शेक्सपियर और अस्तित्व का रंगमंच

by Arun Tiwari | Jul 21, 2026

पिछले कुछ वर्षों में मेरी बौद्धिक यात्रा बार-बार उस महान जर्मन दार्शनिक परंपरा की ओर लौटती रही है जिसे मैं अपने मन में कांत, हेगेल, नीत्शे और हाइडेगर की विचार-धारा के रूप में देखता हूँ। इन चारों ने अपने-अपने ढंग से यह समझने का प्रयास किया कि मनुष्य होने का क्या अर्थ है। कांत ने अनुभव और नैतिकता की संरचना को समझने की चेष्टा की। हेगेल ने इतिहास को आत्मचेतना के एक महान नाटक के रूप में देखा। नीत्शे ने मनुष्य की इच्छाशक्ति, रचनात्मकता और आत्म-अतिक्रमण की गहराइयों में प्रवेश किया। और हाइडेगर ने सबसे मूल प्रश्न पूछा—‘होना’ अर्थात् अस्तित्व का अर्थ क्या है? आम बोलचाल की भाषा में कहें तो प्रश्न यही है—आख़िर हमारी औकात क्या है?

किन्तु इन्हीं विचारकों के साथ-साथ मेरा ध्यान एक ऐसे व्यक्ति की ओर भी बार-बार आकर्षित होता रहा जिसने कोई दार्शनिक ग्रंथ नहीं लिखा, किसी विश्वविद्यालय में अध्यापन नहीं किया, और स्वयं को कभी दार्शनिक नहीं कहा। वह व्यक्ति था—विलियम शेक्सपियर।

मैं लंबे समय से शेक्सपियर से प्रभावित रहा हूँ। अंग्रेज़ी भाषा के अनेक शब्द और मुहावरे, जिन्होंने युवावस्था में मुझे मोहित किया था, इसी एक व्यक्ति की देन हैं। अक्सर मैं सोचता था कि 1564 से 1616 के बीच इंग्लैंड में जीवित रहे एक व्यक्ति ने ऐसा क्या किया कि चार सौ वर्षों बाद भी पूरी दुनिया उसकी भाषा बोलती है और उसके पात्रों में स्वयं को पहचानती है।

फिर मेरे हाथों में ब्रिटिश लेखक पीटर एक्रॉयड (जन्म 1949) द्वारा लिखी गई शेक्सपियर की जीवनी आई। वह इतनी सुंदर और सम्मोहक पुस्तक थी कि लगभग एक महीने तक मैं उसके प्रभाव में डूबा रहा। यह लेख उसी अनुभव को साझा करने का एक प्रयास है।

मुझे शेक्सपियर के बारे में सबसे अधिक विस्मित करने वाली बात केवल उनकी रचनात्मकता का विशाल विस्तार नहीं है—अड़तीस नाटक, एक सौ चौवन sonnets ((चौदह-पंक्तीय कविताएँ) और दो दीर्घ आख्यानात्मक कविताएँ—बल्कि मानवीय अनुभव की वह व्यापकता है जिसे उन्होंने शब्दों में समेट लिया।

एक्रॉयड हमें किसी दिव्य प्रतिभा का नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य का परिचय देते हैं। एक दस्ताने बनाने वाले कारीगर के घर जन्मा बालक; कम आयु में विवाह; तीन संतानों का पिता; ग्यारह वर्ष की आयु में अपने इकलौते पुत्र को खो देने वाला व्यक्ति; प्लेग, राजनीतिक संघर्ष और धार्मिक तनावों से भरे युग का नागरिक। फिर भी इसी जीवन से एक ऐसी आवाज़ जन्म लेती है जो प्रेम और ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा और संदेह, क्रोध और करुणा, शोक और मुक्ति—सभी को अभिव्यक्त कर सकती है।

एक अर्थ में शेक्सपियर मेरी दार्शनिक यात्रा के बीचोंबीच खड़े दिखाई देते हैं। एक अर्थ में शेक्सपियर मेरी दार्शनिक यात्रा के बीचोंबीच खड़े दिखाई देते हैं। इसका एक निजी कारण भी है। मेरा जन्म और पालन-पोषण उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर में हुआ। मेरी प्रारम्भिक शिक्षा हिन्दी माध्यम में हुई, जहाँ अंग्रेज़ी एक विषय तो थी, पर जीवन का स्वाभाविक हिस्सा नहीं। उच्च शिक्षा और व्यावसायिक जीवन में प्रवेश करते समय भाषा मेरे सामने एक अदृश्य दीवार की तरह खड़ी थी। अंग्रेज़ी सीखना मेरे लिए केवल एक भाषा सीखना नहीं था; वह एक नए बौद्धिक संसार में प्रवेश का संघर्ष था। इसी संघर्ष के दौरान जब मैंने जाना कि अंग्रेज़ी के अनेक प्रिय शब्दों, मुहावरों और अभिव्यक्तियों के पीछे शेक्सपियर की सृजनशीलता कार्यरत है, तब उनके प्रति मेरा आकर्षण और गहरा हो गया। मुझे लगता था कि मैं केवल एक लेखक को नहीं पढ़ रहा, बल्कि उस भाषा की आत्मा से परिचित हो रहा हूँ जिसने मेरे लिए दुनिया के अनेक ज्ञान-द्वार खोले।

कांत ने कहा था कि मनुष्य केवल वास्तविकता को ग्रहण नहीं करता; वह अपनी समझ की संरचनाओं के माध्यम से उसे आकार भी देता है। शेक्सपियर हमें यही बात नाटकीय रूप में दिखाते हैं। ओथेलो वास्तविकता को नहीं देखता; वह उसे संदेह के चश्मे से देखता है। किंग लियर केवल अपना राज्य नहीं खोता; वह स्वयं को समझने का अपना आधार खो देता है। मैकबेथ भाग्य का नहीं, अपनी ही कल्पना का बंदी बन जाता है।

हेगेल का विश्वास था कि सत्य विरोधों और संघर्षों के माध्यम से विकसित होता है। शेक्सपियर के नाटक इस द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के जीवंत उदाहरण हैं। हैमलेट कर्म और चिंतन के बीच झूलता है। ब्रूटस मित्रता और कर्तव्य के बीच फँसा हुआ है। एंटनी पराजय को वाणी की शक्ति से विजय में बदल देता है। शेक्सपियर ने हेगेल से बहुत पहले समझ लिया था कि मनुष्य निश्चितताओं से नहीं, बल्कि आंतरिक संघर्षों से विकसित होता है।

नीत्शे, जिनसे मैं विशेष रूप से प्रभावित रहा हूँ, शेक्सपियर को मानव प्रकृति का महान व्याख्याकार मानते थे। नीत्शे के संसार में तीव्र इच्छाएँ, रचनात्मक शक्तियाँ और खतरनाक आवेग सक्रिय रहते हैं। शेक्सपियर का मंच भी इन्हीं से भरा हुआ है। मैकबेथ की महत्वाकांक्षा, इयागो की ईर्ष्या, फाल्स्टाफ का जीवनोत्सव, क्लियोपेट्रा की भव्यता और हैमलेट की यातना—ये सब मानव स्वभाव की गहराइयों और ऊँचाइयों को उद्घाटित करते हैं। शेक्सपियर नैतिक उपदेश नहीं देते; वे जीवन को स्वयं बोलने देते हैं।

जब-जब मैंने Thus Spoke Zarathustra पढ़ी है, मेरे मन में एक विचित्र कल्पना उभरी है। मुझे लगता है कि यदि नीत्शे के जरथुस्त्र को शेक्सपियर ने मंच पर उतारा होता, तो वह किसी पात्र के मुख से शायद यह कहलवाते—“He does not even know that God is dead?” (“उसे तो यह भी नहीं पता कि ईश्वर मर चुका है?”)। नीत्शे के लिए यह कोई धार्मिक घोषणा नहीं थी, बल्कि उस मनुष्य की त्रासदी थी जिसके पुराने विश्वास ढह चुके हैं, पर जो अभी तक इस परिवर्तन की गहराई को समझ नहीं पाया है। और शेक्सपियर की प्रतिभा यही थी कि वे ऐसे दार्शनिक संकट को भी एक जीवित मानवीय अनुभव में बदल देते। वे विचारों को पात्रों में, और दर्शन को नियति में रूपान्तरित कर देते थे।

किन्तु मुझे लगता है कि शेक्सपियर के सबसे निकट हाइडेगर पहुँचते हैं।

हाइडेगर का कहना था कि दर्शन का आरम्भ उत्तरों से नहीं, बल्कि विस्मय से होता है। मनुष्य कोई बाहरी दर्शक नहीं है; वह एक रहस्यमय संसार में फेंका गया सहभागी है। शेक्सपियर के महान पात्र इसी स्थिति में जीते हैं।

जब हैमलेट कहता है:

“To be, or not to be: that is the question.”

(“होना या न होना—यही प्रश्न है।”)

तो वह केवल एक साहित्यिक पंक्ति नहीं बोल रहा होता। वह अस्तित्व के सामने खड़ा मनुष्य है, जो जीवन के अर्थ और उसके बोझ से जूझ रहा है।

जब हाइडेगर कहते हैं कि चिंता (Anxiety) के क्षणों में हमारे परिचित अर्थ ढह जाते हैं और वास्तविकता अपनी गहरी रहस्यमयता में प्रकट होती है, तब हमें तूफ़ान के बीच भटकता हुआ किंग लियर याद आता है—सत्ता, प्रतिष्ठा और भ्रम से रहित, केवल एक नग्न मनुष्य।

जब हाइडेगर प्रामाणिकता (Authenticity) की बात करते हैं—मृत्यु से आँख मिलाने की क्षमता—तब मैकबेथ की वह अनुभूति स्मरण हो आती है:

“Life’s but a walking shadow.”

(“जीवन तो केवल चलती हुई एक छाया है।”)

शेक्सपियर की महानता इस बात में है कि वे इन सत्यों तक दार्शनिक तर्कों से नहीं, बल्कि नाटकीय कल्पना के माध्यम से पहुँचते हैं। वे अस्तित्व को समझाते नहीं; उसे मंच पर जीवित कर देते हैं।

एक्रॉयड शेक्सपियर को किसी दूरस्थ प्रतिभा के रूप में नहीं, बल्कि अभिनेता, व्यवसायी और रंगकर्मी के रूप में चित्रित करते हैं। वे व्यापारियों, नाविकों, अपराधियों, प्रेमियों, सैनिकों और सामान्य नागरिकों के बीच रहते थे। जो उन्होंने देखा, उसे कला में बदल दिया। उनका रंगमंच—The Globe—अपने नाम की तरह ही मानव संसार का एक लघु रूप था।

कहा जाता है कि शेक्सपियर ने अंग्रेज़ी भाषा में सत्रह सौ से अधिक नए शब्द जोड़े। किन्तु उनकी सबसे बड़ी देन शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं को अभिव्यक्त करने की क्षमता थी। उन्होंने उन अनुभवों को भाषा दी जिन्हें मनुष्य सदियों से महसूस करता था, पर कह नहीं पाता था।

यही कारण है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में भी शेक्सपियर प्रासंगिक बने हुए हैं। मशीनें सूचना को संसाधित कर सकती हैं। वे संवाद की नकल कर सकती हैं। वे पाठ रच सकती हैं। परन्तु मनुष्य होने का सार गणना नहीं, बल्कि प्रेम, हानि, आशा, अपराधबोध, क्षमा, मृत्यु और अर्थ से मुठभेड़ में निहित है।

यूनानियों ने इसे catharsis कहा था—भावनात्मक शुद्धि। शेक्सपियर ने इसे पूर्णता दी। उनके नाटक हमें हमारे भय और इच्छाओं का सामना करने देते हैं, बिना हमें नष्ट किए। वे हमें महसूस करना सिखाते हैं।

इसीलिए हर महामारी के बाद लोग फिर से रंगमंचों में लौटे। मनुष्य को केवल सूचना नहीं चाहिए; उसे आत्मबोध चाहिए। उसे ऐसी कहानियाँ चाहिए जो उसके अपने हृदय को उसके सामने खोल दें।

शेक्सपियर स्वयं भी अनेक प्लेगों के दौर से गुज़रे। थिएटर बंद होते, शहर शांत हो जाता, लोग अपने भीतर सिमट जाते। किन्तु जैसे ही मंच फिर खुलते, हजारों लोग उमड़ पड़ते। क्यों? क्योंकि रंगमंच उन्हें फिर से महसूस करने की अनुमति देता था।

Macbeth में शेक्सपियर लिखते हैं:

“Give sorrow words; the grief that does not speak
Whispers the o’er-fraught heart and bids it break.”

(“शोक को शब्द दो; जो दुःख बोल नहीं पाता, वह भारी हृदय में फुसफुसाता रहता है और अंततः उसे तोड़ देता है।”)

आज जब सामग्री (Content) तात्कालिक है और ध्यान क्षणभंगुर, शेक्सपियर हमें याद दिलाते हैं कि गहराई गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रेम, अपराधबोध, सौंदर्य, लालसा और दुःख—यही वे शक्तियाँ हैं जो मानव जीवन को आकार देती हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता संवाद की नकल कर सकती है, पर हैमलेट की आवाज़ में छिपी हुई वह कंपन अभी भी मनुष्य की ही संपत्ति है।

लगभग 1611 के आसपास शेक्सपियर ने चुपचाप लंदन छोड़ दिया और अपने नगर स्ट्रैटफ़र्ड लौट गए। पाँच वर्ष बाद उनका निधन हुआ। कोई भव्य उत्सव नहीं, कोई सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं—केवल एक शांत अवसान।

किन्तु संसार आज भी उनके शब्द बोलता है।

उनके अंतिम नाटक The Tempest में प्रॉस्पेरो कहता है:

“We are such stuff as dreams are made on.”

(“हम उसी पदार्थ से बने हैं जिससे स्वप्न निर्मित होते हैं।”)

अब जबकि मैं अपने जीवन के आठवें दशक आठवें दशक में जी रहा हूँ और स्वास्थ्यगत कारणों से अधिक समय घर पर बिताता हूँ, पुस्तकों और विचारों की संगति मेरे लिए एक प्रकार की अंतर्यात्रा बन गई है। इस निस्तब्धता में शेक्सपियर केवल अतीत के लेखक नहीं रह जाते; वे चेतना के सहयात्री बन जाते हैं।

हाइडेगर ने एक स्थान पर कहा था कि महान कवि ‘अस्तित्व के संरक्षक’ होते हैं। वे वास्तविकता के उन आयामों को सुरक्षित रखते हैं जिन्हें साधारण भाषा भूल जाती है। यदि यह सत्य है, तो शेक्सपियर उन महानतम संरक्षकों में से एक हैं।

उन्होंने मंच बहुत पहले छोड़ दिया, किन्तु उनकी आवाज़ अब भी जीवित है, क्योंकि वह उसी स्रोत से आती है जहाँ से दर्शन की यात्रा आरम्भ होती है—अस्तित्व के रहस्य के प्रति विस्मय।

और शायद यही कारण है कि शेक्सपियर आज भी हमारे भीतर जीवित हैं। वे हमारे प्रश्नों का समाधान नहीं करते; वे उन्हें और गहरा बना देते हैं। वे मानव जीवन की व्याख्या नहीं करते; वे हमें उसे अधिक पूर्णता से जीने की क्षमता देते हैं।

इस अर्थ में शेक्सपियर का रंगमंच और दर्शन की खोज अंततः एक ही दिशा में जाते हैं। दोनों हमें अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय बनने का आमंत्रण देते हैं।

और तब अनुभव होता है कि शेक्सपियर केवल अपनी पुस्तकों में नहीं रहते। वे हमारे भीतर रहते हैं—हमारी स्मृतियों में, हमारी संवेदनाओं में, हमारे दुःख और हमारे आनंद में। वे हमें यह स्मरण कराते रहते हैं कि चेतना एक है, जीवन एक है, और मानव आत्मा का यह आंतरिक रंगमंच अनश्वर है।

शेक्सपियर ने As You Like It में लिखा था:

“All the world's a stage,
And all the men and women merely players.”

(“सारा संसार एक रंगमंच है, और स्त्री-पुरुष उसमें केवल अभिनेता हैं।”)

चार शताब्दियों बाद भी यह पंक्ति उतनी ही सत्य प्रतीत होती है। हम आते हैं, अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं, प्रेम करते हैं, संघर्ष करते हैं, सफल होते हैं, असफल होते हैं, और अंततः मंच से उतर जाते हैं। पर नाटक चलता रहता है। शायद इसी बोध में विनम्रता भी है और मुक्ति भी। और शायद इसी कारण शेक्सपियर आज भी हमारे समकालीन हैं—क्योंकि उन्होंने केवल मनुष्य का अभिनय नहीं देखा, उन्होंने मनुष्य के भीतर चल रहे उस शाश्वत नाटक को देखा था जो समय, भाषा और सभ्यता की सीमाओं से परे है।

अरुण तिवारी

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