अरुणप्रकाश – मेरा दार्शनिक दिशा-बोध

by Arun Tiwari | Jul 9, 2026

सनातन धर्म का पालन करने वाले एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मैं स्वयं को वैदिक दर्शन की परम्परा में निहित मानता हूँ, किन्तु बचपन और युवावस्था में मुझे न तो वेदों का और न ही उपनिषदों का कोई औपचारिक अध्ययन प्राप्त हुआ। अपने दार्शनिक और आध्यात्मिक उत्तराधिकार से मेरा वास्तविक परिचय सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुस्तकों के माध्यम से हुआ। उनके लेखन ने मेरे सामने भारतीय चिन्तन की उस विराट परम्परा के द्वार खोले, जिसकी गहराई और व्यापकता का मुझे पहले अनुमान भी नहीं था।

तभी मुझे यह समझ में आने लगा कि भारतीय दर्शन केवल वेदों और उपनिषदों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहस्राब्दियों में विकसित हुई एक विशाल बौद्धिक परम्परा है, जिसमें षड्दर्शन—सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा और वेदान्त—के साथ-साथ बौद्ध, जैन और अनेक अन्य चिन्तन-धाराएँ भी सम्मिलित हैं। यह एक ऐसी सभ्यता थी जिसने केवल यह नहीं पूछा कि संसार क्या है, बल्कि यह भी पूछा कि ज्ञान क्या है, चेतना क्या है, दुःख का कारण क्या है, मुक्ति क्या है, और मनुष्य को कैसे जीना चाहिए।

इसकी विविधता और वैचारिक समृद्धि ने मुझे पहली बार यह अनुभूति कराई कि भारतीय दर्शन किसी एक ग्रन्थ, सम्प्रदाय या मत का नाम नहीं, बल्कि सत्य की खोज में लगे असंख्य मनीषियों के सतत संवाद का नाम है।

वर्ष 2015 में डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के निधन ने मेरे जीवन में एक गहरा रिक्त स्थान उत्पन्न कर दिया। अनेक दशकों तक उनके साथ कार्य करते हुए मैंने न केवल एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक प्रेरणा भी प्राप्त की थी। उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगा मानो जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला ध्रुवतारा अचानक ओझल हो गया हो। उसी समय मेरे भीतर यह प्रश्न तीव्र हुआ कि जीवन का आधार क्या है, मनुष्य का धर्म क्या है, और अर्थपूर्ण जीवन कैसे जिया जाए।

इन्हीं प्रश्नों की खोज मुझे भगवद्गीता तक ले गई। प्रारम्भ में यह केवल एक महान ग्रन्थ को समझने का प्रयास था, किन्तु धीरे-धीरे यह आत्मबोध, कर्म, कर्तव्य और चेतना की गहन यात्रा बन गया। इसी अध्ययन का परिणाम था कि मैंने 2018 में गीता रहस्य की आधुनिक व्याख्या प्रकाशित की, जिसमें लोकमान्य तिलक के विचारों को समकालीन सन्दर्भों में समझने का प्रयास किया गया।

इसके बाद मेरा अध्ययन और व्यापक हुआ। मैंने The Complete Works of Swami Vivekananda का अध्ययन किया और श्री अरविन्द के महान ग्रन्थों—The Life Divine, Savitri तथा The Secret of the Veda—के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक दर्शन की नई ऊँचाइयों का अनुभव किया। इन ग्रन्थों ने मेरे सामने मनुष्य की ऐसी छवि प्रस्तुत की जो किसी अन्तिम अवस्था का नाम नहीं है, बल्कि चेतना के निरन्तर विकास की एक गतिशील प्रक्रिया है।

मनुष्य कोई अन्तिम उपलब्धि नहीं है; वह एक संक्रमणशील सत्ता है, जो अपने वर्तमान स्वरूप से आगे बढ़ने की क्षमता रखती है।

फिर भी इन अध्ययनों के बाद मेरे भीतर अनेक प्रश्न जीवित रहे, जो मुझे भारतीय दर्शन की सीमाओं से बाहर पाश्चात्य चिन्तन की ओर ले गए। आश्चर्य की बात यह थी कि इस यात्रा ने मुझे मेरी जड़ों से दूर नहीं किया, बल्कि उन्हें और अधिक गहरा कर दिया।

मैंने अनुभव किया कि दर्शन किसी एक सभ्यता, धर्म या परम्परा की निजी सम्पत्ति नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा बौद्धिक विरासत है। यह मानवता का एक सतत संवाद है—एक ऐसा संवाद जो युगों और संस्कृतियों को पार करते हुए मनुष्य के सामने बार-बार वही मूल प्रश्न रखता है:

मैं कौन हूँ? मैं क्या जान सकता हूँ? मुझे कैसे जीना चाहिए? और इस निरन्तर परिवर्तित होते संसार में प्रामाणिक जीवन का अर्थ क्या है?

इस यात्रा का पहला महत्त्वपूर्ण पड़ाव इमैनुएल कान्त थे। मेटाफ़िज़िक्स की पारम्परिक अटकलों को एक ओर रखते हुए, कान्त ने मानव अनुभव को अपनी दार्शनिक खोज का केन्द्र बनाया। उन्होंने यह पूछने के बजाय कि वस्तुएँ अपने-आप में क्या हैं, यह प्रश्न उठाया कि मनुष्य किसी वस्तु का अनुभव कैसे करता है और अनुभव सम्भव कैसे होता है।

देखने में यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है, किन्तु इसके परिणाम अत्यन्त क्रान्तिकारी थे। कान्त ने दर्शन का ध्यान बाहरी वस्तुओं की अन्तिम प्रकृति से हटाकर उस चेतना की ओर मोड़ दिया जो उन वस्तुओं का अनुभव करती है। इस प्रकार उन्होंने दर्शन को कल्पनाशील तर्क-वितर्कों से निकालकर अनुभव, संवेदना और मानव-बोध की वास्तविक संरचना की ओर अग्रसर किया। पश्चिमी दर्शन के इतिहास में यह एक युगान्तरकारी मोड़ था, क्योंकि यहीं से मनुष्य स्वयं अपनी जिज्ञासा का विषय बन गया।

मुझे कान्त के चिन्तन में उपनिषदों की एक दूरस्थ प्रतिध्वनि सुनाई दी। उपनिषदों के ऋषियों ने भी बाह्य जगत की वस्तुओं से अधिक महत्त्व अनुभव और चेतना को दिया था। किन्तु जहाँ उपनिषद अनुभव के पीछे स्थित साक्षी की खोज में आगे बढ़ते हैं, वहाँ कान्त अनुभव की संरचना तक पहुँचकर रुक जाते हैं। उन्होंने यह दिखाया कि हम संसार को कैसे जानते हैं, पर यह प्रश्न खुला छोड़ दिया कि वह कौन है जो जानता है।

इसी बिन्दु पर पाश्चात्य और भारतीय दर्शन मानो एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए भी अलग दिशाओं में आगे बढ़ जाते हैं।

कान्त से आगे बढ़ते हुए मेरी यात्रा हेगेल तक पहुँची। यदि कान्त ने चेतना की संरचना को स्पष्ट किया, तो हेगेल ने इतिहास और विकास की गतिशीलता को समझाने का प्रयास किया। उनके लिए वास्तविकता कोई स्थिर वस्तु नहीं थी, बल्कि निरन्तर प्रकट होने वाली एक जीवन्त प्रक्रिया थी। व्यक्ति, समाज, संस्थाएँ, विचार और सभ्यताएँ—सभी एक व्यापक विकास-क्रम के अंग थे, जो अपने भीतर निहित सम्भावनाओं को क्रमशः प्रकट करते हुए आगे बढ़ते हैं।

एक इंजीनियर होने के नाते हेगेल की यह दृष्टि मुझे अत्यन्त सार्थक लगी। यहाँ विकास किसी सीधी रेखा में आगे बढ़ने वाली यान्त्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विरोधों, तनावों, संघर्षों, समन्वयों और उत्क्रमणों से निर्मित एक जीवन्त प्रवाह था। प्रत्येक अवस्था अपने भीतर अगली अवस्था का बीज लिए रहती है; प्रत्येक संकट किसी नए विस्तार की सम्भावना बन जाता है।

हेगेल ने इतिहास को घटनाओं के निष्प्राण संग्रह से उठाकर चेतना की एक महान यात्रा में रूपान्तरित कर दिया—ऐसी यात्रा जिसमें मानवता स्वयं को धीरे-धीरे पहचानती और अभिव्यक्त करती है।

किन्तु मेरे ऊपर सबसे गहरा प्रभाव फ़्रेडरिक नीत्शे का पड़ा।

नीत्शे ने उस बेचैनी को भाषा दी जिसे मैं वर्षों से अनुभव तो कर रहा था, पर स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पा रहा था। नीत्शे ने देखा कि सभ्यताएँ अक्सर उन विश्वासों, मूल्यों और संस्थाओं को ढोती रहती हैं जिनमें जीवन का स्पन्दन बहुत पहले समाप्त हो चुका होता है। उनका प्रसिद्ध उद्घोष—“ईश्वर मर चुका है”—आध्यात्मिकता का निषेध नहीं था, बल्कि अपनी सभ्यता का एक साहसिक सांस्कृतिक निदान था।

नीत्शे का मूल प्रश्न था: क्या हमारे मूल्य हमारे जीवित अनुभव से उत्पन्न होते हैं, या हम केवल उन्हें विरासत में पाकर दोहराते रहते हैं? उन्होंने अनुरूपता की अपेक्षा साहस को, भीड़ की स्वीकृति की अपेक्षा आत्म-निर्माण को, और मृत सिद्धान्तों की अपेक्षा जीवन की सजीवता को अधिक महत्त्व दिया। उनके लिए किसी भी दर्शन की अन्तिम कसौटी यह थी कि क्या वह जीवन को अधिक गहरा, अधिक व्यापक और अधिक प्रामाणिक बनाता है।

उनकी यह चुनौती मेरे लिए अत्यन्त प्रेरक थी। उन्होंने मुझे परम्परा को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसे जीवित अनुभव की अग्नि में परखना सिखाया। फिर भी मैं नीत्शे के साथ पूरी दूरी तक नहीं जा सका। भारतीय परम्परा ने मुझे एक और सत्य से परिचित कराया था—स्वीकार का सत्य।

जीवन केवल आत्म-अतिक्रमण का रणक्षेत्र नहीं है; वह सहभागिता, कृतज्ञता और एक व्यापक व्यवस्था के प्रति समर्पण का क्षेत्र भी है। निष्काम कर्म और प्रसाद-बुद्धि मेरे लिए उतने ही आवश्यक रहे जितना नीत्शे का आत्म-विजय का आह्वान। एक ने कर्म में साहस दिया, दूसरे ने कर्म के फल के प्रति शान्ति।

शायद इसी कारण मेरी दार्शनिक यात्रा का स्वाभाविक परिपाक मार्टिन हाइडेगर के चिन्तन में हुआ। नीत्शे ने मुझसे पूछा था कि जीवन के पुराने आधार टूट जाने पर मनुष्य क्या करे; हाइडेगर ने उससे भी अधिक मूलभूत प्रश्न उठाया—मनुष्य होना ही क्या है?

उन्होंने विचारों, सिद्धान्तों और मतों से पीछे हटकर स्वयं अस्तित्व के अनुभव को केन्द्र में रखा। उनके साथ पहुँचकर मुझे लगा कि दर्शन का वृत्त किसी अर्थ में पूर्ण हो रहा है; प्रश्न अब केवल ज्ञान, इतिहास या मूल्यों का नहीं रह गया था, बल्कि स्वयं होने के अनुभव का था।

हाइडेगर की डाज़ाइन (Dasein) की अवधारणा अन्ततः हमें पुनः जीवित अनुभव की भूमि पर लौटा लाती है। वे यह नहीं पूछते कि ब्रह्माण्ड किस पदार्थ से बना है, न ही वे किसी अन्तिम तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्त की खोज में निकलते हैं। उनका प्रश्न कहीं अधिक निकट, अधिक मानवीय और अधिक अस्तित्वगत है—मनुष्य होने का अर्थ क्या है? एक ऐसे मनुष्य का, जो अपनी इच्छा के बिना इस संसार में आ गया है, जो दूसरों के बीच जीता है, और जो जन्म से ही मृत्यु की ओर अग्रसर है।

इस प्रश्न में एक अद्भुत ईमानदारी और विनम्रता है।

हम अपने जन्म का चुनाव नहीं करते। हम अपने माता-पिता, अपनी भाषा, अपने युग, अपनी संस्कृति या अपनी परिस्थितियों का चयन नहीं करते। हम स्वयं को पहले से उपस्थित एक संसार में पाते हैं। हम यहाँ आ चुके होते हैं, और तभी हमें यह समझना आरम्भ करना पड़ता है कि हम कौन हैं। तब सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है—अब हमें कैसे जीना चाहिए?

हाइडेगर का उत्तर था—प्रामाणिकता (Authenticity)। अर्थात् ऐसा जीवन जो उधार लिए हुए विचारों, सामाजिक अपेक्षाओं और भीड़ की चेतना में खो न जाए, बल्कि अपने अस्तित्व की वास्तविकता का सामना करने का साहस रखे।

उपनिषद शायद इसे आत्मबोध कहें, और गीता इसे स्वभाव तथा स्वधर्म की खोज के रूप में व्यक्त करे। शब्द भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी मूल चिन्ता एक ही है—क्या मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व के प्रति जागरूक है, या वह केवल दूसरों द्वारा निर्मित भूमिकाएँ निभाते हुए जीवन व्यतीत कर रहा है?

यहीं आकर मुझे पूर्व और पश्चिम के बीच एक गहरा संवाद दिखाई देने लगा। हाइडेगर की प्रामाणिकता, उपनिषदों का आत्मबोध और गीता का स्वधर्म—तीनों अन्ततः मनुष्य को उसी चुनौती के सामने खड़ा करते हैं: स्वयं को पहचानो, अपने होने की सच्चाई का सामना करो, और उसी के अनुरूप जीवन जियो।

हाइडेगर के बाद विकसित हुए उत्तर-आधुनिकतावाद (Postmodernism) ने सत्य, अर्थ और आधार की लगभग हर सम्भावना पर सन्देह करना आरम्भ कर दिया। भाषा, सत्ता-संरचनाओं और विमर्शों के भीतर सब कुछ विघटित कर देने की यह प्रवृत्ति मुझे अन्ततः असन्तोषजनक लगती है।

आलोचना आवश्यक है, पर केवल आलोचना जीवन का आधार नहीं बन सकती। कोई भी सभ्यता केवल विघटन के सहारे लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकती।

अन्ततः मनुष्य को फिर उसी प्रश्न पर लौटना पड़ता है—कैसे जिया जाए?

आज मेरा उत्तर पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल है। मैं अब अन्तिम और पूर्ण दार्शनिक प्रणालियों की खोज नहीं करता। न मैं दर्शन से पूर्ण निश्चितता की अपेक्षा करता हूँ और न धर्म से सभी प्रश्नों के अन्तिम उत्तर की।

जीवन अपनी लय में प्रकट होता है। घटनाएँ बिना निमन्त्रण के आती हैं। सफलता और असफलता एक-दूसरे का स्थान लेती रहती हैं। सम्बन्ध बनते हैं, बदलते हैं, समाप्त होते हैं। स्वास्थ्य और परिस्थितियाँ निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं। चुनौती इन्हें नियन्त्रित करने की नहीं, बल्कि इनके साथ सजग सहभागिता की है।

वर्षों के अनुभव के बाद मैंने पाया है कि पढ़ना और लिखना मेरे जीवन का स्वाभाविक केन्द्र है। पढ़ना मुझे सदियों और सभ्यताओं के महान मस्तिष्कों से संवाद करने का अवसर देता है। लिखना मुझे अपने विचारों को स्पष्ट करने और उस संवाद में अपना विनम्र योगदान देने की क्षमता प्रदान करता है।

जो कभी एक रुचि थी, वह धीरे-धीरे मेरा स्वभाव बन गई। और जो लम्बे समय तक स्वभाव के रूप में प्रकट होता रहता है, वही अन्ततः स्वधर्म का रूप ले लेता है।

जीवन के इस चरण में मेरे लिए यही पर्याप्त है—सजगता से जीना। जीवन को उसकी स्वाभाविक धारा में स्वीकार करना। पढ़ना। लिखना। सीखना। बाँटना। और जब तक समय अनुमति दे, प्रश्न पूछते रहना।

शायद दर्शन का सर्वोच्च उद्देश्य अन्तिम उत्तर प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा के दौरान हमारी सजगता को बनाए रखना है।

यही मेरा दार्शनिक दिशा-बोध है।

—अरुण तिवारी