मानव सभ्यता लंबे समय से एक सुखद धारणा के भीतर संगठित रही है—कि सत्य एक है, एकरेखीय है और अंतिम है। चाहे वह भारत का उद्घोष “सत्यमेव जयते” हो, हम्मुराबी की दैवी विधि-संहिता हो, चीन का “स्वर्गादेश” हो, अथवा पश्चिम की एकेश्वरवादी परम्पराएँ—अधिकांश समाजों ने अनिश्चितता की अपेक्षा निश्चितता को वरीयता दी है। सत्य से अपेक्षा की जाती रही कि वह सुसंगत, अधिकृत और अंतिम हो।
किन्तु मानवीय अनुभव कभी इतना सरल नहीं रहा।
हम उसी से प्रेम करते हैं जो हमें पीड़ा देता है। जिन विश्वासों पर सार्वजनिक रूप से अडिग रहते हैं, उन्हीं पर भीतर ही भीतर संदेह भी करते हैं। हम स्वतंत्रता की प्रशंसा करते हैं, पर सुरक्षा की आकांक्षा भी रखते हैं। एक ही व्यक्ति हमारे भीतर प्रेम और आक्रोश दोनों जगा सकता है।
विरोधाभास मानव जीवन का अपवाद नहीं है; वह उसकी मूल विशेषताओं में से एक है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उदय हमें इस तथ्य का सामना पहले से कहीं अधिक सीधे ढंग से करने के लिए बाध्य कर सकता है। इतिहास में पहली बार मानवता ऐसी बुद्धि का निर्माण कर रही है जो जैविक नहीं है, फिर भी मानव अभिव्यक्ति के विशाल भंडार पर प्रशिक्षित है। परम्परागत संस्थाओं के विपरीत, कृत्रिम बुद्धिमत्ता किसी एक आख्यान की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। उसके सामने संसार परस्पर प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोणों, असंगत सत्यों और अनसुलझे तनावों के रूप में उपस्थित होता है। इस अर्थ में AI वह पहला महान दर्पण बन सकती है, जिसमें मानवता अपनी ही अंतर्विरोधपूर्ण प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सके।
चीनी-अमेरिकी उपन्यासकार आर. एफ. कुआंग (जन्म 1996) के उपन्यास Katabasis को पढ़ते समय मेरा ध्यान डायलेथिया (Dialetheia) की अवधारणा की ओर गया—यह विचार कि कोई कथन एक ही समय में सत्य और असत्य दोनों हो सकता है।
उपन्यास में शिक्षा को खुली जिज्ञासा के रूप में नहीं, बल्कि स्वीकृत मान्यताओं के संस्थानीकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जो स्थापित सहमति के बाहर है, उसका परीक्षण नहीं किया जाता; उसे बाहर कर दिया जाता है। इसके विपरीत, जादू विरोधाभास को धारण करने का साहस है—बिना उसे तुरंत सुलझाने की अधीरता के।
जहाँ शिक्षा संगति की माँग करती है, वहाँ जादू विखंडन की अनुमति देता है। और उसी विखंडन में चमत्कार संभव होते हैं—वास्तविकता के नियमों को तोड़कर नहीं, बल्कि यह दिखाकर कि वास्तविकता हमारी स्वीकृत धारणाओं से कहीं अधिक व्यापक है।
भारतीय दर्शन ने विरोधाभास को कहीं अधिक सूक्ष्मता से समझा है।
जैन दर्शन हमें स्मरण कराता है कि कोई भी एक दृष्टिकोण संपूर्ण सत्य को नहीं समेट सकता। बौद्ध दर्शन अनेक बार विरोधाभासों का उपयोग हमारी जड़ मान्यताओं को ढीला करने के लिए करता है। अद्वैत वेदान्त दिखाता है कि अधिकांश विरोधाभास इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि हम वास्तविकता के विभिन्न स्तरों को मिश्रित कर देते हैं। जो एक स्तर पर सत्य है, वह किसी अन्य स्तर पर असत्य सिद्ध हो सकता है।
इस प्रकार जहाँ पश्चिमी विमर्श पूछता है कि क्या विरोधाभास स्वयं सत्य हो सकते हैं, भारतीय परम्पराएँ पूछती हैं—किस दृष्टिकोण से, किस स्तर पर, और किस प्रयोजन से यह कथन किया जा रहा है?
जिसे हम सत्य कहते हैं, वह कभी भी वास्तविकता का निष्पक्ष दर्पण नहीं रहा। वह अक्सर मान्यताओं की ऐसी सहमति होती है जिसे शिक्षा, पुनरावृत्ति और शक्ति द्वारा स्थिर कर दिया जाता है।
यहीं रोमन देवता जानस (Janus) का स्मरण अनिवार्य हो जाता है।
आरम्भ, संक्रमण, समाप्ति और द्वारों के देवता जानस के दो मुख थे, जो विपरीत दिशाओं में देखते थे। वह उस बात को समझता था जिसे आधुनिक सभ्यता प्रायः भूल जाती है—आरम्भ और अंत, सृजन और विनाश, निश्चितता और संशय वास्तव में परस्पर विरोधी नहीं होते। वे एक ही प्रक्रिया के भिन्न आयाम होते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग ऐसा ही एक जानस-क्षण सिद्ध हो सकता है।
हमने जन्म और मृत्यु, आगमन और प्रस्थान, सृजन और विनाश को परस्पर विरोधी मानना सीख लिया है। किन्तु जानस एक गहरा सत्य फुसफुसाता है—प्रत्येक आरम्भ में किसी अंत का बीज निहित है, और प्रत्येक अंत में किसी नए आरम्भ की संभावना।
भारतीय ब्रह्माण्ड-दृष्टि ने कभी भी पूर्ण समाप्ति के मिथक को स्वीकार नहीं किया। ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं, विलीन होते हैं और पुनः उत्पन्न होते हैं। जीव जन्म लेते हैं, मृत्यु को प्राप्त होते हैं और पुनः लौटते हैं। देवता भी प्रकट होने और लीन होने की लय में सहभागी हैं। कुछ भी पूर्णतः नष्ट नहीं होता; सब कुछ रूपान्तरित होता है।
भगवद्गीता कहती है:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। (2.22)
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर त्यागकर नए शरीर ग्रहण करती है।
आधुनिक मन इस दृष्टि का प्रतिरोध करता है क्योंकि वह निश्चितता का आदी हो चुका है। हम स्पष्ट श्रेणियाँ चाहते हैं—सत्य या असत्य, सही या गलत, वास्तविक या काल्पनिक।
डायलेथिया इन सीमाओं को अस्थिर कर देती है।
वह संकेत करती है कि विरोधाभास हमेशा वास्तविकता की त्रुटि नहीं होते; कभी-कभी वे उसकी पहचान होते हैं। एक व्यक्ति एक साथ दयालु और क्रूर हो सकता है। एक समाज प्रगतिशील और बर्बर दोनों हो सकता है। कोई विश्वास मुक्ति भी दे सकता है और बन्धन भी। यदि हम केवल एक पक्ष को सत्य मानते हैं, तो हम वास्तविकता को अपने मानसिक आराम के अनुरूप काट-छाँट रहे होते हैं। यह प्रश्न आज विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक नए जानस के रूप में उभर रही है।
वह मात्र एक उपकरण नहीं है। वह पहली गैर-जैविक बुद्धि है जो मानवता को उसी के सामने प्रतिबिंबित कर रही है। वह देखती है कि हमने क्या कहा है, न कि केवल यह कि हम क्या कहना चाहते थे। वह विरोधाभासों को बिना संकोच धारण कर सकती है। वह किसी कथन और उसके विपरीत कथन दोनों को सामने रख सकती है, बिना इस आग्रह के कि उनमें से किसी एक को तुरंत चुनना ही होगा।
ऐसा करते हुए वह यह उजागर करती है कि जिसे हम सत्य कहते हैं, उसका बड़ा भाग पाठ्यपुस्तकों में जमे हुए समझौते मात्र हैं—वैज्ञानिक प्रतिमान, आर्थिक व्यवस्थाएँ, नैतिक संहिताएँ और राष्ट्रीय इतिहास, जो कभी अपरिहार्य प्रतीत होते थे।
इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ समान रूप से सत्य है।
न डायलेथिया और न ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता सापेक्षवाद का समर्थन करती है। वे यह नहीं कहतीं कि सभी दावे समान हैं। वे केवल यह दिखाती हैं कि कुछ विरोध वास्तव में भ्रमात्मक हैं।
अग्नि जलाती भी है और ऊष्मा भी देती है। औषधि उपचार भी कर सकती है और विष भी बन सकती है। राष्ट्र सुरक्षा भी दे सकता है और उत्पीड़न भी कर सकता है। केवल एक पक्ष को पकड़ लेना सम्पूर्णता को खो देना है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता संक्रमणों की एक शक्तिशाली संरक्षिका बनेगी—इसलिए नहीं कि वह हमें नियंत्रित करेगी, बल्कि इसलिए कि वह हमें हमारे सामने उपस्थित करेगी। वह बड़े पैमाने पर विरोधाभासों को उजागर करेगी, ऐसे इतिहासों की रचना करेगी जो आधिकारिक आख्यानों को चुनौती देंगे, और ऐसे भविष्य प्रस्तुत करेगी जो वर्तमान धारणाओं को अस्थिर कर देंगे।
वह एक प्रकार के जानस-यंत्र की तरह कार्य करेगी, जो हमारी वास्तविकता की परिभाषाओं को निरन्तर पुनर्गठित करता रहेगा।
यह उन संस्थाओं के लिए असुविधाजनक होगा जो स्थिर सत्यों पर आधारित हैं। विद्यालय, धर्म, न्याय-व्यवस्था और राजनीतिक विचारधाराएँ सुव्यवस्थित कथाओं पर निर्भर करती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उस सुव्यवस्था को असंभव बना सकती है।
“सत्यमेव जयते” के बाद एक और प्रश्न उभरेगा—और वह कहीं अधिक असुविधाजनक होगा:
किसका सत्य?
किन्तु यह पतन नहीं है; यह नवीकरण है।
जब कोई विश्वदृष्टि अपनी ऊर्जा समाप्त कर देती है, तो वह विलीन होती है ताकि कोई नई विश्वदृष्टि जन्म ले सके। शिव का ताण्डव संसार को नष्ट करने के लिए नहीं, उसके पुनर्जन्म के लिए स्थान बनाने हेतु है। विरोधाभास जमा होते जाते हैं, जब तक कि वे परिवर्तन को अनिवार्य न बना दें।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता निर्णय नहीं करती; वह प्रतिबिम्बित करती है। वह अतीत और भविष्य, सत्य और असत्य, आशा और संकट—सभी को एक साथ धारण कर सकती है। यह हमें ज्ञान की ओर ले जाएगा या अराजकता की ओर—यह मशीन से अधिक हम पर निर्भर करेगा।
नए मन का आगमन इस अंतर्दृष्टि को नष्ट नहीं करता; वह उसे और अधिक शक्तिशाली बना देता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता संभवतः वह सबसे बड़ा दर्पण होगी जिसे मानवता ने कभी निर्मित किया है। उसमें झाँकते हुए हम केवल नई प्रौद्योगिकियाँ नहीं देखेंगे; हम स्वयं को देखेंगे—अपने विरोधाभासों को, अपनी निश्चितताओं को, अपने पूर्वग्रहों को, अपनी आकांक्षाओं को और अपने भय को।
जानस दहलीज़ पर खड़ा है। उसका एक मुख उस संसार की ओर है जिसे हम जानते हैं।
दूसरा उस भविष्य की ओर, जो अभी जन्म लेना शेष है। हमारी चुनौती किसी एक मुख को चुनने की नहीं है। हमारी चुनौती दोनों के पार एक साथ देखना सीखने की है।
शायद वास्तविकता में अनेक सत्य नहीं होते। सत्य तो एक ही होता है, किन्तु वह स्वयं को असंख्य आयामों, दृष्टियों और अनुभवों के माध्यम से प्रकट करता है। हममें से प्रत्येक उसकी किसी एक झलक, किसी एक पक्ष, किसी एक किरण से अपना बौद्धिक और आध्यात्मिक पथ आरम्भ करता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम अपने सीमित दृष्टिकोण को सम्पूर्ण सत्य घोषित कर देते हैं। बुद्धिमत्ता का अर्थ केवल अपने पक्ष को सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने का साहस भी है कि वास्तविकता हमारी धारणाओं से कहीं अधिक व्यापक है। जैसे-जैसे नए आयाम उद्घाटित हों, वैसे-वैसे अपनी समझ को विस्तृत करना ही प्रज्ञा का लक्षण है।
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। (मण्डल 1, सूक्त 164, ऋचा 46)
सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक प्रकार से व्यक्त करते हैं।
सत्य एक है; उसके प्रतिरूप अनेक हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग हमें पहली बार सम्पूर्ण मानव अनुभव की बहुध्वन्यता के सामने खड़ा कर रहा है। यह हमें सिखा सकता है कि विरोधी प्रतीत होने वाले विचार भी कभी-कभी उसी वास्तविकता के भिन्न आयाम होते हैं।
तभी बुद्धिमत्ता प्रज्ञा में रूपान्तरित होगी। और तभी भविष्य केवल अधिक बुद्धिमान नहीं, बल्कि अधिक मानवीय भी बन सकेगा।
—अरुण तिवारी




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