मुझे सदैव ऐसा लगा है कि इस संसार के हृदय में कोई गहरा रहस्य छिपा हुआ है। बचपन में मेरा संसार पौराणिक कथाओं, पाठ्यपुस्तकों की कहानियों और रेडियो से सुनाई देने वाली आवाज़ों से निर्मित था। उस समय टेलीविज़न भारतीय घरों में आम नहीं था। प्रत्येक कथा मुझे वास्तविकता की किसी नई परत का उद्घाटन करती प्रतीत होती थी और मैं उन्हें बालसुलभ विश्वास के साथ स्वीकार करता था।
मैंने सबसे पहले हिंदी जासूसी उपन्यास पढ़े। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि मेरा जन्मस्थान मेरठ उस समय ऐसे साहित्य के प्रकाशन का एक प्रमुख केंद्र था। उन तीव्र गति से चलने वाली कहानियों ने मेरे लिए कल्पना और पठन की विशाल दुनिया के द्वार खोल दिए। किंतु मेरे भीतर तार्किक चेतना का वास्तविक उदय तब हुआ जब मैंने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वैज्ञानिकों, प्रयोगशालाओं और अभियान्त्रिकी के अनुशासित वातावरण ने मुझे संसार को समझने की एक नई दृष्टि दी। प्रमाण, तर्क, प्रयोग और मापन—इन सबने मिथक और कथा से भिन्न एक भाषा प्रस्तुत की, किंतु वह भी उतनी ही आकर्षक थी।
विश्वविद्यालय का पुस्तकालय अत्यंत समृद्ध था। मैं घंटों उसकी अलमारियों के बीच भटकता रहता। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उस प्रवृत्ति को केवल ‘अतार्किक जिज्ञासा’ ही कह सकता हूँ। मैं यांत्रिक अभियान्त्रिकी का विद्यार्थी था; दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र या साहित्य की पुस्तकों में मेरी रुचि का कोई व्यावहारिक कारण नहीं था। फिर भी वे मुझे अपनी ओर खींचती थीं।
सन् 1974 में एक दिन मैंने नवीन आगमन पुस्तकों की प्रदर्शनी में ई. एफ. शूमाखर की पुस्तक स्मॉल इज़ ब्यूटीफुल देखी। मैंने लगभग झपटकर उसे उठा लिया। शायद उसके शीर्षक में ही कोई ऐसा प्रश्न छिपा था जिसे मैं तब तक शब्द नहीं दे पाया था। आज भी वह क्षण मेरी स्मृति में जीवित है, क्योंकि वही उन छोटे किंतु निर्णायक अनुभवों में से एक था जिनसे किसी मनुष्य का बौद्धिक व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है।
हैदराबाद आने के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (डीआरडीएल) के कार्यभार ने मुझे कुछ समय के लिए पुस्तकों से दूर कर दिया। वे अत्यंत व्यस्त वर्ष थे। हम स्वदेशी प्रक्षेपास्त्र प्रणालियों के विकास में लगे हुए थे और कार्य की तीव्रता में बौद्धिक भटकाव के लिए बहुत कम अवकाश बचता था।
फिर सन् 1987 में जीवन ने अचानक करवट ली। मुझे वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया का गंभीर आघात हुआ और आपातकालीन स्थिति में अस्पताल ले जाया गया। कुछ समय के लिए भविष्य अनिश्चित हो गया। जब मैंने उस संकट और उसके बाद घटित घटनाओं पर विचार किया—आईसीसीयू में उपचार, ब्रिटेन से विशेष सरकारी माध्यमों द्वारा मँगाई गई जीवनरक्षक औषधियाँ—तो अस्तित्व के रहस्य के प्रति मेरा आकर्षण पुनः जाग उठा। तर्क बहुत कुछ समझा सकता था, पर सब कुछ नहीं। जीवन में कृपा, संयोग और मानवीय परस्परता का भी एक ऐसा आयाम था जो गणना की पकड़ से बाहर था।
इसी संकट के दौरान मेरा परिचय डॉ. बी. सोम राजू से हुआ, जिन्होंने अत्यंत दक्षता और सहृदयता के साथ मेरा उपचार किया। डीआरडीएल में प्रबंधन सेवाओं के प्रमुख कर्नल आर. स्वामीनाथन ने भी हर प्रकार की व्यवस्था सुनिश्चित की। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझता हूँ कि वह स्वास्थ्य संकट मेरे जीवन को एक ऊँची कक्षा में ले गया। कुछ घटनाएँ उस समय विनाशकारी प्रतीत होती हैं, पर बाद में वे जीवन के निर्णायक मोड़ सिद्ध होती हैं।
भारत के कुछ श्रेष्ठ चिकित्सकों के साथ विकसित हुए इसी संबंध ने संभवतः डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को मुझे रक्षा प्रौद्योगिकियों के नागरिक उपयोग कार्यक्रम का दायित्व सौंपने के लिए प्रेरित किया। उनका स्वप्न था कि रक्षा क्षेत्र की उन्नत तकनीकों का उपयोग समाज के लिए किया जाए और सस्ती स्वदेशी चिकित्सा उपकरण विकसित किए जाएँ। इसी उद्देश्य से उन्होंने भारत सरकार की एक अभिनव अंतर-मंत्रालयी पहल के रूप में सोसायटी फॉर बायोमेडिकल टेक्नोलॉजी की स्थापना की। मुझे इसका मैनेजर नियुक्त किया गया।
लेकिन इतिहास अपनी गति से बदल रहा था। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के साथ कार्यक्रम के अनेक मूल उद्देश्य बदलती परिस्थितियों के कारण अप्रासंगिक होने लगे। इसी दौरान डॉ. सोम राजू—जो अब मित्र, मार्गदर्शक और सहयोगी बन चुके थे—ने कार्डियक एलाइड रिसर्च एंड एजुकेशन (केयर) फाउंडेशन और अस्पताल की स्थापना की। उन्होंने मुझे उसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। यह विश्वास की एक अंधी छलांग थी। मैंने अच्छी-भली स्थायी सरकारी सेवा से त्यागपत्र दिया और अनिश्चित संभावनाओं के एक बिल्कुल नए संसार में प्रवेश कर गया।
इस पूरी यात्रा में डॉ. कलाम सदैव मेरे साथ खड़े रहे। उनका प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और अटूट विश्वास वही आश्वासन था जिसकी आवश्यकता किसी भी अन्वेषी को अज्ञात प्रदेशों की ओर बढ़ते समय होती है।
सन् 2004 में मुझे कार्डियक अरेस्ट हुआ। ऐसी परिस्थितियों में जीवन और मृत्यु का अंतर अक्सर कुछ ही मिनटों का होता है, क्योंकि प्रत्येक बीतता क्षण मस्तिष्क को ऑक्सीजन से वंचित कर देता है। सौभाग्य से उस समय मैं केयर अस्पताल में कार्यरत था—एक ऐसा स्थान जहाँ पहुँचने की कल्पना भी मेरे अभियान्त्रिकी जीवन के प्रारम्भ में असंभव लगती। तत्काल चिकित्सा उपलब्ध होने के कारण मुझे समय रहते पुनर्जीवित किया जा सका।
बाइपास शल्यक्रिया की पूर्व संध्या पर यूनिवर्सिटी प्रेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और विंग्स ऑफ फायर के प्रकाशक मधु रेड्डी मुझसे मिलने आए। उन्होंने मुझे अमिताव घोष का उपन्यास द ग्लास पैलेस भेंट किया। यह उपन्यास बर्मा के अंतिम राजा की कहानी कहता है, जिन्हें ब्रिटिश शासन ने अपदस्थ कर महाराष्ट्र के रत्नागिरि में निर्वासित कर दिया था।
कुछ समय बाद मैं डॉ. पी. कृष्णम राजू के साथ म्यांमार (बर्मा का नया नाम) गया। वहाँ हमने वास्तविक ‘ग्लास पैलेस’ देखा। साहित्य, इतिहास और जीवन-अनुभव एक ही सूत्र में बँधते हुए प्रतीत हुए।
उस यात्रा का महत्व प्रतीकात्मक से कहीं अधिक था। उसने भारतीय संस्थानों में बर्मी चिकित्सकों के प्रशिक्षण तथा दोनों देशों के बीच स्वास्थ्य सहयोग की नींव रखी। अपने छोटे से स्तर पर यह प्रयास म्यांमार में उस स्वास्थ्य क्रांति के प्रारम्भिक चरणों में सहायक बना, जिसका अनुभव भारत ने 1980 के दशक से किया था।
और फिर, एक दिन, अप्रत्याशित रूप से शालिग्राम मेरे जीवन में लौट आये।
भगवान विष्णु की उपासना में शालिग्राम शिला का उपयोग एक सुप्रसिद्ध हिंदू परंपरा है। मुझे अपने परिवार में ठाकुरजी संग्रह—छोटी-छोटी धातु की मूर्तियों और पूजनीय वस्तुओं का वह समूह, जिसकी पूजा हमारी कई पीढ़ियाँ करती रही थीं— के शालिग्राम याद हैं। उनके बारे में जिज्ञासा होने पर मैंने मेरठ में रहने वाले अपने छोटे भाई सलिल से पूछा। उन्होंने बताया कि बच्चों के खेलते समय वह शालिग्राम अनायास गिरकर खंडित हो गए थे। तदनंतर उनका विधिपूर्वक गंगा में विसर्जन कर दिया गया।
शालिग्राम शिला एक जीवाश्मयुक्त पत्थर है, जो परंपरागत रूप से नेपाल की काली गंडकी नदी के पर्वतीय तटों और नदी-तल से प्राप्त होता है। यह नदी हिमालय की कुछ सबसे गहरी घाटियों को चीरते हुए बहती है। शालिग्राम की पहचान उनका गहरा काला रंग और उन पर अंकित विशिष्ट जीवाश्म-चिह्न हैं, जो करोड़ों वर्षों पूर्व समुद्र में रहने वाले जीवों की पत्थर में सुरक्षित स्मृति हैं। प्रामाणिक शालिग्राम सहजता से प्राप्त नहीं होते। वे प्रायः एक श्रद्धालु से दूसरे श्रद्धालु तक पहुँचते हैं—व्यक्तिगत संबंधों, विश्वास और भक्ति के माध्यम से। अलबत्ता, जैसा कि हर पवित्र वस्तु के साथ होता है, बाजार में इनकी नकलें खूब मिलती हैं।
कई वर्षों तक मैं कभी-कभी सोचा करता कि क्या शालिग्राम फिर कभी मेरे जीवन में आएंगे। फिर घटनाओं की एक अप्रत्याशित श्रृंखला आरम्भ हुई। मेरे पुत्र अमोल के कुछ मित्र आध्यात्मिक नववर्ष उत्सव के लिए काशी गए हुए थे। बातचीत के दौरान अमोल ने मेरी शालिग्राम की खोज का उल्लेख कर दिया। संयोग से—या शायद किसी अदृश्य व्यवस्था से—वे उस समय भगवान विष्णु को समर्पित प्राचीन बिंदु माधव मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे थे। जब मंदिर के पुजारी ने मेरी खोज की बात सुनी, तो उन्होंने सहर्ष कई शताब्दियों से मंदिर में मौजूद अपने संग्रह में से एक शालिग्राम उन्हें भेंट कर दिए। उन्होंने इसके बदले कोई धन नहीं लिया। केवल इतना कहा—“ ये वहीं जा रहे हैं जहाँ इनका स्थान है।”
कुछ वर्षों बाद अमोल तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत की यात्रा पर गया और वहाँ से मेरे लिए एक और शालिग्राम लेकर लौटा। तब तक मैंने ऐसे संयोगों की व्याख्या करने का प्रयास लगभग छोड़ दिया था।
जीवाश्म संसार भर में पाए जाते हैं। वे सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर मछलियों, पक्षियों, वृक्षों और यहाँ तक कि विशाल डायनासोरों के अवशेषों तक फैले हुए हैं, जिनमें से कुछ का भार कई टन होता है। स्वयं हिमालय का जन्म तब हुआ जब कभी गोंडवाना भूभाग का हिस्सा रही भारतीय भू-पट्टिका यूरेशिया से टकराई और प्राचीन समुद्र-तल को आकाश की ओर उठा दिया। वन लुप्त हो गए, असंख्य जीव नष्ट हो गए, समुद्र पीछे हट गए, पर्वत उठ खड़े हुए और काल ने उनकी स्मृतियों को पत्थरों पर अंकित कर दिया।
जब मैं शालिग्राम पर जल चढा कर, उन पर तुलसी की पत्ती रखता हूँ, तो मैं केवल किसी धार्मिक परंपरा से नहीं, बल्कि उस विराट भूवैज्ञानिक नाटक से भी जुड़ जाता हूँ जो करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी पर घटित होता रहा है। अनंत काल तक बहते जल ने इस पत्थर को उसके वर्तमान रूप में गढ़ा है। उसकी मौन उपस्थिति में अस्तित्व की नश्वरता और तुलसी के रूप में उसकी निरंतरता—दोनों का एक साथ अनुभव होता है। जीवन जितना क्षणभंगुर है, उतना ही शाश्वत भी।
नीत्शे ने मुझे पृथ्वी पर दृढ़तापूर्वक खड़े रहना और जीवन को उसके प्रकट रूप में स्वीकार करना सिखाया। शालिग्राम शिला और तुलसी दोनों ही धरती का हिस्सा हैं।
जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो दशकों से बिखरी घटनाओं को जोड़ने वाले अदृश्य सूत्र की उपेक्षा नहीं कर सकता। विश्वविद्यालय पुस्तकालय में देखी गई एक पुस्तक ने मेरे बौद्धिक जीवन का बीज बोया। मेरे वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया रोग ने रक्षा अनुसंधान और प्रौद्योगिकियों से जनहित के स्वदेशी उत्पादों की राह खोली। कार्डियक अरेस्ट ने मुझे स्वास्थ्य सेवाओं के ऐसे अभियानों तक पहुँचाया जिन्होंने भारत की सीमाओं से परे भी जीवनों को स्पर्श किया।
कोई इसे नियति कहे, ईश्वरीय अनुकम्पा, उद्भव या मात्र संयोग—इससे बहुत अंतर नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण यह है कि हमारी कि हमारी निजी कल्पनाओं, अभिलाषाओं, योजनाओं, और प्रयत्नों से कहीं बड़ा कुछ निरंतर कार्यरत है। हमारे जीवन को प्रभावित करने वाली इस अनवरत प्रक्रिया का आभास हमेशा सहायक होता है।
यह वेबसाइट इसी विश्वास से निर्मित हुई है। यहाँ मैं अपने अनुभवों, चिंतन और प्रश्नों को अंतिम निष्कर्षों के रूप में नहीं, बल्कि परागकणों की तरह साझा कर रहा हूँ—ऐसे परागकण, जो समय और स्थान की दूरियों को पार कर किसी अन्य मन में कभी अंकुरित हो सकें।
—अरुण तिवारी




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