउस्टीय कर्म के तीनों नियमों को हमारे सामने पूर्ण कर देती है—

प्रथम नियम: आत्मकेन्द्रित इच्छा अन्ततः दूसरे मनुष्यों को अपने अनुभव और महत्त्वाकांक्षा का साधन बना देती है।

द्वितीय नियम: तकनीकी क्षमता, उसे संचालित करने वाली नैतिक बुद्धि से पहले आ जाती है।

तृतीय नियम: किसी महान भावी कल्याण का वादा वर्तमान में पहुँचाई गई क्षति को न्यायोचित नहीं ठहरा सकता।

इसलिए हमारे समय का निर्णायक प्रश्न यह नहीं है कि मानवता और क्या कर सकती है, बल्कि यह है कि क्या वह अपने सामर्थ्य के बीच देखना, रुकना और उत्तरदायी होना सीख सकती है।

अन्यथा वह भी फ़ाउस्ट की तरह उस ध्वनि को अपनी महान परियोजना के पूर्ण होने का संकेत समझती रहेगी, जो वास्तव में उसकी कब्र खोदे जाने की ध्वनि हो सकती है।

—अरुण तिवारी