दुःख और असंतोष से मुक्ति पाने के उपायों पर विशाल साहित्य उपलब्ध है। संसार के लगभग हर संप्रदाय, मत और विचारधारा अपने अनुयायियों को सुख का मार्ग दिखाने का दावा करती है। फिर भी पीड़ा, संघर्ष और असंतोष समाप्त नहीं होते। किसी भी मॉल, पार्क या टेलीविज़न के सामने बैठे व्यक्ति से पूछिए—अधिकांश लोग किसी न किसी रूप में सुख की तलाश में मिलेंगे। सत्ता, धन और प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे लोग भी अक्सर असंतुष्ट दिखाई देते हैं; तब उन लोगों की स्थिति क्या होगी जो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं?
‘खुश रहो’ उत्तर भारत का एक पारंपरिक आशीर्वाद है, जहाँ मेरा जन्म और पालन-पोषण हुआ। यह व्यापक विश्वास है कि प्रसन्नता और कल्याण जीवन की सबसे मूल्यवान उपलब्धियों में से हैं। सुखी लोग सामान्यतः बेहतर संबंधों का आनंद लेते हैं, शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ रहते हैं और जीवन को अधिक सार्थक तथा संतोषप्रद अनुभव करते हैं।
फिर भी सुख हाथ नहीं आता।
सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology) ने सुख के अर्थ और उसकी प्राप्ति के अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इसके बावजूद हम उन्हें स्थायी रूप से प्राप्त नहीं कर सके हैं। हम जितना अधिक उसका पीछा करते हैं, वह उतना ही दूर जाता दिखाई देता है। अपने पसंदीदा काम को करना, प्रियजनों के साथ रहना और भविष्य की चिंताओं से मुक्त होना प्रायः सुख की लक्षण माने जाते हैं। फिर भी जब मैं अपने पौत्र अगस्त्य और अन्य बच्चों को कंप्यूटर खेलों में पूरी तरह डूबा हुआ देखता हूँ, तो मुझे आश्चर्य होता है कि कहीं मानवता ने सुख का ऐसा सूत्र तो नहीं खोज लिया है जिसे पिछली पीढ़ियाँ समझ नहीं सकीं।
जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर (1889–1976) इस प्रश्न को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते। हाइडेगर का ध्यान प्रौद्योगिकी की उपयोगिता पर नहीं, बल्कि इस बात पर था कि प्रौद्योगिकी मनुष्य के अस्तित्व-बोध को किस प्रकार बदल देती है। अपने प्रसिद्ध निबंध The Question Concerning Technology में हाइडेगर ने कहा है कि प्रौद्योगिकी केवल उपकरणों का संग्रह नहीं है। वह संसार को देखने और समझने का एक तरीका है। वह यह निर्धारित करती है कि हम क्या देखते हैं, क्या मूल्यवान मानते हैं और अंततः स्वयं को कैसे समझते हैं।
आज के समय में यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है।
हम दो संसारों में जीते हैं—एक बाहरी संसार, जो हमारे अनुभवों और अवलोकनों का है; दूसरा आंतरिक संसार, जो हमारे विचारों और भावनाओं का है। धन, भौतिक संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रशंसा वे सुख हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक ‘बाह्य पुरस्कार’ (extrinsic rewards) कहते हैं। हम उन्हें अपने बाहर खोजते हैं। किंतु उनका आनंद क्षणिक होता है। कुछ समय बाद वे सामान्य लगने लगते हैं और हम किसी नई उपलब्धि की तलाश में निकल पड़ते हैं। मनोविज्ञान इस प्रक्रिया को ‘हेडोनिक अनुकूलन’ (hedonic adaptation) कहता है।
इसके विपरीत, जब हम किसी कार्य में केवल उसके आनंद के लिए लगते हैं, तब कुछ भिन्न घटित होता है। न प्रशंसा हमारा लक्ष्य होती है, न आर्थिक लाभ। कार्य स्वयं ही पुरस्कार बन जाता है। जीवन की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अर्थपूर्ण परिश्रम हमें गहरे और स्थायी संतोष की अनुभूति करा सकता है।
इस सत्य का संकेत बहुत पहले भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने दिया था—
“आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।” (2.55)
अर्थात् जो व्यक्ति अपने ही आत्मस्वरूप में संतुष्ट रहता है, वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
अपने सुख का अंतिम स्रोत स्वयं को जानिए।
अमेरिकी न्यूरोवैज्ञानिक रॉबर्ट सैपोल्स्की (जन्म 1957), ने अपनी उत्कृष्ट पुस्तक Behave में इस विचार का जैविक आधार प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार सुख केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि मस्तिष्क और शरीर में घटित होने वाली विशिष्ट जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं का अनुभव है। आनंद, प्रेम, संतोष, उल्लास और प्रसन्नता—इन सबके पीछे न्यूरोकेमिकल तंत्र कार्य करते हैं।
क्या इसका अर्थ यह है कि हम इन अवस्थाओं को सचेत रूप से उत्पन्न कर सकते हैं?
सैपोल्स्की के अनुसार जब हम स्वयं को चुनौती देते हैं, तब शरीर एड्रेनालिन उत्पन्न करता है। जब हम किसी कठिन कार्य में सफल होते हैं, तब डोपामिन का स्राव होता है। जब हम दूसरों के साथ तालमेल में कार्य करते हैं, तब ऑक्सीटोसिन सक्रिय होता है। प्रेरक कथाएँ, संगीत और गहन मानवीय अनुभव हमारे भीतर अनेक जैविक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं। दूसरे शब्दों में, सुख की एक जैविक संरचना भी है।
समस्या यह है कि इन तंत्रों को सक्रिय करने के लिए हम प्रायः ऐसे रास्ते चुन लेते हैं जो अंततः विनाशकारी सिद्ध होते हैं। नशे, अत्यधिक उपभोग, अनियंत्रित खरीदारी, अस्वास्थ्यकर भोजन और अनेक प्रकार की लतें क्षणिक आनंद तो देती हैं, पर धीरे-धीरे उनकी प्रभावशीलता कम होती जाती है। उपभोक्तावादी संस्कृति हमें यह विश्वास दिलाती है कि अधिक उपभोग से अधिक सुख मिलेगा, जबकि वास्तविकता अक्सर इसके विपरीत होती है। परिणामस्वरूप मानवता एक वैश्विक ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ पर दौड़ती प्रतीत होती है।
यहीं हाइडेगर की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने कहा था कि आधुनिक प्रौद्योगिकी संसार की हर वस्तु को ‘उपलब्ध संसाधन’ (standing reserve) में बदल देती है—ऐसी चीज़, जिसे उपयोग, नियंत्रण और अधिकतम लाभ के लिए व्यवस्थित किया जा सके। प्रकृति संसाधन बन जाती है। मनुष्य स्वयं संसाधन बन जाता है। अंततः सुख भी एक ऐसी वस्तु बन सकता है जिसे तकनीकी रूप से उत्पन्न और नियंत्रित करने का प्रयास किया जाए।
डिजिटल तकनीकों और कंप्यूटर खेलों के संदर्भ में यही मूल प्रश्न है। क्या वे केवल उपभोग के नए साधन हैं, या वे मानव विकास के नए अवसर भी प्रदान कर सकते हैं?
युवा खेल-डिज़ाइनर जेन मैकगोनिगल ने (जन्म 1977) अपनी चर्चित पुस्तक Reality is Broken में तर्क दिया है कि अच्छे खेल मनुष्य को चार प्रकार के आंतरिक पुरस्कार प्रदान करते हैं—संतोषदायक कार्य, उपलब्धि का अनुभव, सामाजिक जुड़ाव और जीवन में अर्थ का बोध। यही चार तत्व गहरे मानवीय संतोष की आधारशिला हैं।
इस दृष्टि से देखें तो खेलों का आकर्षण सहज समझ में आता है। अच्छे खेल चुनौती देते हैं, तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं, कौशल विकसित करते हैं, सहयोग को बढ़ावा देते हैं और स्पष्ट उद्देश्य प्रदान करते हैं। वे हमारे मनोवैज्ञानिक और जैविक तंत्रों को उसी प्रकार सक्रिय करते हैं, जैसा कि सार्थक जीवन-अनुभव करते हैं।
वास्तव में, खेलना ‘ऑटोटेलिक’ (autotelic) गतिविधि का उत्कृष्ट उदाहरण है—ऐसी गतिविधि जो केवल अपने आनंद के लिए की जाती है। इस अर्थ में यह निष्काम कर्म के बहुत निकट है। खेल लाभ कमाने के लिए नहीं खेला जाता; वह खेलने के आनंद के लिए खेला जाता है। जीवन में और कहाँ ऐसा दृश्य देखने को मिलता है कि विजेता और पराजित खेल समाप्त होने के बाद हाथ मिलाएँ, साथ बैठकर भोजन करें और जीत-हार को पीछे छोड़ दें?
फिर भी हाइडेगर एक अंतिम प्रश्न अवश्य पूछते।
क्या खेल हमें संसार के साथ अधिक प्रामाणिक रूप से जोड़ते हैं, या वे हमें वास्तविकता से दूर ले जाते हैं? उनके अनुसार प्रौद्योगिकी तब खतरनाक हो जाती है जब वह वास्तविकता को उद्घाटित करने के बजाय उसे ढँकने लगती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि प्रौद्योगिकी सुख प्रदान कर सकती है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या वह हमें जीवन के प्रति अधिक सजग और सहभागी बनाती है, या केवल ध्यान भटकाने का माध्यम बन जाती है।
श्रेष्ठ खेल शायद इसलिए मूल्यवान हैं कि वे हमें एक मूलभूत सत्य की याद दिलाते हैं—मनुष्य सबसे अधिक सुखी तब होता है जब वह अर्थपूर्ण चुनौतियों का सामना करता है। खेल तब जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के लिए प्रशिक्षण बन जाता है।
इसी कारण अब मैं बच्चों को डिजिटल संसार में डूबा देखकर उन्हें तुरंत नहीं डाँटता। संभव है कि वे खेल के माध्यम से प्रेरणा, उपलब्धि, सहयोग और अर्थ के उन रहस्यों को सीख रहे हों जिन्हें औपचारिक शिक्षा अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है। माता-पिता और दादा-दादी का दायित्व खेलों का अंध-विरोध करना नहीं, बल्कि उन खेलों को पहचानना है जो मानवीय क्षमताओं का विकास करते हैं और उन खेलों से बचना है जो केवल हमारी कमजोरियों का शोषण करते हैं।
प्रौद्योगिकी स्वयं सुख का निर्माण नहीं कर सकती, जैसे कोई वाद्ययंत्र स्वयं संगीत नहीं रच सकता। किंतु वह ऐसी परिस्थितियाँ अवश्य बना सकती है जिनमें सुख का अनुभव अधिक संभव हो। सुख का वास्तविक स्रोत वही है जो सदैव रहा है—सार्थक कर्म, अर्थपूर्ण संबंध, आत्म-अतिक्रमण और जीवन में जागरूक सहभागिता।
यदि बुद्धिमानी से उपयोग किया जाए तो प्रौद्योगिकी इस यात्रा में सहायक बन सकती है। यदि विवेक खो दिया जाए, तो वही प्रौद्योगिकी हमें हमारे लक्ष्य से भटका भी सकती है।
अतः समाधान प्रौद्योगिकी का विरोध नहीं, बल्कि उसके साथ सजग संबंध स्थापित करना है। हाइडेगर की भाषा में कहें तो हमारा सर्वोच्च दायित्व केवल तकनीक का उपयोग करना नहीं, बल्कि तकनीक के युग में भी पूर्णतः मनुष्य बने रहना है। उपनिषद हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उपकरणों का निर्माता नहीं, बल्कि साक्षी-चेतना है। तकनीक हमारी क्षमता को बढ़ा सकती है, पर हमारी चेतना का स्थान नहीं ले सकती। अंततः सुख किसी मशीन, एल्गोरिद्म या खेल में नहीं, बल्कि उस जागरूक उपस्थिति में है जिसके द्वारा हम उनका अनुभव करते हैं।
—अरुण तिवारी




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