बिसरे पलों की लालटेन

by Arun Tiwari | Jul 21, 2026

पिछले कुछ समय से मैं जापानी कथा-साहित्य की शांत और सूक्ष्म चमक की ओर विशेष रूप से आकर्षित हुआ हूँ। इस यात्रा की शुरुआत नोबेल पुरस्कार विजेता काज़ुओ इशिगुरो के गहन आत्मविश्लेषी उपन्यासों से हुई। उनकी रचनाओं ने मेरे लिए उस साहित्यिक परंपरा का द्वार खोला, जहाँ स्मृति, वियोग और जीवन की अदृश्य भावनात्मक संरचना को अत्यंत सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया जाता है। वहाँ से मैं हारुकी मुराकामी की अतियथार्थवादी, किंतु गहरे मानवीय संसारों में प्रवेश कर गया और उनके लगभग सभी प्रमुख उपन्यास पढ़ डाले। हाल ही में मैंने सानाका हीरागी के उपन्यास द लैंटर्न ऑफ लॉस्ट मेमोरीज़ को पढ़ा। 1974 में जन्मी यह लेखिका जापानी साहित्य की उसी विलक्षण संवेदनशील परंपरा को आगे बढ़ाती दिखाई देती हैं।

इन लेखकों में एक समान कलात्मक सूत्र दिखाई देता है—साधारण प्रतीत होने वाले क्षणों को अस्तित्व पर गहन चिंतन में रूपांतरित कर देने की क्षमता। छोटे-छोटे हावभाव, भूली हुई स्मृतियाँ, क्षणभंगुर मुलाकातें और निजी दुख—सब कुछ जीवन-दर्शन की उज्ज्वल झलकियों में बदल जाता है। इन रचनाओं को अंग्रेज़ी अनुवाद में पढ़ना भी सुखद है, किंतु बार-बार यह कल्पना मन में उठती है कि मूल जापानी भाषा में इनकी लय, सूक्ष्मता और भाव-संगीत कितना अद्भुत होगा।

द लैंटर्न ऑफ लॉस्ट मेमोरीज़ तीन अलग-अलग किंतु आपस में गहराई से जुड़ी कहानियों का उपन्यास है। इन सबका केंद्र एक रहस्यमय फोटो-स्टूडियो है, जो जीवलोक और परलोक के बीच एक शांत पहाड़ी पर स्थित है। इस अद्भुत स्थान का प्रबंधन हिरासाका नामक एक रहस्यमय व्यक्ति करता है। प्रतिदिन यामा नाम का एक कुरियर उसके पास एक डिब्बा पहुँचाता है। उस डिब्बे में किसी व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के प्रत्येक दिन की एक-एक तस्वीर होती है—और वह व्यक्ति उसी दिन मरकर शीघ्र ही स्टूडियो में पहुँचने वाला होता है।

स्टूडियो में आने वाले प्रत्येक मृत व्यक्ति को एक असाधारण उपहार मिलता है। उसे अपने जीवन के प्रत्येक वर्ष में से एक तस्वीर चुनकर एक घूमती हुई लालटेन बनानी होती है। इतना ही नहीं, हिरासाका उसे उस चुने हुए वर्ष के किसी विशेष दिन पर अदृश्य रूप से वापस ले जा सकता है, ताकि वह उस दिन को पुनः जी सके और एक नई तस्वीर ले सके। बाद में हिरासाका उन तस्वीरों को एक धीमी गति से घूमने वाली लालटेन में सजाता है—एक ऐसी भावनात्मक ज्योति, जो आत्मा को कोमलता से परलोक की ओर ले जाती है।

किन्तु उपन्यास का सबसे रहस्यमय पात्र स्वयं हिरासाका है। उसे अपने मानव जीवन की कोई स्मृति नहीं है। उसके पास केवल एक तस्वीर है—एक पार्क में अकेले खड़े हुए अपने ही स्वरूप की। वही उसका आधार भी है और शून्य भी। बहुत सूक्ष्मता से उपन्यास यह संकेत देता है कि स्मृति और अर्थ की खोज में दूसरों का मार्गदर्शन करने वाले लोग भी स्वयं अपनी पहचान की तलाश में भटक सकते हैं। आत्मबोध, उद्देश्य और पहचान की यह खोज सार्वभौमिक है। अनेक गुरु, दार्शनिक और लेखक भी दूसरों को प्रकाश देने के बावजूद अपने भीतर के अंधकार से मुक्त नहीं हो सके।

पहली कहानी 92 वर्षीय हात्सुए की है। वह अपने जीवन के तेईसवें वर्ष में लौटना चाहती है, जब वह औद्योगिक श्रमिकों के निर्धन बच्चों की शिक्षिका थी। वहाँ कोई महान उपलब्धि नहीं मिलती, केवल सेवा, करुणा और मानवीय गरिमा का शांत सौंदर्य दिखाई देता है। हात्सुए के माध्यम से उपन्यास बताता है कि जीवन का अर्थ प्रायः प्रसिद्धि और शक्ति में नहीं, बल्कि दया, त्याग और अनदेखी भलाई में निहित होता है।

दूसरी कहानी का स्वर बिल्कुल भिन्न है। इसमें एक भारी-भरकम, अपराधी-जैसा दिखने वाला व्यक्ति है, जिसकी हत्या हो चुकी है। प्रारंभ में वह कठोर और नैतिक रूप से संदिग्ध प्रतीत होता है। किंतु अतीत में लौटने पर उसके भीतर की करुणा प्रकट होती है। विशेष रूप से एक वियतनामी प्रवासी बालक को स्थानीय गुंडों के उत्पीड़न से बचाने का उसका प्रयास उसकी छिपी हुई मानवता को उजागर करता है। हीरागी यहाँ यह दिखाती हैं कि कठोरतम व्यक्तियों के भीतर भी करुणा का स्रोत जीवित रह सकता है।

तीसरी और सबसे मार्मिक कहानी मित्सुरु नामक एक बालिका की है, जिसने अत्याचार सहा है। वह वास्तव में मरी नहीं है; केवल अस्थायी रूप से मृत्यु और जीवन के बीच की अवस्था में पहुँची है और बाद में जीवित संसार में लौटने वाली है। उसके साथ रहते हुए हिरासाका नियमों का उल्लंघन करता है। वह उसे केंद्रित सूर्यकिरणों और सूखी पत्तियों से आग जलाना सिखाता है। यही छोटा-सा व्यावहारिक ज्ञान बाद में उसकी जान बचाता है। किंतु इस करुणामय हस्तक्षेप की भारी कीमत चुकानी पड़ती है—दंडस्वरूप हिरासाका की सारी स्मृतियाँ मिटा दी जाती हैं। उसके पास केवल वही एक तस्वीर बचती है, जो मित्सुरु ने उसकी खींची थी।

यहीं उपन्यास स्मृति के चिंतन से ऊपर उठकर निःस्वार्थ प्रेम और त्याग के दर्शन में बदल जाता है। हिरासाका का निर्णय संकेत देता है कि जीवन का वास्तविक अर्थ स्वयं को बचाए रखने में नहीं, बल्कि किसी अन्य के जीवन में प्रकाश बन जाने में है।

उपन्यास के अंत में मित्सुरु किशोरावस्था में प्रवेश करती है। हिरासाका और यामा चुपचाप कामना करते हैं कि वह बहुत लंबे समय तक उस स्टूडियो में वापस न आए। यह एक सरल किंतु अत्यंत मार्मिक आशीर्वाद है—कि उसका जीवन लंबा और पूर्ण हो।

अंततः द लैंटर्न ऑफ लॉस्ट मेमोरीज़ हमें एक गहरा मानवीय और आध्यात्मिक संदेश देता है। जीवन का महत्व बड़ी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उन क्षणों में है जहाँ करुणा, साहस और मानवीय संबंध अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। इस उपन्यास में स्मृति केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं है; वह प्रकाश है। हमारा जीवन उन प्रेमों, उन घावों को भरने वाले स्पर्शों और उन छोटी-छोटी कृपाओं से प्रकाशित होता है, जो हमने दूसरों को दीं। इस अर्थ में प्रत्येक मनुष्य स्वयं एक लालटेन बन सकता है—अपने जाने के बहुत बाद तक दूसरों का मार्ग आलोकित करता हुआ।

यह उपन्यास पढ़ते समय मैंने स्वयं से पूछा—यदि मैं हिरासाका के स्टूडियो में पहुँचूँ, तो अपने जीवन का कौन-सा क्षण पुनः जीना चाहूँगा?

इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास बिना किसी हिचकिचाहट के है।

मैं 1977 के उस दिन में लौटना चाहूँगा, जब मैं अपनी बहन सीमा, भाइयों वरुण और सलिल तथा अपने पिता, जिन्हें हम बाबूजी कहकर बुलाते थे, के साथ मेरठ के मेनका सिनेमा में फिल्म हम किसी से कम नहीं देखने गया था। वह शाम का शो था। मुझे अपनी पहली छोटी-सी तनख्वाह मिली थी। अंतराल के समय मैं बाहर जाकर बाबूजी के लिए पान खरीदकर लाया। यह पहली बार था कि मैंने उनके लिए ऐसा कुछ किया था। वह एक साधारण-सा कार्य था—एक पुत्र की ओर से उस पिता के लिए, जिसने जीवन भर बिना कहे हमारी आवश्यकताओं को समझा और पूरा किया।

स्मृति ऐसे क्षणों को एक प्रकार की पवित्रता के साथ सँजोकर रखती है।

कुछ ही समय बाद मेरे पिता का देहांत हो गया। उनके जाने के साथ केवल एक जीवन समाप्त नहीं हुआ; हमारे परिवार का एक पूरा युग समाप्त हो गया। हम भाई-बहन फिर कभी एक साथ किसी सिनेमा हॉल में नहीं बैठे। बहन का विवाह हो गया। भाइयों के अपने जीवन बन गए। वह साधारण-सी शाम, बिना हमारी जानकारी के, हमारे बचपन और युवावस्था के एक पूरे अध्याय का अंतिम दृश्य बन गई।

यदि हिरासाका मुझे उस दिन वापस ले जाए, तो मैं कोई महान रहस्य या जीवन-परिवर्तनकारी घटना नहीं खोजूँगा। मैं केवल उस सिनेमा हॉल की लॉबी में फिर से खड़ा होना चाहूँगा—हाथ में पान लिए हुए, पिता को जीवित देखते हुए, भाई-बहनों की हँसी सुनते हुए, और उस संसार की सहज सुरक्षा को एक बार फिर अनुभव करते हुए जो तब तक पूर्ण था।

दुर्भाग्य से हम पाँचों की एक भी सामूहिक तस्वीर नहीं है। यदि हिरासाका सहायता करे, तो मैं उसी दिन की एक तस्वीर अवश्य लेना चाहूँगा।

शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अपने सबसे मूल्यवान क्षणों को जीते समय पहचान नहीं पाते।

शायद इसी कारण स्मृति पीड़ा देती है। और शायद इसी कारण वह प्रकाश भी देती है।

हीरागी के उपन्यास पर विचार करते हुए मेरे मन में बार-बार वह दार्शनिक यात्रा लौट आती रही, जिसने अनेक वर्षों से मेरे चिंतन को दिशा दी है—कांत, हेगेल, नीत्शे और हाइडेगर की यात्रा।

इमैनुएल कांत ने हमें सिखाया कि मनुष्य कभी भी यथार्थ को उसके शुद्ध स्वरूप में नहीं देखता। हम संसार का अनुभव अपनी चेतना की संरचनाओं के माध्यम से करते हैं। इस दृष्टि से प्रत्येक स्मृति पहले से ही एक व्याख्या होती है। जिस क्षण को हम याद रखते हैं, वह केवल अतीत की घटना नहीं रहता; वह हमारे मन द्वारा पुनर्निर्मित एक अर्थपूर्ण अनुभव बन जाता है। हम जो तस्वीर सँजोकर रखते हैं, वह केवल कैमरे की नहीं, चेतना की भी रचना होती है।

हेगेल ने इस विचार को और आगे बढ़ाया। उनके अनुसार व्यक्तिगत जीवन किसी बड़े ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रवाह का हिस्सा होता है। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे अनुभव होता है कि मेनका सिनेमा की वह स्मृति केवल मेरी निजी स्मृति नहीं है। वह हमारे परिवार के सामूहिक जीवन के एक अध्याय का समापन और दूसरे अध्याय का प्रारम्भ थी। उस समय जो एक साधारण-सी शाम लग रही थी, वह बाद में हमारे पारिवारिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। जीवन के ऐसे क्षणों को हम उसी समय नहीं पहचानते; उनका अर्थ हमें तब समझ आता है जब इतिहास आगे बढ़ चुका होता है।

नीत्शे ने शायद किसी भी अन्य दार्शनिक से अधिक तीव्रता के साथ यह प्रश्न उठाया कि क्या हम अपने जीवन को उसी रूप में पुनः जीना चाहेंगे, जैसा वह वास्तव में जिया गया था। उनका प्रसिद्ध विचार—‘शाश्वत पुनरावर्तन’—पूछता है कि यदि हमें अपने जीवन के किसी क्षण को अनंत बार जीने का अवसर मिले, तो क्या हम उसे स्वीकार करेंगे?

द लैंटर्न ऑफ लॉस्ट मेमोरीज़ पढ़ते हुए मुझे लगा कि हीरागी उसी प्रश्न को एक अधिक कोमल और मानवीय रूप में प्रस्तुत करती हैं। यदि जीवन हमें एक अंतिम बार लौटने का अवसर दे, तो हम कहाँ जाएँगे? कौन-सा क्षण चुनेंगे?

इस प्रश्न का उत्तर ही बताता है कि हम वास्तव में क्या मूल्यवान मानते हैं।

मेरा चयन कोई व्यावसायिक उपलब्धि, सार्वजनिक सम्मान या सफलता का क्षण नहीं होगा। मैं उस सिनेमा हॉल के अंतराल में लौटना चाहूँगा, जब मैं अपने पिता के लिए पान लेकर लौट रहा था। नीत्शे शायद इस उत्तर पर मुस्कुराते, क्योंकि यह जीवन की स्वीकृति वैभव के माध्यम से नहीं, कृतज्ञता के माध्यम से है।

और फिर आते हैं हाइडेगर।

उन्होंने हमें स्मरण कराया कि मनुष्य मूलतः मृत्यु की ओर अग्रसर प्राणी है। मृत्यु जीवन की दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना नहीं है; वही जीवन को उसकी गहराई, तात्कालिकता और अर्थ प्रदान करती है। हिरासाका के स्टूडियो में पहुँचने वाले लोग अपने जीवन को इसलिए नए ढंग से देख पाते हैं क्योंकि वे अंतिम सीमा पर खड़े हैं। वस्तुतः हम सभी उसी सीमा की ओर बढ़ रहे हैं, यद्यपि अधिकांश समय हम इस तथ्य से आँखें चुराए रखते हैं। मृत्यु केवल हमारी कथा का अंत नहीं करती; वह उस कथा को आलोकित भी करती है, ठीक वैसे ही जैसे लालटेन अपने भीतर सजी तस्वीरों को प्रकाशित करती है।

शायद यही कारण है कि हीरागी का यह उपन्यास मुझे इतना गहराई से स्पर्श कर गया। इसकी कल्पनाशील कथा के भीतर एक अत्यंत प्राचीन दार्शनिक सत्य छिपा है, जिसे पूर्व और पश्चिम दोनों ने अपने-अपने ढंग से पहचाना है—मनुष्य का जीवन केवल उन घटनाओं से परिभाषित नहीं होता जो उसके साथ घटती हैं, बल्कि उनसे होता है जो सब कुछ छूट जाने के बाद भी अर्थपूर्ण बने रहते हैं।

जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ रही है, इतिहास की महान घटनाओं के प्रति मेरा आकर्षण कम होता जा रहा है और उन छोटे-छोटे क्षणों के प्रति जिज्ञासा बढ़ती जा रही है, जिनके बीच से इतिहास चुपचाप गुजर जाता है। सभ्यताएँ उठती हैं और विलीन हो जाती हैं। दार्शनिक प्रणालियाँ जन्म लेती हैं और समय के साथ लुप्त हो जाती हैं। किंतु पिता का अपने पुत्र से पान स्वीकार करना, किसी अध्यापिका का एक बच्चे को स्नेह देना, किसी अजनबी का किसी निर्बल की रक्षा करना, अथवा किसी अकेले पथप्रदर्शक का किसी दूसरे के लिए स्वयं को बलिदान कर देना—ऐसे क्षण समय के पार भी प्रकाशमान बने रहते हैं।

शायद यही प्रकाश स्मृति का वास्तविक स्वरूप है। स्मृति अतीत का मात्र अभिलेख नहीं है; वह वह ज्योति है, जिसके प्रकाश में हम अपने जीवन को समझते हैं। और शायद इसी कारण मनुष्य वास्तव में एक स्मृतिशील प्राणी है—जो समय में जीता है, क्षणों को खोता है, उन्हें याद करता है, और अंततः उन्हीं की रोशनी में अपने अस्तित्व का अर्थ खोजता है।

यदि इस लेख को पढ़ने के बाद आप कुछ क्षण के लिए ठहरें और अपने जीवन की ओर देखें, तो स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछें— यदि आपको समय की यात्रा कर अपने अतीत के किसी एक क्षण की एकमात्र तस्वीर लेने का अवसर मिले, तो वह कौन-सा क्षण होगा? संभव है, उसी उत्तर में आपके जीवन का सबसे गहरा सत्य छिपा हो।

अरुण तिवारी

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