ऐसे युग में, जब हमारी उँगलियाँ हमारे हृदय से कहीं अधिक तीव्र गति से स्क्रॉल करती हैं; जब सूचनाएँ मानसून की वर्षा की तरह निरन्तर बरसती हैं, परन्तु ज्ञान की भूमि सूखी रहती है—भगवद्गीता कोई प्राचीन अवशेष नहीं, बल्कि मानव चेतना के लिए एक भविष्य-संगत ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती है।
आज हम जिन दुविधाओं से जूझ रहे हैं, उन्हें श्रीकृष्ण ने भले इन शब्दों में न कहा हो, पर उनका सार वे भली-भाँति समझते थे—अत्यधिक उत्तेजना, अत्यधिक विकल्प, अत्यधिक विचार, किन्तु अल्प संवेदना और अल्प विश्राम।
हम ऐसे संसार में जी रहे हैं जहाँ—
- ज्ञान अधिक है, पर अंतर्दृष्टि कम।
- उपभोग अधिक है, पर संतोष कम।
- गति अधिक है, पर गन्तव्य का बोध कम।
हमारे उपकरण उन्नत होते जा रहे हैं, पर हमारी आन्तरिक प्रणाली पीछे छूटती जा रही है।
हम नये-नये ऐप डाउनलोड करते हैं, पर जीवन का अर्थ नहीं समझते। हम अपने उपकरणों को उन्नत करते हैं, पर अपनी इच्छाओं को नहीं। हम आँकड़े एकत्र करते हैं, पर दिशा खो देते हैं।
ऐसे ही एक चौराहे पर श्रीकृष्ण की वाणी पुनः सुनाई देती है—अब रथों के युद्धक्षेत्र से नहीं, बल्कि ध्यान, पहचान और चेतना के युद्धक्षेत्र से।
वह कहती है—
तुम शोर नहीं हो; तुम उस शोर के पीछे की जागरूकता हो।
तुम उपकरण नहीं हो; तुम वह बुद्धि हो जो उसे संचालित करती है।
पाँच हजार वर्ष पूर्व अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में खड़े होकर विचलित हो गए थे। आज हम अनन्त टैबों, निरन्तर सूचनाओं और डिजिटल व्याकुलताओं के बीच खड़े हैं। हमारा संकट कुरुक्षेत्र नहीं, बल्कि "कॉर्टेक्स-क्षेत्र" है—अतिभारित मन का युद्धक्षेत्र। अर्जुन बाहरी युद्ध से भयभीत थे; हम भीतरी शोर से।
गीता किसी आश्रम की शान्ति में नहीं बोली गई थी। वह युद्धभूमि के कोलाहल, भ्रम और संघर्ष के मध्य प्रकट हुई थी। इसलिए उसकी बुद्धि भी केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि बहुकार्यरत पेशेवरों, विचलित युवाओं, थके हुए उद्यमियों और उन स्वप्नदर्शियों के लिए है जो अदृश्य संघर्ष लड़ रहे हैं।
मानव इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हमारे पास इतनी अधिक सूचना है, पर स्वयं के विषय में इतनी कम समझ। हम तथ्य एकत्र करते हैं, पर विस्मय खो देते हैं। हम मत-संग्रह करते हैं, पर मौन खो देते हैं। हम हर दिशा में दौड़ते हैं, पर कहीं पहुँचते नहीं।
गीता इस विरोधाभास को भेदती है। वह कहती है—
स्पष्टता के बिना ज्ञान भ्रम बन जाता है।
भ्रम को दूर करने वाली कर्मशीलता के बिना जीवन ठहराव बन जाता है।
और उद्देश्य के बिना कर्म केवल ऊर्जा का अपव्यय है।
हम भूख से अधिक भोजन करते हैं, जिज्ञासा से अधिक मत रखते हैं, विवेक से अधिक स्क्रीन देखते हैं और क्षमता से अधिक भावनाएँ ढोते हैं।
दुनिया कहती है—"और प्राप्त करो।"
गीता कहती है—"और बनो।"
न्यूनतावाद कोई आधुनिक फैशन नहीं है; वह सनातन वेदान्त का शाश्वत सत्य है। वास्तविक समृद्धि सब कुछ पाने में नहीं, बल्कि कम चाहने और अधिक प्रेम करने में है।
आधुनिक जीवन गति की पूजा करता है—त्वरित भोजन, त्वरित समाचार, त्वरित मनोरंजन, त्वरित प्रगति और त्वरित क्रोध।
किन्तु दिशा के बिना गति केवल चिंता उत्पन्न करती है।
गीता हमें सिखाती है—
"कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने वाला ही बुद्धिमान है।" (4.18)
कभी-कभी सबसे तीव्र गति स्थिर होकर प्राप्त होती है। स्थिरता निष्क्रियता नहीं है; वह मन की घर्षणरहित गति है।
कुछ लोग सोचते हैं कि गीता अतीत की पुस्तक है। मुझे लगता है कि उसका वास्तविक स्थान भविष्य में है—उस भविष्य में जो ध्यानभंग से भरा हुआ है। उसका संदेश धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि आत्म-अभियांत्रिकी है—
अपनी चेतना को व्यवस्थित करो।
अपनी भावनात्मक बुद्धिमत्ता को उन्नत करो।
उद्देश्य से कार्य करो, घबराहट से नहीं।
आसक्ति के बिना कर्म करो और अपराधबोध के बिना विश्राम करो।
आज हम मृत्यु से उतना नहीं डरते जितना अप्रासंगिक हो जाने से, अवसर छूट जाने के भय (FOMO) से, रिक्तता और मौन से डरते हैं।
पर गीता मुस्कुराकर पूछती है—
यदि तुम स्वयं को ही खो दो, तो सम्पूर्ण संसार पाकर क्या करोगे?
दुनिया बदल गई है। मानव स्वभाव नहीं।
गीता आज भी गति और अर्थ, परिवर्तन और शान्ति, अद्यतन और आत्मजागरण के बीच एक सेतु बनी हुई है।
हमें अधिक गीगाबाइट संग्रहण नहीं चाहिए; हमें अधिक आत्मबोध चाहिए।
हमें 6G डाउनलोड नहीं चाहिए; हमें आत्मा के भीतर गहरे अपलोड चाहिए।
और उसी समर्पण, उसी स्पष्टता में हमें वह परम उन्नयन प्राप्त होता है जिसे गीता " परमं गतिम्" कहती है—ऐसी अवस्था जहाँ किसी पुनरारम्भ की आवश्यकता नहीं रहती।
गीता का मेरा प्रिय श्लोक पन्द्रहवें अध्याय का आठवाँ श्लोक है—
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर: ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
जिस प्रकार वायु अपने आश्रय से सुगन्ध को लेकर चलती है, उसी प्रकार जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाते समय मन, इन्द्रियों और संस्कारों को साथ ले जाती है।
यदि इस श्लोक को आज की भाषा में कहा जाए, तो वह कुछ ऐसा होगा—
शरीर को एक ऐसे मोबाइल फ़ोन की तरह समझो
जो तुम्हें कुछ समय के लिए मिला है—
चमकदार, अस्थायी,
जिस पर खरोंचें पड़ेंगी,
जो धीरे-धीरे पुराना होगा
और एक दिन बन्द हो जाएगा।
जब उसका समय पूरा होगा,
तो सिम कार्ड—अर्थात सूक्ष्म शरीर—
शान्ति से बाहर निकल जाएगा,
साथ ले जाएगा—
स्मृतियों की सम्पर्क-सूची,
अनुभवों के संदेश,
संस्कारों की तस्वीरें,
आदतों के ऐप,
और इच्छाओं के वे टैब
जो अभी बन्द नहीं हुए।
फिर वह किसी अन्य उपकरण में प्रवेश करेगा
और अधूरी यात्रा को पुनः प्रारम्भ करेगा।
नम्बर बदल जाएगा।
आवरण बदल जाएगा।
परन्तु डेटा—प्रवृत्तियाँ, भय, प्रेम, आकांक्षाएँ और संस्कार—
साथ चले जाएँगे।
इसलिए सावधानी से स्वयं को अद्यतन करो।
आन्तरिक कचरा हटाओ।
करुणा अपलोड करो।
शान्ति का बैकअप लो।
द्वेष को डिलीट करो।
जीवन कभी नष्ट नहीं होता;
वह केवल रूपान्तरित होता है।
तुम न उपकरण हो,
न ऐप्स।
तुम वह मूल बुद्धि हो
जो जीवन की स्क्रीन के पीछे कार्य कर रही है।
जब यह प्रणाली बन्द होगी,
तुम समाप्त नहीं होगे।
तुम केवल एक नये ऑपरेटिंग सिस्टम में प्रवेश करोगे—
जीवन-रक्षा से सृजनशीलता की ओर,
प्रवृत्ति से प्रज्ञा की ओर,
भ्रम से स्पष्टता की ओर।
परन्तु सबसे बड़ा उन्नयन तब है
जब चेतना अनन्त स्रोत में विलीन हो जाती है,
जहाँ फिर किसी पुनर्जन्म, किसी रीबूट की आवश्यकता नहीं रहती।
यही है परमं गतिम्।
बुद्ध ने इसे निर्वाण कहा।
नीत्शे ने इसे ऊबेरमेंश की सम्भावना के रूप में देखा।
श्री अरविन्द ने इसे दिव्य जीवन के रूप में अभिव्यक्त किया।
ये केवल मत या काव्यात्मक कल्पनाएँ नहीं हैं। ये उस अनिवार्य नियम की अभिव्यक्तियाँ हैं जो अस्तित्व की संरचना में ही निहित है। हम इसे पहचानें या न पहचानें, हम सभी एक ऐसे विराट विकासक्रम के सहभागी हैं जो सम्पूर्ण जीवन और जगत को अपने भीतर समेटे हुए है।
अपने सीमित जीवनकाल की दृष्टि से देखें तो इतना ही पर्याप्त है कि हम प्रतिदिन कल से थोड़े बेहतर बनें और मनुष्यों, पशुओं तथा प्रकृति के प्रति अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ भलाई कर सकें।
मैं सदैव तरंग-प्रभाव (Ripple Effect) में विश्वास करता रहा हूँ। प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक निर्णय ऐसी प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है जो हमारी तत्काल दृष्टि से कहीं आगे तक जाती हैं। हम सभी कारण और परिणाम के इस निरन्तर प्रवाह में जी रहे हैं। यह प्रवाह कभी रुकता नहीं। न इसे रोका जा सकता है, न इसके बाहर जाया जा सकता है।
हमारे सामने केवल एक सार्थक विकल्प है—अपने आपको उस दिशा में संयोजित करना जो जीवन, निर्माण और कल्याण की ओर ले जाती है।
यह जीवन नश्वर है, सीमित है और एक दिन अवश्य समाप्त होगा। किन्तु इसी सीमितता में हमें अपने से कहीं बड़े उद्देश्य में भाग लेने का अवसर मिलता है।
यदि हम अस्तित्व की धारा में अपनी छोटी-सी नाव उतारने का साहस नहीं करेंगे, तो तट पर खड़े-खड़े पछताते रह जाएँगे, जबकि ज्वार आगे बढ़ चुका होगा।
इसी भाव को शेक्सपियर ने जूलियस सीज़र में अमर शब्द दिए हैं—
मनुष्यों के जीवन में एक ज्वार आता है,
जिसे यदि उसके उत्कर्ष पर पकड़ लिया जाए,
तो वह सौभाग्य की ओर ले जाता है।
यदि उसे छोड़ दिया जाए,
तो जीवन की पूरी यात्रा उथले जल और दुःखों में बँध जाती है।
हम आज उसी पूर्ण ज्वार पर तैर रहे हैं;
हमें उस धारा का साथ देना होगा जब वह अनुकूल हो,
अन्यथा अपने सारे अवसर खो बैठेंगे।
जीवन की धारा निरन्तर प्रवाहित है। बुद्धिमत्ता उसका प्रतिरोध करने में नहीं, बल्कि उसकी दिशा को पहचानकर अपनी शक्ति को उसके साथ जोड़ देने में है, ताकि हम भी जीवन की इस महान यात्रा के सहभागी बन सकें।
—अरुण तिवारी




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