मैंने अनेक वर्षों तक श्री अरविन्द का अध्ययन किया है। मेरी आध्यात्मिक दृष्टि और वैचारिक संरचना पर उनकी बौद्धिक अध्यात्मपरकता की गहरी छाप रही है। The Secrete of the Veda से लेकर Savitri और The Life Divine तक, उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में भारतीय दार्शनिक चिंतन की शायद सबसे गहन व्याख्या प्रस्तुत की। इसलिए जब मैंने हाल ही में फ्रेडरिक नीत्शे की Thus Spoke Zarathustra पढ़ी, तो मेरे चिंतन की पृष्ठभूमि में श्री अरविन्द की प्रतिध्वनि लगातार सुनाई देती रही।
नीत्शे और श्री अरविन्द—दोनों ही साधारण मानवता से संतुष्ट नहीं थे; संसार के उस ‘जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो’ भाव से नहीं। दोनों में से किसी ने भी मनुष्य को एक पूर्ण और अंतिम उत्पाद नहीं माना। दोनों के लिए मनुष्य एक संक्रमणशील सत्ता था—किसी उच्चतर संभावना की ओर अग्रसर। दोनों के लिए ‘खोज’ का अर्थ था आत्मसंतोष और अनुरूपता की सीमाओं को पार करना।
इसी कारण नीत्शे के ऊबेरमेंश (Übermensch) अथवा ‘अधिमानव’ की तुलना श्री अरविन्द के Supramental Being या ‘अतिमानसिक पुरुष’ से करना आकर्षक प्रतीत होता है। किन्तु यह समानता जितनी दिखती है, उतनी वास्तविक नहीं है। इसके नीचे मानव-स्वभाव, चेतना और विकास की अंतिम दिशा को लेकर अत्यन्त भिन्न दृष्टिकोण छिपे हुए हैं।
नीत्शे के लिए अधिमानव का उदय ‘ईश्वर की अवधारणा की मृत्यु’ के बाद होता है। मनुष्य अब विरासत में मिली नैतिकताओं, किसी दैवी सत्ता या ब्रह्माण्डीय आश्वासनों—न्याय, तर्कशीलता अथवा निश्चितता—पर निर्भर नहीं रह सकता। नीत्शे मूलतः अस्तित्ववादी हैं। साहस, सृजनशीलता, आत्म-अनुशासन और जिसे वे ‘शक्ति की इच्छा’ (Will to Power) कहते हैं, उसके माध्यम से मनुष्य स्वयं को पार करता है। उनका प्रसिद्ध उद्घोष स्पष्ट है—“मनुष्य वह है जिसे पार किया जाना चाहिए।”
श्री अरविन्द एक बिल्कुल भिन्न आधार से आरम्भ करते हैं। उनके लिए वास्तविकता का मूल स्वरूप दिव्य है। विकास न तो आकस्मिक है और न केवल जैविक; वह पदार्थ, जीवन और मन के माध्यम से चेतना का क्रमिक प्रस्फुटन है, जो उच्चतर जागरूकता की ओर बढ़ता है। मानवता इस प्रक्रिया की पराकाष्ठा नहीं, बल्कि एक मध्यवर्ती अवस्था है। अतिमानसिक पुरुष उस उच्च चेतना की अभिव्यक्ति है जो स्वयं मानव-स्वभाव को रूपान्तरित कर देती है। अहंकार का लय इस प्रक्रिया का एक सह-परिणाम मात्र है।
फिर भी आश्चर्य की बात यह है कि एक पश्चिमी और दूसरा पूर्वी होते हुए भी दोनों विचारक मानव जीवन के स्वाभाविक मार्ग के रूप में निष्क्रिय अनुरूपता को अस्वीकार करते हैं। नीत्शे ‘झुंड मानसिकता’ की आलोचना करते हैं; श्री अरविन्द कुंठित और सुप्त चेतना की। परन्तु इसके बाद दोनों के मार्ग अलग हो जाते हैं। नीत्शे ‘मैं’ की सर्वोच्च संभावनाओं का उत्सव मनाते हैं, जबकि श्री अरविन्द उस ‘मैं’ के रूपान्तरण की बात करते हैं, जो अहंकार से परे चेतना में सम्पन्न होता है।
कहा जा सकता है कि नीत्शे देहधारी आत्मा की एक अत्यन्त ऊँची अभिव्यक्ति तक पहुँचते हैं—वीर, सृजनशील, निर्भीक और जीवन की पुष्टि करने वाली। किन्तु श्री अरविन्द इससे भी आगे की संभावना देखते हैं। उनके अतिमानसिक पुरुष में व्यक्तित्व समाप्त नहीं होता; वह एक सार्वभौमिक सत्य का पारदर्शी माध्यम बन जाता है।
संभवतः नीत्शे ऐसी अवधारणा को अस्वीकार कर देते, क्योंकि उन्हें आध्यात्मिक और पारलौकिक दावों पर गहरा अविश्वास था। इसके विपरीत श्री अरविन्द नीत्शे के अधिमानव को एक महत्त्वपूर्ण किन्तु अपूर्ण अवस्था मान सकते थे—शक्ति का जागरण, परन्तु चेतना का अंतिम प्रकाश नहीं। इस प्रकार दोनों साधारण मानवता की अपर्याप्तता को स्वीकार करते हैं, परन्तु उसके आगे क्या है, इस प्रश्न पर उनकी राहें अलग हो जाती हैं। नीत्शे उच्चतर मनुष्य की ओर संकेत करते हैं; श्री अरविन्द उच्चतर चेतना की ओर।
इस भेद को समझने के लिए एक पर्वत की कल्पना कीजिए जो सम्पूर्ण मानवता के सामने खड़ा है।
पश्चिमी ढलान पर नीत्शे का पर्वतारोही खड़ा है। वह निर्भरता, विरासत में मिली मान्यताओं, भय, दुर्बलता और कटुता को पीछे छोड़ते हुए ऊपर चढ़ता है। उसका आरोहण आत्म-विजय और साहस की माँग करता है। उसका उद्घोष है—“मैं वही बनूँगा जो मैं हूँ।”
पूर्वी ढलान पर श्री अरविन्द का पर्वतारोही है। वह इच्छाओं की शुद्धि, चेतना के विस्तार और अपने भीतर छिपी दिव्य सत्ता की खोज के माध्यम से ऊपर बढ़ता है। उसका उद्घोष है—“मैं जानूँगा कि मैं वास्तव में कौन हूँ।”
मार्ग भिन्न दिखाई देते हैं क्योंकि गन्तव्य भिन्न हैं। नीत्शे अलौकिकता को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यह जीवन से भागने का जरिया बन सकती है। श्री अरबिंदो अलौकिकता को गले लगाते हैं क्योंकि वे इसे जीवन की सार्थकता मानते हैं। नीत्शे व्यक्तित्व का महिमामंडन करते हैं; श्री अरविन्द सार्वभौमिकता का। नीत्शे का नायक अकेला खड़ा रहता है; श्री अरविन्द का योगी समस्त अस्तित्व के साथ एकात्म हो जाता है।
फिर भी दोनों ही साधारणता को नकारते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मानव जीवन में ऐसी संभावनाएँ हैं जिन्हें अभी साकार किया जाना बाकी है।
इस प्रश्न पर भगवद्गीता की ओर देखना अत्यन्त शिक्षाप्रद है। श्रीकृष्ण पहले अर्जुन को उसके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हैं और युद्ध से विमुख न होने का उपदेश देते हैं। वे अर्जुन के स्वधर्म का आह्वान करते हुए कहते हैं—
“धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।” (गीता 2.31–33)
एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।
बाद में श्रीकृष्ण अर्जुन को अहंकार का अतिक्रमण कर उच्चतर चेतना का उपकरण बनने का आह्वान करते हैं—
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” (गीता 18.66)
और विराट रूप के प्रसंग में कहते हैं—
“निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।” (गीता 11.33)
यही वह यात्रा है—वीरतापूर्ण कर्म से आध्यात्मिक आत्म-अतिक्रमण तक—जिसे श्री अरविन्द असाधारण गहराई के साथ विकसित करते हैं।
इस अर्थ में गीता नीत्शे और श्री अरविन्द के बीच एक सेतु की तरह दिखाई देती है। पहले पूर्णतः मनुष्य बनो, फिर उस संभावना की खोज करो जो मनुष्यता से भी आगे है।
किन्तु यह केवल दार्शनिक बहस नहीं है। यह सीधे हमारे समय की समस्या से जुड़ी हुई है। मैं यह क्यों लिख रहा हूँ, और आप इसे क्यों पढ़ रहे हैं?
क्योंकि मैं आधुनिक युग के सबसे गहरे दार्शनिक संकट से परिचित हूँ। आज के युवा, शिक्षा और समृद्धि प्राप्त होने के बावजूद, जीवन के अर्थ के संकट से जूझ रहे हैं। कुछ लोग नशों में आश्रय खोजते हैं, कुछ सतही मनोरंजन में स्वयं को खो देते हैं, और कुछ गहरी मानसिक पीड़ा का अनुभव करते हैं।
नीत्शे को भय था कि ‘परम’, ‘सार्वभौमिक’ या ‘दिव्य’ की अपीलें प्रायः व्यक्ति को छोटा कर देती हैं। इतिहास में उन्होंने धर्मों, विचारधाराओं और सामूहिक नैतिकताओं को देखा था, जो असाधारण व्यक्तियों से अमूर्त आदर्शों के लिए आत्म-बलिदान की अपेक्षा करती थीं। उनका उत्तर विद्रोह की पुकार था—व्यक्ति की लौ की रक्षा करो; उसे भीड़ की अग्नि में विलीन मत होने दो। नीत्शे के लिए मानव विकास का उद्देश्य महान शिखरों का निर्माण है—बीथोवन, गोएथे, लियोनार्डो दा विंची और शेक्सपीयर जैसे व्यक्तित्व। मानवता अपनी महानता की सृष्टि के माध्यम से स्वयं को सार्थक बनाती है।
श्री अरविन्द विपरीत आधार से आरम्भ करते हैं। व्यक्तित्व मूल्यवान है, किन्तु जिसे हम सामान्यतः व्यक्तित्व कहते हैं, वह केवल एक अस्थायी रूप है। अहंकार वास्तविक आत्मा नहीं है; वह मात्र एक अस्थायी मचान है। सच्चा व्यक्ति उच्चतर चेतना में विलीन होकर नष्ट नहीं होता, बल्कि और अधिक पूर्ण रूप से स्वयं बन जाता है। बूँद समुद्र में पहुँचकर मिटती नहीं; वह यह खोजती है कि वह कभी केवल बूँद थी ही नहीं। भारतीय दर्शन में मुक्ति विनाश नहीं, विस्तार है।
मेरे लिए नीत्शे उस महान चिकित्सक की तरह हैं, जो अपराध-बोध, निर्भरता और विरासत में मिली निश्चितताओं से दुर्बल हो चुकी सभ्यता का उपचार करता है। वह मनुष्य को सीधा खड़ा होना सिखाता है। वह सुखद भ्रमों को हटाकर साहस की माँग करता है। परन्तु उसका ‘व्यक्ति’ कभी-कभी निराशा की खाई के किनारे भी पहुँच सकता है।
श्री अरविन्द वहीं से आरम्भ करते हैं जहाँ नीत्शे रुकते हैं। जब मनुष्य खड़ा होना सीख लेता है, तब वे एक और प्रश्न पूछते हैं—क्या शक्ति ही अंतिम लक्ष्य है, या वह केवल तैयारी है? नीत्शे दासता से मुक्ति सिखाते हैं; श्री अरविन्द सीमाओं से मुक्ति। दोनों का मतभेद इस बात में है कि विकास किस दिशा में जा रहा है। नीत्शे का क्षितिज महानता है। श्री अरविन्द का क्षितिज चेतना है। गीता का क्षितिज कर्म में प्रकट बुद्धि है।
मुझे सबसे अधिक जो बात प्रभावित करती है, वह है उनकी साझा मान्यता कि मानवता कोई अंतिम उत्पाद नहीं है, बल्कि एक संक्रमणशील सत्ता है। उपनिषदों के ऋषि, भगवद्गीता, नीत्शे, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, और यहाँ तक कि आधुनिक विकासवादी चिंतक भी इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि वर्तमान मानवता अस्तित्व का अंतिम अध्याय है। सभी, अपनी-अपनी भाषा में, विकास, आत्म-अतिक्रमण और उच्चतर संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। समकालीन विचारक डेविड डॉयच भी ज्ञान के विस्तार को मानव प्रगति और विकास की प्रेरक शक्ति मानते हैं।
शायद इसी कारण ये संवाद सदियों बाद भी जीवित हैं। प्रत्येक मानव यात्रा के किसी आवश्यक पक्ष को पकड़ता है। मानवता को नीत्शे के साहस और श्री अरविन्द की दृष्टि—दोनों की आवश्यकता है।
संभवतः मेरे गुरु डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने इस समन्वय को सहज रूप से अनुभव किया था। वे युवाओं से निरन्तर कहते थे—“अलग सोचने का साहस रखो, आविष्कार करने का साहस रखो, अनदेखे मार्ग पर चलने का साहस रखो, असम्भव को खोजने का साहस रखो, समस्याओं का सामना कर सफलता प्राप्त करने का साहस रखो।” उनके लिए साहस केवल व्यक्तिगत गुण नहीं था; वह मानव प्रगति का इंजन था।
किन्तु मनुष्य का कार्य केवल साहसी होना नहीं है, और न ही केवल बुद्धिमान होना। उसका कार्य इन दोनों को रचनात्मक संतुलन में धारण करना है। साहस हमें संसार का सामना करने की शक्ति देता है; बुद्धि उसे समझने की क्षमता; और दृष्टि यात्रा को दिशा प्रदान करती है। जब इनमें से कोई एक अकेला रह जाता है, तो कुछ आवश्यक खो जाता है।
जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, मुझे यह प्रश्न अधिक रोचक लगने लगा है कि “कौन सही था?” नहीं, बल्कि “जिस ऊँचाई तक वह पहुँचा, वहाँ से उसने क्या देखा?” यही प्रश्न हमें दार्शनिक परम्पराओं को परस्पर विरोधी मतों के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यापक वास्तविकता की भिन्न-भिन्न खिड़कियों के रूप में देखने की अनुमति देता है, जिसे कोई एक विचार-प्रणाली पूरी तरह समाहित नहीं कर सकती।
—अरुण तिवारी




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