स्वयं होने का वास्तविक अर्थ क्या है? यह प्रश्न सरल प्रतीत होता है, परंतु इसका उत्तर उतना सरल नहीं। हमारा व्यक्तित्व न तो पहले से निर्मित कोई वस्तु है, जिसे केवल खोज लेना हो, और न ही वह कोई कोरा कागज़ है, जिस पर कुछ भी लिखा जा सके। हमें एक विशेष स्वभाव, शारीरिक संरचना, पारिवारिक इतिहास, संस्कृति और क्षमताएँ विरासत में मिलती हैं। साथ ही, हमें भय, पूर्वाग्रह, आदतें और अनसुलझे आन्तरिक द्वन्द्व भी मिलते हैं। इस विरासत के कुछ पक्षों को स्वीकारना होता है, कुछ को शिक्षित करना और कुछ का अतिक्रमण करना होता है। अपने अस्तित्व के इन विभिन्न आयामों को चेतन, उत्तरदायी और सृजनशील सामंजस्य में लाने की जीवनपर्यन्त प्रक्रिया को हम Integral Becoming—समग्र साधना कह सकते हैं।
समग्र साधना को तीन महान विचार-परम्पराओं के संश्लेषण के रूप में समझा जा सकता है: भगवद्गीता के स्वभाव और स्वधर्म, फ्रेडरिक नीत्शे के आत्म-अतिक्रमण, तथा कार्ल युंग की व्यक्तित्व-समग्रता, अर्थात् इंडिविजुएशन। ये तीनों मिलकर मानवीय विकास के तीन अनिवार्य आयाम प्रस्तुत करते हैं—दर्शन, कर्म और मनोविज्ञान।
भगवद्गीता का आरम्भ समुचित कर्म की समस्या से होता है। अर्जुन में क्षमता है, प्रशिक्षण है और उत्तरदायित्व भी है; फिर भी जब कर्म के परिणाम अत्यन्त जटिल और दुःखद दिखाई देते हैं, तब वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। कृष्ण उसे केवल आज्ञा नहीं देते। वे उसे उसके स्वभाव, कर्तव्य और उस आन्तरिक स्वतंत्रता को समझने की ओर ले जाते हैं, जिसके साथ कर्म किया जाना चाहिए।
स्वभाव व्यक्ति की अन्तर्निहित प्रवृत्ति है—उसकी क्षमताओं, रुचियों, मानसिक संरचना और जीवन-ऊर्जा का वह विशिष्ट संयोजन, जिसके माध्यम से वह संसार से सम्बन्ध स्थापित करता है। स्वभाव केवल पसंद या सुविधा का नाम नहीं है। जो हमें अच्छा लगता है, वह आदत, आकर्षण अथवा किसी कठिनाई से बचने की इच्छा से भी उत्पन्न हो सकता है। हमारा वास्तविक स्वभाव इस बात में प्रकट होता है कि हम किस प्रकार के काम को लम्बे समय तक कर सकते हैं, कौन-सा उत्तरदायित्व सहजता से स्वीकारते हैं, किस कठिनाई को सहने के लिए तैयार रहते हैं और किस प्रकार के योगदान में हमें आन्तरिक संगति का अनुभव होता है।
किन्तु स्वभाव अपने-आप में पर्याप्त नहीं है। क्षमता तभी सार्थक बनती है, जब वह स्वधर्म का रूप ग्रहण करती है। स्वधर्म हमारी प्रकृति, परिस्थितियों, सम्बन्धों और जीवन-अवस्था के अनुरूप उत्तरदायित्व है। वह केवल यह नहीं पूछता, “मैं क्या अच्छा कर सकता हूँ?” वह यह पूछता है, “इस परिस्थिति में वह कौन-सा कार्य है, जो वास्तव में मुझे करना चाहिए?” स्वभाव से स्वधर्म की यात्रा प्रतिभा को सेवा में बदल देती है। ज्ञान शिक्षण बनता है, साहस संरक्षण बनता है, कल्पना सृजन बनती है और करुणा देखभाल का रूप लेती है।
इस प्रकार गीता समग्र साधना को दार्शनिक और नैतिक आधार प्रदान करती है: अपने स्वभाव को जानो, अपने उत्तरदायित्व को पहचानो, पूरी निष्ठा से कर्म करो और उसके परिणाम पर स्वामित्व का आग्रह छोड़ दो। हम अपने कर्म की गुणवत्ता और सत्यनिष्ठा के लिए उत्तरदायी हैं, लेकिन परिणाम उत्पन्न करने वाली समूची परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकते।
फिर भी, अपने वर्तमान स्वभाव के प्रति निष्ठा कभी-कभी अपरिवर्तित बने रहने का बहाना बन सकती है। कोई व्यक्ति अपने क्रोध, संकोच, ईर्ष्या अथवा दूसरों की स्वीकृति पर निर्भरता के विषय में कह सकता है, “मैं तो ऐसा ही हूँ।” नीत्शे का आत्म-अतिक्रमण इस सम्भावित जड़ता को चुनौती देता है। नीत्शे के लिए मनुष्य कोई पूर्ण और अन्तिम रूप से निर्मित प्राणी नहीं, बल्कि अपने से बड़ी सम्भावना की ओर जाने वाला सेतु है। प्रत्येक अर्जित पहचान किसी समय हमारी सीमा बन सकती है। विकास के लिए उस रूप का अतिक्रमण करना आवश्यक है, जिसे हम अब तक अपना अन्तिम स्वरूप मानते रहे हैं।
आत्म-अतिक्रमण का अर्थ स्वयं को अस्वीकार करना अथवा नष्ट करना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर सक्रिय शक्तियों का रूपान्तरण करना है। भय को तैयारी में, दुःख को समझ में, महत्त्वाकांक्षा को अनुशासित सृजन में और क्रोध को नैतिक साहस में परिवर्तित किया जा सकता है। हमारा विरोधी स्वयं हमारा अस्तित्व नहीं, बल्कि वर्तमान व्यक्तित्व के वे पक्ष हैं, जो जड़, प्रतिक्रियात्मक अथवा दूसरों से उधार लिये गए मूल्यों द्वारा संचालित हैं।
नीत्शे समग्र साधना में गतिशीलता का सिद्धान्त जोड़ते हैं। स्वभाव यह बताता है कि हम कहाँ से आरम्भ करते हैं; उसे यह निर्धारित नहीं करना चाहिए कि हम कहाँ तक पहुँच सकते हैं। स्वयं के प्रति सच्चे होने का अर्थ अपनी प्रत्येक मौजूदा विशेषता को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों का अतिक्रमण करना है, जो हमारी गहरी सम्भावनाओं के विकास को रोकती हैं। यहाँ मूल प्रश्न है: “अपने भीतर मुझे किसका रूपान्तरण करना होगा, ताकि मेरी कोई श्रेष्ठतर सम्भावना प्रकट हो सके?”
किन्तु आत्म-अतिक्रमण में भी एक खतरा है। वह कठोर आत्म-अनुशासन, अनियन्त्रित महत्त्वाकांक्षा या अपनी संवेदनशीलता के विरुद्ध हिंसा का रूप ले सकता है। व्यक्ति अपने किसी आदर्शीकृत श्रेष्ठ रूप के पीछे भागते हुए उन सभी पक्षों को अस्वीकार कर सकता है, जो उसकी इच्छित छवि से मेल नहीं खाते। युंग का इंडिविजुएशन, अर्थात् व्यक्तित्व का समग्र विकास, इस असंतुलन को ठीक करता है।
युंग चेतन अहं और अधिक व्यापक स्व के बीच भेद करते हैं। अहं वह चेतन पहचान है, जिसके माध्यम से हम “मैं” कहते हैं—हमारा नाम, सामाजिक स्थान, मान्यताएँ, उपलब्धियाँ और अपने बारे में बनाई गई छवि। किन्तु हमारा मन इससे कहीं अधिक व्यापक है। उसमें भूले हुए अनुभव, अस्वीकार की गई इच्छाएँ, अविकसित क्षमताएँ और हमारी छाया भी सम्मिलित है—वे गुण और प्रवृत्तियाँ, जिन्हें हम अपना मानने से इनकार करते हैं।
जो व्यक्ति स्वयं को केवल दयालु समझता है, वह अपने क्रोध और उचित सीमा निर्धारित करने की क्षमता को दबा सकता है। अपनी तार्किकता पर गर्व करने वाला व्यक्ति कल्पना, भावना और संवेदनशीलता की उपेक्षा कर सकता है। शक्ति के लिए प्रसिद्ध व्यक्ति अपनी निर्भरता, दुःख या कोमलता स्वीकार करने में असमर्थ हो सकता है। जिसे हम चेतना से बाहर कर देते हैं, वह समाप्त नहीं होता। वह चिंता, बाध्यकारी व्यवहार, दूसरों पर आरोपण और असंगत प्रतिक्रियाओं के रूप में लौटता है।
इंडिविजुएशन व्यक्तित्व के इन उपेक्षित आयामों को स्वीकारकर अधिक व्यापक समग्रता में लाने की क्रमिक प्रक्रिया है। समाकलन का अर्थ प्रत्येक आवेग के अनुसार चलना अथवा हर छिपी हुई प्रवृत्ति को उचित मान लेना नहीं है। इसका अर्थ है अचेतन सामग्री को चेतना में लाना, ताकि उसे समझा, अनुशासित और उचित स्थान दिया जा सके। इस प्रकार युंग समग्र साधना को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करते हैं। हम केवल अपना कर्तव्य निभाकर या अपनी कमजोरियों पर विजय पाकर सम्पूर्ण नहीं बन सकते; हमें अपने उन पक्षों को भी पुनः स्वीकारना होगा, जिन्हें हमारी सार्वजनिक छवि ने बाहर कर दिया है।
ये तीनों विचार-परम्पराएँ एक-दूसरे को पूर्ण भी करती हैं और सन्तुलित भी। गीता पूछती है: मेरा स्वभाव क्या है और मुझे क्या करना चाहिए? नीत्शे पूछते हैं: विकसित होने के लिए मुझे अपने भीतर किसका अतिक्रमण करना होगा? युंग पूछते हैं: समग्र बनने के लिए मुझे अपने किस उपेक्षित पक्ष को पहचानकर समाहित करना होगा?
अलग-अलग किये जाने पर ये मार्ग विकृत हो सकते हैं। आत्म-अतिक्रमण के बिना स्वभाव आत्मसन्तोष बन सकता है। मनोवैज्ञानिक जागरूकता के बिना स्वधर्म यांत्रिक कर्तव्य बन सकता है। करुणा के बिना आत्म-अतिक्रमण आत्म-दण्ड बन सकता है। उत्तरदायित्व के बिना इंडिविजुएशन निजी आत्ममुग्धता में बदल सकता है। समग्र साधना चारों गतियों को एक साथ रखती है—स्वभाव की पहचान, स्वधर्म का आचरण, सीमाओं का अतिक्रमण और विभाजित व्यक्तित्व का समाकलन।
समग्र साधना कोई अन्तिम उपलब्धि नहीं, जिस पर पहुँचकर यात्रा समाप्त हो जाए। जीवन के साथ उसका सन्तुलन बदलता रहता है। युवावस्था में प्रमुख कार्य अपनी क्षमताओं को खोजना हो सकता है। प्रौढ़ावस्था में उन्हें उत्तरदायी कर्म में बदलना आवश्यक हो सकता है। जीवन के उत्तरार्ध में प्रतिष्ठा का मोह छोड़ना, व्यक्तित्व के उपेक्षित आयामों को स्वीकारना और अपने अनुभव का सार अगली पीढ़ी को देना अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। प्रत्येक अवस्था जीवन से एक नए सामंजस्य की माँग करती है।
इस दर्शन को दैनिक अभ्यास में बदलने के लिए पाँच मिनट की एक सरल साधना की जा सकती है। दिन के आरम्भ या अन्त में शान्त बैठकर पाँच प्रश्नों को एक-एक मिनट दें:
पहला मिनट—स्वभाव: आज किस क्षण मैंने स्वयं को सर्वाधिक सहज, सजग, सक्षम और जीवन्त अनुभव किया?
दूसरा मिनट—स्वधर्म: आज का वह कौन-सा उत्तरदायित्व है, जो वास्तव में मेरा है—चाहे वह छोटा हो या कठिन?
तीसरा मिनट—आत्म-अतिक्रमण: कौन-सा भय, आदत या आसक्ति मुझे अगला सत्यपूर्ण कदम उठाने से रोक रही है?
चौथा मिनट—समाकलन: मैं अपनी किस भावना, आवश्यकता अथवा विशेषता को अस्वीकार कर रहा हूँ या दूसरों पर आरोपित कर रहा हूँ?
पाँचवाँ मिनट—संकल्प: अगले चौबीस घंटों में कौन-सा एक ठोस कार्य इन चारों अन्तर्दृष्टियों को मेरे आचरण में उतारेगा?
यह कार्य छोटा और स्पष्ट होना चाहिए—टाला हुआ फोन करना, एक पृष्ठ लिखना, क्रोध को स्वीकारते हुए कठोर व्यवहार से बचना, अनुपयुक्त दायित्व को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करना, क्षमा माँगना, उपेक्षित कार्य आरम्भ करना अथवा जहाँ अपनी क्षमता की वास्तविक आवश्यकता हो, वहाँ सहायता देना।
इस अभ्यास का उद्देश्य निरन्तर आत्म-निरीक्षण में उलझे रहना नहीं, बल्कि अन्तर्दृष्टि और आचरण के बीच की दूरी कम करना है। धीरे-धीरे इसके परिणाम दिखाई देते हैं—अनुकरण कम होता है, आन्तरिक विभाजन घटता है, साहस बढ़ता है, उत्तरदायित्व स्पष्ट होता है और हमारा योगदान अधिक सार्थक बनता है।
समग्र साधना को एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
अपने स्वभाव को जानो, अपने स्वधर्म का पालन करो, जो तुम्हें सीमित करता है उसका अतिक्रमण करो, और जिसे तुमने अपने से अलग कर दिया है उसे पुनः समाहित करो।
यही समग्र साधना है—किसी पृथक अहं को पूर्ण बनाने का प्रयास नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट जीवन को बोध, कर्म, रूपान्तरण और समग्रता में विकसित करने की जीवनपर्यन्त प्रक्रिया।
यह साधना हमें कहाँ ले जाती है? इससे मुझे क्या प्राप्त होगा? इस प्रकार के आत्म-परीक्षण, मनन अथवा चिन्तन से ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या मैं पहले से अधिक शान्त हो जाऊँगा?
मानसिक शान्ति समग्र साधना के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार नहीं है। इसका गहरा प्रतिफल विक्षोभों से मुक्ति नहीं, बल्कि आन्तरिक संगति है।
तब स्वभाव, स्वधर्म, आकांक्षाएँ और अचेतन मन व्यक्ति को सर्वथा भिन्न दिशाओं में खींचना बन्द कर देते हैं। दुःख, चिन्ता, निराशा और संशय तब भी जीवन में आते हैं, किन्तु वे व्यक्तित्व को उसकी नींव से विभाजित नहीं कर पाते।
जब हम उस सत्य का विरोध करना छोड़ देते हैं जिसे हमें जानना चाहिए, उस कर्तव्य से बचना बन्द कर देते हैं जिसे हमें निभाना चाहिए, और वह दिखने का प्रयत्न नहीं करते जो हम वास्तव में हैं ही नहीं—तब हमारे भीतर धीरे-धीरे एक शान्त शक्ति प्रकट होती है।
इस साधना का परिपक्व फल विक्षोभ-रहित जीवन नहीं, बल्कि अविभाजित व्यक्तित्व है। तुमने उस सम्भावना को पूर्णतः साकार कर लिया, जिसे लेकर तुम जन्मे थे।
—अरुण तिवारी
