ज्ञान का पेनरोज़ गर्त

by Arun Tiwari | Jul 21, 2026

अब जब मैं अपने जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर चुका हूँ, और कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, समितियों तथा सम्मेलनों के बीच बिताए हुए एक लंबे जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अपने आप से एक ऐसा प्रश्न पूछता हूँ जो मेरे युवा दिनों में लगभग विधर्म जैसा प्रतीत होता:

क्या यह संभव है कि आधुनिक शैक्षणिक व्यवस्था—जो स्वयं को ज्ञान की सर्वोच्च साधिका मानती है—वास्तव में जागरण की नहीं, बल्कि आज्ञाकारिता की फैक्ट्री बन चुकी हो? क्या यह स्वतंत्र चिंतकों के बजाय अनुशासित कार्यकर्ताओं का निर्माण करती है—अत्यधिक प्रशिक्षित, प्रभावशाली प्रमाणपत्रों से युक्त, किन्तु भीतर से विमुख मनुष्यों का—जो अनजाने में एक ऐसे विशाल तंत्र को पोषित करते हैं जिसकी ऊर्जा युद्ध, दोहन और अनन्त उपभोग से संचालित होती है?

यह कोई अचानक प्राप्त हुई अंतर्दृष्टि नहीं है। यह दशकों के अवलोकन का अवसाद है।

मैंने पीढ़ियों के प्रतिभाशाली युवाओं को विश्वविद्यालयों में प्रवेश करते देखा है—जिज्ञासा, आदर्शवाद और खोज की आकांक्षा से भरे हुए। किन्तु उनमें से अनेक को मैंने ऐसे निकलते देखा है कि वे शब्दावली में दक्ष तो हो गए, पर प्रश्न पूछने का साहस खो बैठे। वे असत्यवादी नहीं हैं, न ही मूर्ख। उनमें से अधिकांश ईमानदार, परिश्रमी और सदाशयी हैं। फिर भी उनके भीतर कुछ मौलिक क्षीण हो गया है। वे अधिक जानते हैं, पर कम समझते हैं। वे अत्यधिक व्यस्त हैं, चिन्तित हैं, और भीतर से किसी विचित्र रिक्तता का अनुभव करते हैं। वे मानो ऐसे शिक्षित zombie (सुस्त, थके हुए, लापरवाह) हैं जिन्हें अर्थ नहीं, बल्कि मापदण्ड संचालित करते हैं।

भारत के प्राचीन ऋषियों ने इस संकट को बहुत पहले पहचान लिया था—उस समय जब न डिग्रियाँ थीं, न विश्वविद्यालय रैंकिंग और न शोध-पत्रों की गणना।

ईशावास्योपनिषद् मानव ज्ञान की एक अद्भुत आलोचना प्रस्तुत करता है:

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥

— ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र ९

अविद्या के उपासक अंधकार में प्रवेश करते हैं; परन्तु जो केवल विद्या में ही आसक्त रहते हैं, वे उससे भी गहन अंधकार में जा गिरते हैं।

यह मंत्र केवल अज्ञान और ज्ञान की तुलना नहीं करता। यह उससे कहीं अधिक साहसिक बात कहता है। यह चेतावनी देता है कि आत्मबोध, नैतिकता और समग्र दृष्टि से विहीन ज्ञान स्वयं अज्ञान से अधिक खतरनाक हो सकता है। अज्ञानी व्यक्ति अंधेरे में ठोकर खाता है; किन्तु ज्ञानी व्यक्ति, अपनी निश्चितताओं के मद में, और भी गहरे गर्त खोदता है और उसे प्रगति का नाम दे देता है।

दो सहस्राब्दियों से भी अधिक समय बाद जर्मन दार्शनिक Immanuel Kant ने इसी चिंता को एक भिन्न भाषा में व्यक्त किया। अपने प्रसिद्ध निबंध What is Enlightenment?  में उन्होंने कहा कि प्रबोधन का अर्थ केवल जानकारी अर्जित करना नहीं, बल्कि उस मानसिक अपरिपक्वता से बाहर निकलना है जिसमें मनुष्य दूसरों को अपने स्थान पर सोचने देता है।

उनका प्रसिद्ध आह्वान था—Sapere Aude—“जानने का साहस करो।”

किन्तु यह तथ्य संग्रह करने का आह्वान नहीं था। यह स्वतंत्र विवेक के प्रयोग का आह्वान था। कांत के लिए शिक्षा उस क्षण विफल हो जाती है जब वह स्वायत्तता के बिना आज्ञाकारिता, नैतिक उत्तरदायित्व के बिना विशेषज्ञता और स्वतंत्र चिंतन के बिना अनुरूपता का निर्माण करने लगे।

आधुनिक विश्वविद्यालय स्वयं को प्रबोधन युग की विरासत मानते हैं, किन्तु मुझे संदेह है कि कांत उनकी वर्तमान स्थिति को देखकर संतुष्ट होते। छात्रों को विधियाँ सीखने, संस्थागत अपेक्षाओं को पूरा करने और स्थापित ढाँचों के भीतर सफल होने का प्रशिक्षण दिया जाता है; परन्तु उनसे शायद ही कभी पूछा जाता है कि वे जिन व्यवस्थाओं की सेवा कर रहे हैं, उनका अंतिम उद्देश्य क्या है।

उन्हें कुशलतापूर्वक सोचना सिखाया जाता है, स्वतंत्रतापूर्वक नहीं।

अपने जीवन में—मास्टर्स अध्ययन के दौरान अध्यापन से आरम्भ होकर, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की मिसाइल प्रयोगशालाओं में बिताए वर्षों तक, और बाद में जैव-चिकित्सा तथा दूरसंचार के अंतर्विषयी कार्यों तक—मैंने ज्ञान को धीरे-धीरे जीवन से अलग होते देखा। ज़्यादातर नॉलेज वर्कर अपने करियर में मकड़ी की तरह अपने ही जाल में फंस रहे हैं। वे करियर में आगे बढ़ने के लिए ज्ञान हासिल करते हैं। उनके काम से दूसरों का भला हो रहा है या नहीं, अब उन्हें इसकी परवाह नहीं है।

अर्थ, परिणाम और उत्तरदायित्व जैसे प्रश्नों को अब अक्सर बेवजह ही माना जाने लगा है।

ऐसे अनेक संशयों पर डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम से मेरी चर्चा होती थी, जिनकी छत्रछाया में मैंने तीन दशकों से अधिक समय तक कार्य किया। वे उन विरले लोगों में थे जो ज्ञान की शक्ति और उसके संकट—दोनों को समझते थे।

धीरे-धीरे ज्ञान खण्डित होकर विभागों और विशेषज्ञताओं में विभाजित हो गया। सफलता का अर्थ शोध-पत्रों की संख्या, अनुदानों की मात्रा और उद्धरणों की गणना बन गया। जिन प्रश्नों के लिए वित्त उपलब्ध नहीं था, वे पूछे ही नहीं गए। जिन सत्यों से प्रभावशाली हितों को चुनौती मिलती थी, उन्हें स्थगित, नरम या पुनर्परिभाषित कर दिया गया।

और देखते ही देखते विश्वविद्यालय निर्भीक जिज्ञासा के केंद्र न रहकर वैश्विक तंत्र के लिए कुशल श्रमशक्ति उपलब्ध कराने वाली संस्थाएँ बन गए।

यह तंत्र—यह महादैत्य—किसी षड्यंत्रकारी खलनायक द्वारा संचालित नहीं होता। यह आदेशों से नहीं, प्रोत्साहनों से चलता है। यह साहस को नहीं, बल्कि अनुरूपता को पुरस्कृत करता है।

इसे ऐसे अनुसंधान चाहिए जिसमें अध्ययन Business-as-usual हेतु हो, मुनाफे के लिए हो, बेहतर और बदलाव के लिए नहीं।

इसे ऐसे पर्यावरणीय संकट चाहिएँ जिनका मॉडल बनाया जा सके, पर जिनकी जड़ों को चुनौती न दी जाए। इसे ऐसी इच्छाएँ चाहिए जिन्हें समझकर और अधिक भड़काया जा सके। और अकादमिक जगत इसके लिए अभियंता, अर्थशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, रणनीतिकार और डेटा वैज्ञानिक तैयार करता रहता है—प्रत्येक अपने संकीर्ण कार्य में अत्यन्त दक्ष, किन्तु शायद ही कभी यह पूछते हुए:

मैं किस समग्रता की सेवा कर रहा हूँ?

यहीं पेनरोज़ सीढ़ी—या जिसे मैं पेनरोज़ गर्त कहना पसंद करता हूँ—का रूपक अत्यन्त प्रासंगिक हो जाता है।

पेनरोज़ सीढ़ी एक असंभव संरचना है। वह ऊपर चढ़ती हुई प्रतीत होती है, किन्तु अंततः वहीं लौट आती है जहाँ से आरम्भ हुई थी। प्रत्येक कदम प्रगति जैसा दिखता है; सम्पूर्ण यात्रा एक वृत्त बन जाती है।

आधुनिक शिक्षा भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है। अधिक डिग्रियाँ। अधिक विशेषज्ञता। अधिक सूचना। अधिक सम्मेलन।

किन्तु क्या इसके साथ अधिक बुद्धिमत्ता, अधिक न्याय या अधिक आन्तरिक स्वतंत्रता भी आई है?

विद्यार्थी चढ़ते जाते हैं। संस्थाएँ रैंकिंग का उत्सव मनाती हैं। राष्ट्र “ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था” पर गर्व करते हैं।

फिर भी मानवता उन्हीं संघर्षों, असमानताओं और पारिस्थितिक संकटों को दोहराती रहती है। सीढ़ी ऊपर जाती है; गर्त गहराता जाता है।

कांत की नैतिक दृष्टि इस समस्या को और स्पष्ट करती है। उनका प्रसिद्ध सिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने आप में एक लक्ष्य के रूप में देखा जाना चाहिए, कभी भी केवल साधन के रूप में नहीं। किन्तु आज की शिक्षा का बड़ा भाग ठीक इसके विपरीत सिद्धान्त पर आधारित दिखाई देता है।

छात्र “मानव संसाधन” बन जाते हैं। विश्वविद्यालय “टैलेंट पाइपलाइन” बन जाते हैं। ज्ञान “आर्थिक पूँजी” बन जाता है।

भाषा आधुनिक है, पर तर्क वही पुराना है—मनुष्य का मूल्य इस आधार पर नहीं कि वह क्या है, बल्कि इस आधार पर कि उससे क्या करवाया जा सकता है।

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि सबसे खतरनाक लोग अज्ञानी नहीं होते। सबसे खतरनाक वे प्रतिभाशाली विशेषज्ञ होते हैं जिन्होंने कभी अपने ज्ञान की नैतिक दिशा पर विचार नहीं किया।

वे हथियार प्रणालियाँ बनाते हैं। वे बाज़ारों को नियंत्रित करते हैं। वे मानव ध्यान को उत्पाद में बदल देते हैं। वे शोषण को दक्षता का नाम दे देते हैं।

यही आधुनिक दासता है। यह कोड़ों से नहीं, आकांक्षाओं से संचालित होती है। यह बल प्रयोग से नहीं, आकर्षण से कार्य करती है। यह विचारकों को चुप नहीं कराती; उन्हें इतना व्यस्त रखती है कि वे सोच ही न सकें।

सच्ची शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को सुन्न करना नहीं, जागृत करना है। उसे मौन का मूल्य भी सिखाना चाहिए और वाणी का भी। विनम्रता का भी और कौशल का भी। उत्तरदायित्व का भी और स्वतंत्रता का भी। उसे मानव संसाधन नहीं, मनुष्य बनाने चाहिए। आज का जीवन विरोधाभासों से भरा हुआ है।

वृद्धावस्था, जिसे कभी जीवन की स्वाभाविक पूर्णता माना जाता था, अब अक्सर तकनीकी संघर्ष में बदल जाती है। मृत्यु को जीवन का स्वाभाविक समापन नहीं, बल्कि तकनीकी विफलता की तरह देखा जाने लगा है।

दूसरी ओर जन्म की प्रक्रिया भी संस्थागत दक्षता के अधीन होती जा रही है। प्रकृति द्वारा परिष्कृत प्रक्रिया पर हमारा विश्वास घटा है, जबकि जैविक ज्ञान बढ़ा है।

ज्ञान बढ़ता है; विश्वास घटता है। विशेषज्ञता बढ़ती है; स्वायत्तता घटती है। यह चिकित्सा, शिक्षा या प्रौद्योगिकी के विरुद्ध तर्क नहीं है। यह उन व्यवस्थाओं के विरुद्ध चेतावनी है जो मनुष्य से अधिक दक्षता, नियंत्रण और लाभ को महत्व देती हैं।

उपनिषद् की चेतावनी आज पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। समग्रता से रहित ज्ञान मुक्ति नहीं देता; वह अंधकार को और गहरा करता है।

पेनरोज़ गर्त से बाहर निकलने के लिए हमें केवल बेहतर तकनीक या नई नीतियों की आवश्यकता नहीं है। हमें उस बौद्धिक परिपक्वता को पुनः प्राप्त करना होगा जिसे कांत स्वतंत्र विवेक कहते थे, और उस प्रज्ञा को जिसे उपनिषद् आत्मबोध कहते हैं।

सूचना अनन्त है। प्रज्ञा तब आरम्भ होती है जब ज्ञान स्वयं से प्रश्न पूछता है: मैं किस प्रकार का मनुष्य बन रहा हूँ? जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या वास्तव में मूल्यवान है?

ईशावास्योपनिषद् के ऋषि और कोनिग्सबर्ग का दार्शनिक अंततः एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं।

शिक्षा दक्षता का निर्माण नहीं है। शिक्षा स्वतंत्रता का जागरण है। यदि मेरी पीढ़ी इस विकृति को रोकने में सफल नहीं हुई, तो शायद हमारा दायित्व कम-से-कम उसका नामकरण करना है—स्पष्ट रूप से, ईमानदारी से और बिना भय के।

किसी भी व्यवस्था की शक्ति तब तक बनी रहती है जब तक उसे प्रश्नों से मुक्त रखा जाता है। जिस क्षण कोई युवा मन यह देख लेता है कि अनन्त आरोहण वास्तव में एक वृत्ताकार फाँस भी हो सकता है, उसी क्षण जादू टूटने लगता है।

शायद कहीं कोई विद्यार्थी ठहरेगा। वह प्रदर्शन के स्थान पर गहराई चुनेगा। गति के स्थान पर प्रज्ञा चुनेगा। और वह यह प्रश्न पूछेगा कि सफलता कैसे प्राप्त की जाए नहीं, बल्कि यह कि सफलता किसलिए और किसके लिए?

उसी क्षण शिक्षा अपने प्राचीनतम उद्देश्य को पुनः प्राप्त करेगी—जागरण।

तब पेनरोज़ सीढ़ी अंधकार में घूमती हुई परिक्रमा नहीं रहेगी। वह स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व, प्रज्ञा और प्रकाश की ओर जाने वाला मार्ग बन जाएगी।

अरुण तिवारी

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